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अमेरिकी हमले से पहले ईरानी युद्धपोत को भारत ने दी शरण, कोच्चि में डॉकिंग की अनुमति से बढ़ी कूटनीतिक हलचल

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच बढ़ती टकराहट के बीच एक अहम समुद्री घटनाक्रम सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरानी नौसेना के एक युद्धपोत पर अमेरिकी हमले से कुछ दिन पहले ही ईरान ने भारत से अपने एक अन्य युद्धपोत को आपात स्थिति में बंदरगाह पर ठहराने की अनुमति मांगी थी। भारत सरकार ने इस अनुरोध को स्वीकार करते हुए उस जहाज को केरल के कोच्चि बंदरगाह पर डॉकिंग की अनुमति दे दी। फिलहाल यह युद्धपोत वहीं मौजूद है और उसके चालक दल को भारतीय नौसैनिक सुविधाओं में ठहराया गया है।


सरकारी सूत्रों के अनुसार, ईरान ने फरवरी के अंत में भारत से औपचारिक रूप से संपर्क किया था। इस अनुरोध में ईरानी युद्धपोत “आईरिस लावन” के लिए तत्काल तकनीकी सहायता और सुरक्षित डॉकिंग की अनुमति मांगी गई थी। ईरान का कहना था कि जहाज में गंभीर तकनीकी समस्या आ गई है और उसे तुरंत सुरक्षित बंदरगाह की जरूरत है।
जानकारी के अनुसार, यह युद्धपोत पहले भारत में आयोजित अंतरराष्ट्रीय नौसैनिक कार्यक्रम में भाग लेने आया था। 15 से 25 फरवरी के बीच भारत में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू और बहुराष्ट्रीय नौसैनिक अभ्यास “मिलन 2026” आयोजित किया गया था, जिसमें कई देशों की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। ईरान का युद्धपोत आईरिस लावन भी इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए भारत पहुंचा था।
कार्यक्रम समाप्त होने के कुछ दिन बाद जहाज में तकनीकी समस्या आने की सूचना दी गई। इसके बाद 28 फरवरी को ईरान सरकार ने भारत से आपात अनुरोध किया कि जहाज को तत्काल कोच्चि में डॉकिंग की अनुमति दी जाए। भारत ने इस अनुरोध पर सकारात्मक रुख दिखाया और एक दिन बाद यानी 1 मार्च को आधिकारिक रूप से अनुमति दे दी।
इसके बाद ईरानी युद्धपोत 4 मार्च को कोच्चि पहुंच गया। फिलहाल यह जहाज कोच्चि बंदरगाह पर ही खड़ा है और उसकी तकनीकी जांच और मरम्मत का काम चल रहा है। जहाज पर मौजूद लगभग 183 चालक दल के सदस्यों को कोच्चि स्थित नौसैनिक ठिकानों में रहने की व्यवस्था दी गई है।
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसी समय पश्चिम एशिया में तनाव अचानक बढ़ गया था। 28 फरवरी को ही अमेरिका और इस्राइल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू होने की खबरें सामने आई थीं। ऐसे में ईरान के युद्धपोत को भारत में डॉकिंग की अनुमति मिलने को कई विशेषज्ञ क्षेत्रीय कूटनीति के नजरिये से भी महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
इसी बीच एक और बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब ईरानी नौसेना के युद्धपोत “आईरिस डेना” पर श्रीलंका के दक्षिण में समुद्र में हमला हुआ। यह हमला कथित रूप से एक अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा किया गया था। इस हमले में जहाज को भारी नुकसान पहुंचा और चालक दल के कई सदस्य हताहत हो गए।
सूत्रों के अनुसार, जहाज पर कुल लगभग 180 नौसैनिक सवार थे। हमले के बाद आई खबरों के मुताबिक उनमें से 87 लोगों की मौत हो गई। यह घटना हिंद महासागर क्षेत्र में हाल के वर्षों की सबसे गंभीर नौसैनिक घटनाओं में से एक मानी जा रही है।
हमले के बाद क्षेत्र में तुरंत बचाव अभियान शुरू किया गया। श्रीलंका की नौसेना ने समुद्र में फंसे कई नाविकों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कुल 32 लोगों को सुरक्षित निकाला गया और उन्हें श्रीलंका के अस्पतालों में भर्ती कराया गया, जहां उनका इलाज जारी है।
भारत ने भी इस बचाव अभियान में सक्रिय भूमिका निभाई। भारतीय नौसेना ने तुरंत सहायता के लिए अपने जहाजों और विमानों को तैनात किया। भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस तरंगिनी और आईएनएस इक्षक को क्षेत्र में भेजा गया। इसके अलावा समुद्री निगरानी के लिए पी-8आई गश्ती विमान भी तैनात किए गए।
भारतीय नौसेना की यह कार्रवाई मानवीय सहायता और समुद्री सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत लंबे समय से “सुरक्षा और सहयोग” की नीति पर काम करता रहा है। संकट की स्थिति में आसपास के देशों को सहायता देना उसी नीति का हिस्सा माना जाता है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कूटनीतिक स्तर पर भी हलचल तेज हो गई। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में हालिया घटनाओं, क्षेत्रीय सुरक्षा स्थिति और ईरानी युद्धपोत पर हुए हमले के मुद्दे पर चर्चा हुई।
सूत्रों के अनुसार, ईरानी विदेश मंत्री ने अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी आलोचना की और इसे आक्रामक कदम बताया। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में इस प्रकार का हमला अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है और इसे गंभीर अपराध के रूप में देखा जाना चाहिए।
अराघची ने इस मामले को अंतरराष्ट्रीय कानूनी मंचों पर उठाने की बात भी कही। उनका कहना था कि इस तरह की घटनाओं से वैश्विक समुद्री सुरक्षा को खतरा पैदा होता है और अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना होती है।
ईरान के विदेश मंत्री ने केवल भारत ही नहीं बल्कि श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिथा हेराथ से भी संपर्क किया। इस बातचीत में हमले के बाद की स्थिति और घायल नाविकों की मदद से जुड़े मुद्दों पर चर्चा की गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ते रणनीतिक तनाव को दर्शाता है। पिछले कुछ वर्षों में यह क्षेत्र वैश्विक शक्तियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण बन गया है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों के कारण इस क्षेत्र की रणनीतिक अहमियत लगातार बढ़ रही है।
भारत के लिए भी यह स्थिति कूटनीतिक संतुलन बनाए रखने की चुनौती पेश करती है। भारत के अमेरिका के साथ मजबूत रणनीतिक संबंध हैं, वहीं ईरान के साथ भी उसके ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय सहयोग के लिहाज से भी ईरान भारत के लिए महत्वपूर्ण देश माना जाता है।
कोच्चि में ईरानी युद्धपोत को डॉकिंग की अनुमति देना कई विशेषज्ञों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय समुद्री परंपराओं के अनुरूप कदम है। यदि किसी जहाज को तकनीकी समस्या होती है या उसे आपात सहायता की जरूरत होती है, तो उसे सुरक्षित बंदरगाह में प्रवेश की अनुमति दी जा सकती है।
फिलहाल आईरिस लावन के कोच्चि में मौजूद होने और क्षेत्र में जारी तनाव को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी नजर रखी जा रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस घटनाक्रम का क्षेत्रीय कूटनीति और समुद्री सुरक्षा पर क्या असर पड़ता है।
कुल मिलाकर यह मामला केवल एक नौसैनिक घटना नहीं है, बल्कि इसके कई रणनीतिक, मानवीय और कूटनीतिक पहलू भी सामने आ रहे हैं। भारत, ईरान, अमेरिका और हिंद महासागर क्षेत्र के अन्य देशों के बीच संतुलन और सहयोग आने वाले समय में इस मुद्दे को और अधिक महत्वपूर्ण बना सकता है।

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