कानपुर के रेउना क्षेत्र से सामने आया साइबर ठगी का मामला अब एक बड़े नेटवर्क का रूप लेता जा रहा है। पुलिस की जांच में ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जो यह बताते हैं कि अपराधियों ने बेहद सुनियोजित तरीके से ठगी का पूरा तंत्र खड़ा किया हुआ था। महज छह महीनों के भीतर 12 बैंक खातों के जरिए करीब 40 लाख रुपये का संदिग्ध लेनदेन किया गया। पुलिस ने अब तक करीब 10 लाख रुपये फ्रीज कर दिए हैं और बाकी रकम की जांच जारी है।

रिश्तों के नाम पर खुले फर्जी खाते
जांच में सामने आया है कि गिरोह के सदस्यों ने अपने रिश्तेदारों और परिचितों के नाम पर कई बैंक खातों को खुलवाया था। इन खातों का इस्तेमाल ठगी से हासिल रकम को छिपाने और इधर-उधर ट्रांसफर करने के लिए किया जाता था।
ग्रामीण बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ बड़ौदा जैसे प्रमुख बैंकों में ये खाते सक्रिय थे। पुलिस का मानना है कि इन खातों के जरिए पैसे को कई स्तरों पर घुमाया जाता था, ताकि उसका स्रोत छिपाया जा सके।
40 लाख का जाल, 40 खातों में बंटी रकम
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, शुरुआती जांच में 13 खातों का पता चला, जिनसे करीब 40 लाख रुपये का लेनदेन हुआ। यह रकम लगभग 40 अन्य खातों में ट्रांसफर की गई थी।
इसके अलावा, बैंक ऑफ बड़ौदा के 12 और खातों की जानकारी भी सामने आई है, जिनमें इसी तरह के संदिग्ध ट्रांजेक्शन पाए गए हैं। इससे यह साफ होता है कि गिरोह का नेटवर्क काफी बड़ा और व्यवस्थित था।
‘म्यूल अकाउंट’ का खेल
जांच में यह भी पता चला कि इन खातों को ‘म्यूल अकाउंट’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा था। यानी ऐसे खाते, जिनके असली धारक का अपराध से सीधा संबंध नहीं होता, लेकिन उनका उपयोग अवैध लेनदेन के लिए किया जाता है।
इन खातों का संचालन गिरोह के कुछ सदस्य ऑनलाइन माध्यम से करते थे, जिससे वे कहीं भी बैठे-बैठे पूरे नेटवर्क को नियंत्रित कर सकते थे।
बैंक में पहुंची महिला से खुला नया सुराग
जांच के दौरान एक महत्वपूर्ण घटना तब हुई, जब बैंक ऑफ बड़ौदा की एक शाखा में एक महिला संदिग्ध खाते से पैसे निकालने पहुंच गई। बैंक अधिकारियों ने तुरंत पुलिस को सूचना दी।
पूछताछ में पता चला कि यह खाता अशोक नामक आरोपी का है, जो पहले ही साइबर ठगी के मामले में जेल में बंद है। महिला उसकी पत्नी थी और खाते से पैसे निकालने आई थी।
हालांकि, पूछताछ के बाद महिला को छोड़ दिया गया, लेकिन इस घटना ने यह संकेत दिया कि गिरोह के सदस्य अभी भी अपने खातों को सक्रिय रखने की कोशिश कर रहे हैं।
गांवों में छिपा था ठगी का ‘कॉल सेंटर’
इस मामले की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि साइबर ठगों ने अपने ऑपरेशन के लिए शहरों के बजाय गांवों को चुना। घाटमपुर और कानपुर देहात के कई गांवों में झोपड़ियों और खंडहर जैसे मकानों को उनका ठिकाना बनाया गया था।
यहीं से वे लोगों को कॉल कर ठगी करते थे। यह एक तरह का अस्थायी ‘कॉल सेंटर’ था, जो पूरी तरह गुप्त तरीके से संचालित होता था।
झोपड़ियों से मिले अहम सबूत
जब पुलिस और क्राइम ब्रांच की टीम ने रेउना थाना क्षेत्र के गांवों में छापेमारी की, तो वहां से कई संदिग्ध वस्तुएं बरामद हुईं। इनमें चूल्हा, लकड़ी, शराब की बोतलें, खाने-पीने का सामान और अन्य वस्तुएं शामिल थीं।
इनसे यह अंदाजा लगाया गया कि आरोपी इन झोपड़ियों में लंबे समय तक रुकते थे और यहीं से अपना पूरा ऑपरेशन चलाते थे।
रात के अंधेरे में चलता था खेल
जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह के सदस्य रात के समय ज्यादा सक्रिय रहते थे। अंधेरे में वे झोपड़ियों में बैठकर फोन कॉल करते थे और लोगों को ठगते थे।
इस रणनीति से वे पुलिस और आम लोगों की नजर से बच जाते थे। दिन के मुकाबले रात में उनकी गतिविधियां ज्यादा तेज होती थीं।
अन्य गिरोहों से भी जुड़े तार
पुलिस को यह भी जानकारी मिली है कि इस गिरोह के संबंध कानपुर देहात के अन्य साइबर अपराधियों से भी हैं। कुछ महीने पहले इसी इलाके से एक अन्य गिरोह पकड़ा गया था, जो इसी तरह की ठगी में शामिल था।
अब जांच में यह सामने आ रहा है कि ये गिरोह आपस में जुड़े हुए थे और एक-दूसरे के नेटवर्क का उपयोग कर रहे थे।
पुलिस की सख्ती और आगे की कार्रवाई
पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कई टीमों का गठन किया है। गांवों में लगातार छापेमारी और निगरानी की जा रही है। फरार आरोपियों की तलाश तेज कर दी गई है।
गिरोह के सरगना सुशील कुमार के बारे में भी जानकारी जुटाई जा रही है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।
साइबर अपराध का नया तरीका
रेउना कांड यह दिखाता है कि साइबर अपराध अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं रहे। छोटे गांवों और दूरदराज इलाकों से भी बड़े स्तर पर ठगी की जा रही है।
अपराधी अब तकनीक और साधारण संसाधनों का मिश्रण कर नए तरीके अपना रहे हैं, जिससे उन्हें पकड़ना और भी मुश्किल हो गया है।
जागरूकता की जरूरत
इस तरह के मामलों से बचने के लिए आम लोगों को भी सतर्क रहने की जरूरत है। अनजान कॉल, लिंक या ऑफर पर भरोसा करने से बचना चाहिए और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत पुलिस को देनी चाहिए।
निष्कर्ष
रेउना साइबर कांड एक बड़ा खुलासा है, जिसने यह दिखा दिया कि अपराधी किस तरह संगठित होकर काम कर रहे हैं। 6 महीनों में 40 लाख रुपये की ठगी इस बात का प्रमाण है कि यह नेटवर्क कितना मजबूत था।
अब पुलिस की कार्रवाई से उम्मीद है कि जल्द ही इस गिरोह का पूरी तरह पर्दाफाश होगा और सभी आरोपी कानून के शिकंजे में होंगे। साथ ही, यह मामला लोगों के लिए भी एक चेतावनी है कि वे सतर्क रहें और साइबर अपराध से बचने के लिए सावधानी बरतें।
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