भारत में स्वास्थ्य को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में हर आठ में से एक व्यक्ति किसी न किसी बीमारी से जूझ रहा है। यदि इसे प्रतिशत में समझें तो लगभग 13 फीसदी आबादी बीमार है। यह स्थिति केवल बुजुर्गों या बच्चों तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब युवा वर्ग भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहा है। खासकर दिल से जुड़ी बीमारियों में पिछले सात वर्षों में जो उछाल आया है, वह स्वास्थ्य व्यवस्था और समाज दोनों के लिए गंभीर चेतावनी है।

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की हालिया स्वास्थ्य रिपोर्ट, जो जनवरी से दिसंबर 2025 के दौरान किए गए सर्वेक्षण पर आधारित है, देश में स्वास्थ्य संबंधी रुझानों को उजागर करती है। रिपोर्ट बताती है कि बीमारियों का स्वरूप अब तेजी से बदल रहा है। जहां पहले संक्रामक बीमारियां प्रमुख थीं, वहीं अब जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जैसे हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और मधुमेह तेजी से बढ़ रही हैं।
जीवनशैली की बीमारियों का बढ़ता दायरा
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, अनियमित खानपान, तनाव और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला है। रिपोर्ट के अनुसार, देश की करीब आधी आबादी किसी न किसी रूप में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से प्रभावित है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि आधुनिक जीवनशैली धीरे-धीरे लोगों को बीमार बना रही है।
दिल की बीमारियां इस सूची में सबसे ऊपर हैं। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2017-18 में प्रति एक लाख लोगों पर दिल के मरीजों की संख्या 1,333 थी, जो 2025 तक बढ़कर 3,891 हो गई है। यानी करीब तीन गुना वृद्धि। कुल बीमारियों में हृदय रोगों की हिस्सेदारी 25.6 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो इसे सबसे बड़ा स्वास्थ्य खतरा बनाती है।
युवाओं में बढ़ती चिंता
पहले यह माना जाता था कि दिल की बीमारियां उम्रदराज लोगों को अधिक प्रभावित करती हैं, लेकिन अब यह धारणा बदल रही है। 15 से 29 वर्ष के युवाओं में भी दिल और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। हालांकि इस आयु वर्ग में कुल बीमारी की दर अपेक्षाकृत कम, लगभग 4 से 5 प्रतिशत है, लेकिन इस समूह में बीमारियों की प्रकृति चिंताजनक है।
युवाओं में संक्रमण के साथ-साथ पेट संबंधी और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं भी बढ़ रही हैं। बढ़ता तनाव, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल जीवनशैली इसका बड़ा कारण माने जा रहे हैं। यह संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में यह आयु वर्ग भी गंभीर बीमारियों के जोखिम में आ सकता है।
बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति
रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों और बुजुर्गों में बीमारी की दर सबसे अधिक है। 0 से 14 वर्ष के बच्चों में संक्रमण और सांस से जुड़ी बीमारियां प्रमुख हैं। बुखार, खांसी और गले में संक्रमण जैसी समस्याएं आम हैं। छोटे बच्चों, विशेषकर 0 से 4 वर्ष के आयु वर्ग में करीब 9 से 10 प्रतिशत बच्चे बीमार पाए गए।
वहीं, 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में बीमारी का स्तर सबसे ज्यादा है। इस वर्ग में 42 से 45 प्रतिशत लोगों ने खुद को बीमार बताया। इसके बाद 45 से 59 वर्ष के आयु वर्ग में 20 से 25 प्रतिशत लोग बीमार पाए गए। यह दर्शाता है कि उम्र बढ़ने के साथ बीमारियों का खतरा तेजी से बढ़ता है।
महिलाएं पुरुषों से अधिक प्रभावित
रिपोर्ट में लिंग आधारित अंतर भी सामने आया है। महिलाओं में बीमारी की दर पुरुषों की तुलना में अधिक पाई गई। प्रति एक लाख आबादी पर महिलाओं में 17,006 मामलों की तुलना में पुरुषों में 13,504 मामले दर्ज किए गए। इसी तरह प्रतिशत के हिसाब से महिलाओं में 14.4 फीसदी और पुरुषों में 11.8 फीसदी लोग बीमार पाए गए।
यह अंतर कई कारणों से हो सकता है, जिनमें पोषण की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच और सामाजिक कारण शामिल हैं। महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता और सुविधाओं में सुधार की जरूरत साफ नजर आती है।
शहरी बनाम ग्रामीण अंतर
रिपोर्ट यह भी बताती है कि शहरों में रहने वाले लोग गांवों की तुलना में अधिक बीमार हैं। शहरी इलाकों में करीब 14.9 प्रतिशत लोग बीमार पाए गए, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 12.2 प्रतिशत है। इसका एक बड़ा कारण शहरी जीवनशैली है, जिसमें तनाव, प्रदूषण, फास्ट फूड और शारीरिक गतिविधियों की कमी शामिल है।
हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी एक बड़ी चुनौती है, फिर भी पारंपरिक जीवनशैली के कारण वहां कुछ बीमारियों का प्रभाव अपेक्षाकृत कम देखा गया है।
संक्रामक बीमारियों में गिरावट
एक सकारात्मक पहलू यह है कि संक्रामक बीमारियों में कमी दर्ज की गई है। वर्ष 2017-18 में प्रति एक लाख आबादी पर 2,547 मामले थे, जो 2025 में घटकर 2,302 रह गए हैं। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं, टीकाकरण और जागरूकता अभियानों का परिणाम माना जा सकता है।
लेकिन इसके साथ ही गैर-संक्रामक बीमारियों का बढ़ना एक नई चुनौती बनकर उभरा है, जो लंबे समय तक इलाज और अधिक खर्च की मांग करता है।
उम्र के साथ बढ़ता दिल का खतरा
दिल की बीमारियों का जोखिम उम्र के साथ तेजी से बढ़ता है। छोटे बच्चों में यह खतरा बहुत कम, लगभग 0.3 प्रतिशत है, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, यह आंकड़ा तेजी से बढ़ता है। 30 से 44 वर्ष के लोगों में यह 15.3 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। 45 से 59 वर्ष के लोगों में यह 30.1 प्रतिशत और 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में 37.8 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।
यह आंकड़े बताते हैं कि समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो आने वाले समय में स्थिति और गंभीर हो सकती है।
निष्कर्ष: चेतावनी और समाधान की जरूरत
यह रिपोर्ट एक स्पष्ट संकेत देती है कि भारत में स्वास्थ्य संकट धीरे-धीरे गहराता जा रहा है। जीवनशैली में बदलाव, बढ़ता तनाव और असंतुलित आहार इसके प्रमुख कारण हैं। यदि समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और बिगड़ सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, तनाव प्रबंधन और समय-समय पर स्वास्थ्य जांच से इन बीमारियों से काफी हद तक बचाव किया जा सकता है। साथ ही, सरकार और समाज दोनों को मिलकर स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ और प्रभावी बनाने की दिशा में काम करना होगा।
अंततः, यह केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है—एक स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए अभी से कदम उठाने होंगे।
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