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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर: गर्मी के मौसम में महंगा हो सकता है बोतलबंद पानी

देश में भीषण गर्मी का दौर शुरू होते ही पानी की मांग तेजी से बढ़ जाती है। हर साल अप्रैल और मई के महीनों में तापमान नए रिकॉर्ड छूता है और इस बार भी मौसम विभाग ने कई इलाकों में पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार जाने की आशंका जताई है। ऐसे हालात में जहां लोगों को राहत के लिए साफ पेयजल की जरूरत सबसे ज्यादा होती है, वहीं एक नई चिंता सामने आ रही है—बोतलबंद पानी की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी।

इस बार समस्या सिर्फ गर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे वैश्विक स्तर पर चल रहा भू-राजनीतिक तनाव भी अहम भूमिका निभा रहा है। पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते टकराव ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों को प्रभावित किया है। तेल की कीमतों में आई तेजी का असर अब धीरे-धीरे भारत के उपभोक्ता बाजार तक पहुंचने लगा है।

दरअसल, बोतलबंद पानी की कीमतें सीधे तौर पर कच्चे तेल से जुड़ी होती हैं। प्लास्टिक की बोतलें बनाने में इस्तेमाल होने वाला पीईटी (पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट) रेजिन पेट्रोलियम उत्पादों से तैयार किया जाता है। जैसे ही कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, वैसे ही प्लास्टिक उत्पादन की लागत भी बढ़ जाती है। इसका सीधा असर बोतलबंद पानी और अन्य पैकेज्ड पेय पदार्थों की कीमतों पर पड़ता है।

भारत में पैकेज्ड पानी का बाजार तेजी से विस्तार कर रहा है और इसकी अनुमानित कीमत करीब 6 अरब डॉलर तक पहुंच चुकी है। हालांकि, यह उद्योग अब दबाव में नजर आ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी बनी रहती है और आपूर्ति बाधित होती है, तो कंपनियों के लिए मौजूदा कीमतों पर उत्पाद बेचना मुश्किल हो जाएगा। ऐसे में आने वाले हफ्तों में कीमतों में बढ़ोतरी लगभग तय मानी जा रही है।

गौरतलब है कि भारत में स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता अभी भी एक बड़ी चुनौती है। कई शहरी और ग्रामीण इलाकों में लोग सुरक्षित पानी के लिए बोतलबंद पानी पर निर्भर रहते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में लगभग 15 प्रतिशत परिवार और ग्रामीण इलाकों में करीब 6 प्रतिशत परिवार पीने के लिए पैकेज्ड पानी का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में अगर इसकी कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा।

पश्चिम एशिया में जारी तनाव का एक और महत्वपूर्ण असर सप्लाई चेन पर देखने को मिल रहा है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री मार्ग से तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है। यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा संभालता है। यहां किसी भी प्रकार की रुकावट का असर पूरी दुनिया के बाजार पर पड़ता है और भारत भी इससे अछूता नहीं है।

केवल पानी उद्योग ही नहीं, बल्कि पूरा पैकेजिंग सेक्टर इस संकट से जूझ रहा है। प्लास्टिक बोतलें बनाने के लिए जरूरी पीईटी प्रीफॉर्म की कीमतों में भारी उछाल देखा गया है। कुछ महीनों पहले तक इनकी कीमत करीब 115 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो अब बढ़कर लगभग 180 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है। इसके साथ ही बाजार में इनकी उपलब्धता भी घटती जा रही है।

इस बढ़ती लागत और कच्चे माल की कमी का असर उत्पादन पर भी पड़ रहा है। महाराष्ट्र जैसे बड़े औद्योगिक राज्य में बोतलबंद पानी से जुड़ी करीब 20 प्रतिशत इकाइयों ने अस्थायी रूप से अपना उत्पादन बंद कर दिया है। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे, तो आने वाले समय में और भी इकाइयों को बंद करना पड़ सकता है।

उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियां कुछ समय तक बढ़ी हुई लागत को खुद वहन कर सकती हैं, लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना संभव नहीं होगा। आखिरकार यह बोझ उपभोक्ताओं पर ही डाला जाएगा। यानी आने वाले दिनों में न सिर्फ बोतलबंद पानी, बल्कि जूस, कोल्ड ड्रिंक्स और अन्य पैकेज्ड उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं।

इस स्थिति ने सरकार और नीति निर्माताओं के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। एक ओर जहां महंगाई को नियंत्रित रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उद्योगों को भी राहत देना आवश्यक है। विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि सरकार को वैकल्पिक पैकेजिंग सामग्री को बढ़ावा देना चाहिए और स्थानीय स्तर पर उत्पादन बढ़ाने के उपाय करने चाहिए, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो सके।

इसके अलावा, जल संरक्षण और स्वच्छ पेयजल की उपलब्धता को बढ़ाने पर भी जोर देने की जरूरत है। अगर लोगों को आसानी से सुरक्षित और सस्ता पानी उपलब्ध हो सके, तो बोतलबंद पानी पर निर्भरता कम की जा सकती है। इससे न केवल खर्च घटेगा, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा होगा क्योंकि प्लास्टिक का उपयोग कम होगा।

आम उपभोक्ताओं के लिए यह समय सतर्क रहने का है। गर्मी के मौसम में पानी की जरूरत बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन यदि कीमतें बढ़ती हैं तो लोगों को अपने खर्चों का संतुलन बनाना होगा। साथ ही, जहां संभव हो, घरेलू स्तर पर पानी को शुद्ध करने के विकल्प अपनाने चाहिए।

कुल मिलाकर, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव सिर्फ अंतरराष्ट्रीय राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर सीधे आम आदमी की जिंदगी पर पड़ रहा है। बोतलबंद पानी जैसी रोजमर्रा की जरूरत भी इससे अछूती नहीं रही है। आने वाले हफ्तों में स्थिति किस दिशा में जाएगी, यह काफी हद तक वैश्विक हालात पर निर्भर करेगा, लेकिन फिलहाल संकेत यही हैं कि इस बार गर्मी में प्यास बुझाना जेब पर भारी पड़ सकता है।

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