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जेवर एयरपोर्ट ने बदली गांवों की तस्वीर: मुआवजे से आई चमक, लेकिन रोजगार का सवाल अब भी कायम

उत्तर प्रदेश के जेवर में बन रहे नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट ने आसपास के गांवों की तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। जिन गांवों में कभी साइकिल और मोटरसाइकिल ही लोगों की पहचान हुआ करती थी, वहां अब महंगी एसयूवी और लग्जरी गाड़ियां आम नजर आने लगी हैं। कुछ गांवों में तो एक ही दिन में कई नई स्कॉर्पियो गाड़ियों के पहुंचने की चर्चा आज भी लोगों के बीच होती है। जमीन अधिग्रहण के बदले मिले करोड़ों रुपये ने किसानों की जिंदगी में अचानक समृद्धि ला दी, लेकिन इस आर्थिक बदलाव के साथ कई नई चुनौतियां भी सामने आई हैं।

एयरपोर्ट परियोजना के लिए सरकार ने दो चरणों में हजारों हेक्टेयर जमीन का अधिग्रहण किया। इसके बदले करीब सात हजार किसानों को आठ हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का मुआवजा दिया गया। इस रकम ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ऐसा बदलाव लाया कि गांवों की पहचान ही बदल गई। जिन परिवारों ने कभी एक साथ लाखों रुपये नहीं देखे थे, उनके खातों में करोड़ों रुपये पहुंच गए। कई लोगों ने इस पैसे से बड़े मकान बनाए, नई गाड़ियां खरीदीं और बच्चों को निजी स्कूलों में भेजना शुरू किया।

रौनेरा गांव के किराना व्यापारी अतुल कुमार बताते हैं कि मुआवजे का पैसा मिलने के बाद उन्होंने सबसे पहले अपनी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की। उन्होंने रकम का एक बड़ा हिस्सा बैंक में जमा किया, कुछ से नया घर खरीदा और थोड़ी जमीन भी ली ताकि आने वाले समय में परिवार सुरक्षित रह सके। उनका कहना है कि अचानक आई इस रकम ने जिंदगी बदल दी, लेकिन समझदारी से खर्च करना जरूरी था।

दयातनपुर गांव के हंसराज का अनुभव भी कुछ ऐसा ही है। उन्हें सात साल पहले अपनी 25 बीघा जमीन के बदले करीब साढ़े नौ करोड़ रुपये मिले थे। उन्होंने इस पैसे को सिर्फ शौक में खर्च नहीं किया, बल्कि ट्रैक्टर खरीदे, छोटे व्यवसाय शुरू किए और कुछ कमर्शियल वाहनों में निवेश किया। उनका मानना है कि केवल मुआवजे के भरोसे जिंदगी नहीं चल सकती, इसलिए स्थायी आय के साधन बनाना जरूरी था।

हालांकि सभी लोगों ने इतनी समझदारी नहीं दिखाई। कुछ परिवारों ने अचानक मिली संपत्ति को शानो-शौकत में खर्च कर दिया। महंगी गाड़ियां, बड़े मोबाइल फोन, आलीशान पार्टियां और दिखावे की जिंदगी ने कई घरों का बजट बिगाड़ दिया। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि कुछ युवाओं ने पैसा आने के बाद मेहनत से दूरी बना ली। पहले जो युवक रोजगार की तलाश में शहरों की ओर जाते थे, अब वही छोटी नौकरी करने में अपनी शान के खिलाफ समझते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि अब सबसे बड़ी समस्या रोजगार की बन गई है। जिन परिवारों की जमीन चली गई, उनके पास खेती का साधन नहीं बचा। सरकार की ओर से नौकरी देने का आश्वासन दिया गया था, लेकिन बहुत से लोगों का आरोप है कि यह वादा अभी तक पूरी तरह जमीन पर नहीं उतर पाया। कुछ युवाओं को एयरपोर्ट परियोजना में नौकरी का विकल्प मिला भी, तो वेतन 18 से 25 हजार रुपये के बीच होने की वजह से कई लोगों ने उसे स्वीकार नहीं किया।

युवाओं का तर्क है कि जब घर में करोड़ों का मुआवजा आ चुका है तो इतनी कम तनख्वाह वाली नौकरी करने का क्या फायदा। यही सोच अब गांवों में एक नई सामाजिक समस्या बनती जा रही है। पढ़े-लिखे युवक बेरोजगार हैं, लेकिन छोटी नौकरी करने को तैयार नहीं। कई परिवारों को चिंता है कि आने वाले समय में मुआवजे की रकम खत्म होने के बाद आय का स्रोत क्या होगा।

रबूपुरा के रहने वाले सुमित सिंह ने अलग रास्ता चुना। उन्होंने मुआवजे का कुछ हिस्सा खर्च करने के बाद मोबाइल की दुकान खोली और बाद में दूसरी जगह 12 बीघा जमीन खरीद ली। उनका कहना है कि शुरुआत में खर्च बढ़ गया था, लेकिन जल्द ही समझ में आ गया कि पैसा संभालकर इस्तेमाल करना होगा। अब उनके बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे हैं और परिवार आर्थिक रूप से पहले से ज्यादा मजबूत है।

एयरपोर्ट के लिए विस्थापित हुए परिवारों के पुनर्वास के लिए यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने पुनर्वास कॉलोनियां भी विकसित की हैं। इन कॉलोनियों में सड़क, बिजली और पानी जैसी सुविधाएं दी गई हैं। बाहर से देखने पर ये कॉलोनियां आधुनिक लगती हैं, लेकिन यहां रहने वाले लोगों की अपनी परेशानियां हैं। कुछ लोग जलभराव, सीवर और रोजगार की कमी को लेकर नाराज हैं। उनका कहना है कि मकान तो मिल गया, लेकिन जीवनयापन का स्थायी आधार अब भी नहीं बन पाया।

किसानों के बीच मुआवजे की दर को लेकर भी असंतोष है। कई किसानों का आरोप है कि उनकी जमीन बाजार मूल्य से बहुत कम कीमत पर अधिग्रहित की गई। किसान नेता कहते हैं कि जिस जमीन की वास्तविक कीमत एक से डेढ़ करोड़ रुपये प्रति बीघा थी, उसे बहुत कम दरों पर लिया गया। उनका यह भी कहना है कि सरकार ने रोजगार और विकास के जो वादे किए थे, वे पूरी तरह पूरे नहीं हुए।

किसान मनवीर सिंह बताते हैं कि जमीन जाने के बाद गांव की पहचान बदल गई, लेकिन लोगों के मन में असुरक्षा भी बढ़ी है। उनका कहना है कि खेती सिर्फ आय का जरिया नहीं थी, बल्कि गांव की संस्कृति और जीवनशैली का हिस्सा थी। अब पैसा तो है, लेकिन जमीन नहीं है। यही वजह है कि कई किसान आज भी अपने अधिकारों के लिए आंदोलन कर रहे हैं।

जेवर क्षेत्र में आई इस आर्थिक क्रांति ने एक तरफ ग्रामीणों को आधुनिक जीवन दिया है, वहीं दूसरी तरफ नई सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं। कुछ लोगों ने इस मौके को भविष्य संवारने में लगाया, जबकि कुछ लोग दिखावे की जिंदगी में उलझ गए। गांवों की सड़कों पर दौड़ती महंगी गाड़ियां समृद्धि की कहानी जरूर कहती हैं, लेकिन इन गाड़ियों के पीछे छिपी बेरोजगारी और असुरक्षा की चिंता भी उतनी ही बड़ी है।

जेवर एयरपोर्ट आने वाले समय में देश के सबसे बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में से एक माना जा रहा है। इससे क्षेत्र में व्यापार, पर्यटन और उद्योग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या इस विकास का लाभ उन किसानों और युवाओं तक भी पूरी तरह पहुंचेगा, जिन्होंने अपनी जमीन देकर इस परियोजना की नींव रखी है। फिलहाल गांवों में चमक तो दिख रही है, लेकिन उस चमक के पीछे भविष्य को लेकर कई सवाल अब भी बाकी हैं।

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