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न्याय, समानता और सामाजिक समरसता पर ब्राह्मण समाज का मंथन

एनएएस इंटर कॉलेज में सवर्ण समाज के आह्वान पर आयोजित ब्राह्मण समाज संगठन की बैठक में न्याय व्यवस्था, यूजीसी कानून और सामाजिक समरसता जैसे संवेदनशील विषयों पर गहन चर्चा हुई। बैठक में समाज के विभिन्न वर्गों से आए वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक किसी को दंडित नहीं किया जाना चाहिए। इसके बावजूद कई मामलों में निर्दोष लोगों को वर्षों तक जेल में रहना पड़ता है और बाद में अदालतें उन्हें बेगुनाह करार देकर रिहा कर देती हैं, जो कि न्याय प्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

बैठक को संबोधित करते हुए संगठन के अध्यक्ष कुलदीप शर्मा ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यूजीसी से जुड़े विवादित कानून पर रोक लगाना एक स्वागतयोग्य और ऐतिहासिक कदम है। उन्होंने कहा कि ऐसे कानून या निर्णय, जो समाज को जाति या वर्ग के आधार पर बांटने का काम करते हैं, लोकतंत्र और संविधान की मूल भावना के विपरीत हैं। कुलदीप शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि समाज की एकता और सौहार्द बनाए रखना केवल समाज का ही नहीं, बल्कि सरकार का भी दायित्व है। यदि कोई नियम या कानून सामाजिक ताने-बाने को कमजोर करता है, तो उसके खिलाफ कठोर कदम उठाए जाने चाहिए, ताकि भविष्य में इस तरह की पुनरावृत्ति न हो।

कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ सदस्य जितेंद्र गौतम ने की। उन्होंने अपने संबोधन में कहा कि कानून बनाते समय जनभावनाओं और जमीनी हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी कानून के कारण समाज में असंतोष और विभाजन बढ़ता है, तो जनप्रतिनिधियों को समय रहते इसका विरोध करना चाहिए। उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का फैसला निश्चित रूप से सराहनीय है, लेकिन यह भी जरूरी है कि भविष्य में ऐसे कानून दोबारा लाने की कोशिश न की जाए। यदि ऐसा होता है तो समाज खुलकर और संगठित होकर विरोध करेगा।

बैठक का संचालन स्थायी समिति सदस्य अजय शर्मा ने किया। उन्होंने कहा कि सवर्ण समाज ने हमेशा सभी वर्गों के साथ समान व्यवहार किया है और कभी भी किसी जाति या समुदाय का अपमान नहीं किया। अजय शर्मा ने सवाल उठाया कि यदि किसी व्यक्ति पर आरोप साबित नहीं होते, तो उसे 15 या 20 वर्षों तक जेल में रखना कहां तक न्यायसंगत है। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटनाएं न केवल पीड़ित व्यक्ति का जीवन बर्बाद कर देती हैं, बल्कि उसके परिवार और समाज पर भी गहरा असर डालती हैं।

मंत्री पुनीत शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि ऐसे कानून, जो समाज में आपसी वैमनस्य और द्वेष को बढ़ावा देते हैं, उनका सर्व समाज को मिलकर विरोध करना चाहिए। उन्होंने कहा कि दंड देने का अधिकार तभी प्रयोग में लाया जाना चाहिए, जब किसी व्यक्ति का दोष पूरी तरह सिद्ध हो जाए। कानून का उद्देश्य समाज में भय पैदा करना नहीं, बल्कि न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।

स्थायी समिति सदस्य जितेंद्र गौतम ने भी इस बात पर जोर दिया कि यदि पहले ऐसे मुद्दों पर सशक्त और संगठित विरोध किया गया होता, तो आज हालात कुछ और होते। उन्होंने कहा कि नियम और कानून बनाते समय यह देखा जाना चाहिए कि उसका प्रभाव समाज के हर वर्ग पर कैसा पड़ेगा। किसी भी कानून का इस्तेमाल हथियार के रूप में नहीं होना चाहिए, जिससे समाज में नफरत और विभाजन फैले।

प्रशांत कौशिक ने कहा कि यदि किसी को कानूनी रूप से ऐसा अधिकार या हथियार दे दिया जाए, जिससे वह समाज में द्वेष फैला सके, तो यह पूरे देश के लिए घातक साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि कानून की आड़ में किसी निर्दोष को परेशान करना या बदनाम करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। वहीं आरके पचौरी ने कहा कि यदि पहले इस तरह के मुद्दों पर मजबूती से आवाज उठाई गई होती, तो आज समाज को इस तरह की परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता।

बैठक में शंकराचार्य से जुड़ी हालिया घटनाओं पर भी चिंता व्यक्त की गई। वक्ताओं ने कहा कि धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं का सम्मान बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है और किसी भी तरह की असंवेदनशील कार्रवाई से समाज में असंतोष फैलता है। उत्तर प्रदेश संयुक्त बार एसोसिएशन के क्षेत्रीय अध्यक्ष और जिला बार के पूर्व महामंत्री आनंद कश्यप ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला हर भारतीय नागरिक के लिए एक नजीर बनेगा। उन्होंने कहा कि अब यूजीसी को इस पूरे मामले में अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में ऐसे विवाद दोबारा न खड़े हों।

बैठक के अंत में यह संकल्प लिया गया कि न्याय, समानता और सामाजिक समरसता के मुद्दों पर ब्राह्मण समाज और सवर्ण समाज आगे भी संगठित होकर आवाज उठाता रहेगा। कार्यक्रम में गणेश दत्त शर्मा, विशाल त्यागी, भूषण शर्मा सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग मौजूद रहे। सभी ने एकजुट होकर यह संदेश दिया कि न्याय और संविधान के मूल सिद्धांतों से कोई भी समझौता स्वीकार्य नहीं होगा।

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