पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ अमेरिकी शेयर बाजार को भी हिला कर रख दिया है। बीते कुछ हफ्तों से जारी अनिश्चितता के माहौल में निवेशकों का भरोसा डगमगाता नजर आ रहा है। सोमवार को अमेरिकी बाजार में इसी अस्थिरता की झलक देखने को मिली, जहां प्रमुख सूचकांक अलग-अलग दिशाओं में चलते दिखे। एक तरफ जहां S&P 500 में गिरावट दर्ज की गई, वहीं Dow Jones Industrial Average मामूली बढ़त के साथ बंद हुआ और Nasdaq Composite में कमजोरी देखने को मिली।

दिन की शुरुआत हालांकि सकारात्मक रही थी। शुरुआती कारोबार में S&P 500 करीब 0.9 प्रतिशत तक चढ़ गया था, लेकिन जैसे-जैसे बाजार में तेल की कीमतों और ईरान से जुड़े तनाव की खबरें हावी होती गईं, यह बढ़त जल्द ही खत्म हो गई। अंततः यह सूचकांक 0.4 प्रतिशत की गिरावट के साथ बंद हुआ और अब अपने साल के उच्चतम स्तर से करीब 9 प्रतिशत नीचे आ चुका है। डाउ जोंस में हल्की मजबूती रही और यह करीब 49 अंकों की बढ़त के साथ बंद हुआ, जबकि नैस्डैक में 0.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई।
इस अस्थिरता की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष और उससे प्रभावित होती वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति है। खासतौर पर ईरान से जुड़ी घटनाओं ने तेल बाजार को झटका दिया है। जैसे-जैसे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे महंगाई का दबाव भी बढ़ने की आशंका है। यही कारण है कि निवेशक अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर महंगाई कब काबू में आएगी और क्या केंद्रीय बैंक इसे रोकने के लिए सख्त कदम उठाएंगे।
इसी बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने भी स्थिति को लेकर बयान दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि ईरान के साथ सैन्य अभियान को समाप्त करने की दिशा में प्रगति हो रही है और एक नई व्यवस्था की ओर बढ़ा जा रहा है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि जल्द कोई समाधान नहीं निकला और हॉर्मुज की खाड़ी को तुरंत नहीं खोला गया, तो अमेरिका कड़े कदम उठा सकता है। इस तरह के बयान बाजार में अनिश्चितता को और बढ़ाते हैं, जिससे निवेशकों की चिंता गहराती है।
अगर पिछले कुछ हफ्तों के रुझान पर नजर डालें तो अमेरिकी शेयर बाजार लगातार दबाव में नजर आ रहा है। S&P 500 अपने जनवरी के रिकॉर्ड स्तर से करीब 8-9 प्रतिशत नीचे आ चुका है, जबकि डाउ जोंस और नैस्डैक दोनों अपने उच्चतम स्तर से 10 प्रतिशत से ज्यादा गिर चुके हैं। बाजार विशेषज्ञ इस स्थिति को “करेक्शन” के रूप में देख रहे हैं, जिसका मतलब है कि शेयरों की कीमतों में एक सीमित लेकिन महत्वपूर्ण गिरावट आ चुकी है।
हालांकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह गिरावट बहुत लंबे समय तक नहीं चल सकती, बशर्ते अमेरिकी अर्थव्यवस्था मंदी की ओर न बढ़े। यहां सबसे अहम भूमिका Federal Reserve की है। यदि फेडरल रिजर्व बढ़ती महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि करता है, तो इसका असर सीधे तौर पर निवेश और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ेगा। ऊंची ब्याज दरें जहां महंगाई को काबू में ला सकती हैं, वहीं यह आर्थिक विकास की गति को धीमा भी कर सकती हैं।
तेल की ऊंची कीमतें इस समय सबसे बड़ी चिंता का कारण बनी हुई हैं। ऊर्जा की लागत बढ़ने से कंपनियों के मुनाफे पर असर पड़ता है, जिससे उनके शेयरों की कीमतें गिरती हैं। इसके साथ ही, आम उपभोक्ताओं के लिए भी खर्च बढ़ जाता है, जिससे मांग में कमी आ सकती है। यह पूरा चक्र अर्थव्यवस्था को धीमा करने की दिशा में काम करता है।
बॉन्ड बाजार में भी इसी अस्थिरता का असर देखा गया। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड 4.44 प्रतिशत से घटकर 4.35 प्रतिशत पर आ गई। आमतौर पर यील्ड में गिरावट इस बात का संकेत होती है कि निवेशक सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं। जब शेयर बाजार में जोखिम बढ़ता है, तो निवेशक बॉन्ड जैसे सुरक्षित साधनों में पैसा लगाने लगते हैं।
कंपनी स्तर पर भी बाजार में हलचल देखने को मिली। Sysco Corporation ने Jetro Restaurant Depot को 21.6 बिलियन डॉलर में खरीदने का ऐलान किया, लेकिन इस खबर के बाद उसके शेयरों में 15 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट आ गई। दूसरी ओर, Alcoa के शेयरों में 8 प्रतिशत से अधिक की बढ़त दर्ज की गई, क्योंकि पश्चिम एशिया में तनाव के चलते प्रतिस्पर्धी कंपनियों पर असर पड़ा है।
वैश्विक बाजारों की बात करें तो तस्वीर मिश्रित रही। यूरोप के प्रमुख सूचकांक जैसे FTSE 100 और CAC 40 में बढ़त देखने को मिली, जबकि एशियाई बाजारों में गिरावट का माहौल रहा। दक्षिण कोरिया का Kospi करीब 3 प्रतिशत गिरा, जापान का Nikkei 225 2.8 प्रतिशत नीचे आया और हांगकांग का Hang Seng Index भी गिरावट के साथ बंद हुआ।
कुल मिलाकर, मौजूदा हालात में अमेरिकी शेयर बाजार कई तरह के दबावों का सामना कर रहा है। एक तरफ भू-राजनीतिक तनाव है, दूसरी ओर तेल की बढ़ती कीमतें और तीसरी ओर महंगाई को लेकर अनिश्चितता। निवेशकों के लिए यह समय काफी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि उन्हें हर कदम सोच-समझकर उठाना पड़ रहा है।
आने वाले दिनों में बाजार की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि पश्चिम एशिया का तनाव कितना जल्दी कम होता है और तेल की कीमतें किस स्तर पर स्थिर होती हैं। इसके अलावा, फेडरल रिजर्व के फैसले भी बाजार की चाल तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। फिलहाल, निवेशकों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या महंगाई जल्द काबू में आएगी या बाजार में यह उथल-पुथल अभी जारी रहेगी?
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