प्रयागराज के माघ मेले में इस बार आस्था के साथ-साथ वैभव की भी खूब चर्चा हो रही है। वजह हैं पीले वस्त्रों में दिखाई देने वाले संत — सतुआ बाबा उर्फ संतोष दास जी महाराज, जिनका काफ़िला करोड़ों रुपये की पोर्श और डिफेंडर जैसी लग्ज़री कारों से सजा नजर आया। सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें और वीडियो वायरल होते ही लोग जानना चाहते हैं कि आखिर ये सतुआ बाबा कौन हैं?

सतुआ बाबा अक्सर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ नजर आते हैं। उनकी पहचान सिर्फ एक संत तक सीमित नहीं है, बल्कि वे एक प्राचीन धार्मिक पीठ के वर्तमान मुखिया भी हैं। सोशल मीडिया पर कभी उन्हें प्राइवेट जेट में देखा जाता है तो कभी महंगी गाड़ियों के साथ, जिसने लोगों की जिज्ञासा और बढ़ा दी है।
पीले वस्त्रों वाले संत की पहचान

संतोष दास जी महाराज हमेशा पीले वस्त्रों में दिखाई देते हैं। यह उनका विशिष्ट स्वरूप बन चुका है। वे काशी के मणिकर्णिका घाट स्थित सतुआ बाबा पीठ के वर्तमान महंत हैं। यह पीठ न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि वैदिक शिक्षा का भी प्रमुख स्थान माना जाता है।
सतुआ बाबा पीठ का इतिहास
सतुआ बाबा पीठ की स्थापना वर्ष 1803 में हुई थी। इसकी नींव गुजरात निवासी संत जेठा पटेल ने रखी थी, जिन्होंने गृहस्थ जीवन त्यागकर काशी में संन्यास लिया। इस आश्रम की परंपरा के अनुसार इसके मुखिया को ‘सतुआ बाबा’ कहा जाता है। यहां बटुकों को वेद, शास्त्र और सनातन परंपराओं की शिक्षा दी जाती है।
साधारण परिवार से महामंडलेश्वर तक
वर्तमान सतुआ बाबा, संतोष दास, उत्तर प्रदेश के ललितपुर ज़िले के एक साधारण ब्राह्मण परिवार से आते हैं। महज 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और काशी पहुंच गए। यहीं उनका संपर्क सतुआ बाबा पीठ से हुआ। उनकी प्रतिभा और वैदिक ज्ञान को देखते हुए उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया गया।
महज 19 साल की उम्र में संतोष दास को महामंडलेश्वर की उपाधि दी गई, जो इतिहास में अब तक की सबसे कम उम्र मानी जाती है। आज वे वैष्णव संप्रदाय के निर्मोही अखाड़े से जुड़े एक प्रभावशाली संत हैं।
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