इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर चाइनीज मांझे के मुद्दे पर गंभीरता दिखाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से जवाब तलब किया है। अदालत ने यह जानना चाहा है कि प्रतिबंध के बावजूद इस खतरनाक मांझे के निर्माण, बिक्री और उपयोग को रोकने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं। यह मामला न सिर्फ कानून के पालन का है, बल्कि आम नागरिकों की सुरक्षा और जीवन के अधिकार से भी सीधे जुड़ा हुआ है।

अदालत की सख्ती और आदेश
यह आदेश न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ द्वारा दिया गया है। यह सुनवाई देवरिया निवासी अधिवक्ता प्रदीप पांडे की ओर से दाखिल अवमानना याचिका पर हुई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि सरकार और संबंधित अधिकारियों ने अदालत के पूर्व आदेशों का पालन नहीं किया है।
अदालत ने मुख्य स्थायी अधिवक्ता को निर्देश दिया है कि वे सरकार से स्पष्ट निर्देश प्राप्त कर एक महीने के भीतर जवाब दाखिल करें। साथ ही याची को भी निर्देश दिया गया है कि वे 48 घंटे के भीतर याचिका की प्रति संबंधित पक्षों को उपलब्ध कराएं।
किन अधिकारियों को बनाया गया पक्षकार
इस मामले में गृह विभाग के प्रमुख सचिव और डीजीपी को पक्षकार बनाया गया है। इससे स्पष्ट है कि अदालत इस मुद्दे को प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता से देख रही है और जिम्मेदारी तय करना चाहती है।
पुराने आदेशों की अनदेखी का आरोप
याचिका में यह भी बताया गया है कि अदालत पहले भी कई बार इस विषय पर सख्त निर्देश दे चुकी है। वर्ष 2015 में ‘अनुराग मिश्रा बनाम राज्य’ मामले में चाइनीज मांझे के निर्माण, बिक्री और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के आदेश दिए गए थे।
इसके बाद 14 जनवरी 2026 को ‘हिमांशु श्रीवास्तव बनाम राज्य’ मामले में भी अदालत ने अपने पुराने आदेशों को दोहराते हुए सख्ती से पालन सुनिश्चित करने को कहा था। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिखाई दे रहा है।
खुलेआम बिक रहा प्रतिबंधित मांझा
याचिका में यह गंभीर आरोप लगाया गया है कि प्रतिबंधित चाइनीज मांझा आज भी खुलेआम बाजारों में बेचा जा रहा है। इतना ही नहीं, यह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भी आसानी से उपलब्ध है, जिससे इसकी पहुंच और अधिक बढ़ गई है।
यह स्थिति प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है, क्योंकि अदालत के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद इस पर रोक नहीं लग पाई है।
घटनाएं बनी चिंता का कारण
याची ने अदालत के सामने कई दर्दनाक घटनाओं का हवाला भी दिया है। 22 जनवरी 2026 को प्रयागराज में एक अधिवक्ता, अनूप श्रीवास्तव, चाइनीज मांझे की चपेट में आकर घायल हो गए थे। उनके गले में मांझा फंस गया था, जिससे गंभीर चोटें आईं।
इसके अलावा जौनपुर, उन्नाव, मेरठ और लखनऊ जैसे जिलों में भी पिछले एक साल के दौरान कई दुर्घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं में कुछ लोगों की जान भी जा चुकी है, जबकि कई अन्य गंभीर रूप से घायल हुए हैं।
जीवन के अधिकार का उल्लंघन
याचिका में यह भी कहा गया है कि चाइनीज मांझे का इस्तेमाल सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद हर नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
जब एक प्रतिबंधित और खतरनाक वस्तु खुलेआम उपलब्ध हो और उससे लोगों की जान जा रही हो, तो यह राज्य की जिम्मेदारी बनती है कि वह सख्त कदम उठाए।
अदालत की मंशा: जवाबदेही तय करना
हाईकोर्ट का यह रुख साफ दर्शाता है कि वह केवल आदेश देने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहता है कि उन आदेशों का पालन भी हो। अदालत ने एक महीने का समय देकर सरकार को अपनी कार्रवाई स्पष्ट करने का मौका दिया है।
यदि सरकार संतोषजनक जवाब नहीं देती है, तो आगे और कड़े निर्देश या कार्रवाई भी संभव है।
प्रशासन के सामने चुनौती
यह मामला प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। चाइनीज मांझा न सिर्फ सस्ता और मजबूत होता है, बल्कि यह धातु और कांच के मिश्रण से बना होता है, जो बेहद खतरनाक साबित होता है।
इसे रोकने के लिए केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर सख्ती से अमल भी जरूरी है। बाजारों की नियमित जांच, ऑनलाइन बिक्री पर निगरानी और जागरूकता अभियान इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।
आगे की सुनवाई
अदालत ने इस मामले में एक महीने बाद अगली सुनवाई तय की है। तब तक सरकार को यह बताना होगा कि उसने चाइनीज मांझे पर रोक लगाने के लिए क्या-क्या कदम उठाए हैं और भविष्य में क्या योजना है।
निष्कर्ष
प्रयागराज में उठे इस मुद्दे ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून का पालन केवल कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर होना चाहिए। चाइनीज मांझे जैसे खतरनाक उत्पाद पर प्रतिबंध तभी प्रभावी होगा, जब प्रशासन, सरकार और आम जनता मिलकर इसे गंभीरता से लें।
हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप न सिर्फ कानून के प्रति जवाबदेही तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, बल्कि यह नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी प्रयास है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस पर क्या जवाब देती है और क्या वाकई जमीनी स्तर पर कोई बदलाव नजर आता है या नहीं।
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