उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सरकार भले ही बेहतर इलाज और आधुनिक सुविधाओं के बड़े-बड़े दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत अक्सर इन दावों से बिल्कुल उलट नजर आती है। ताजा मामला लखनऊ का है, जहां एक बुजुर्ग मरीज को समय पर वेंटिलेटर न मिलने के कारण अपनी जान गंवानी पड़ी। यह घटना न सिर्फ सिस्टम की लापरवाही को उजागर करती है, बल्कि यह भी बताती है कि आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं में कितनी खामियां मौजूद हैं।

देवरिया निवासी 65 वर्षीय पारसनाथ पांडेय गंभीर रूप से बीमार थे। उन्हें सांस और लिवर से जुड़ी दिक्कतें थीं, जिसके चलते उनकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी। परिजन बेहतर इलाज की उम्मीद में उन्हें गोरखपुर से लखनऊ लेकर आए। उन्हें इस बात का भरोसा था कि राजधानी में बड़े अस्पतालों में उन्हें बेहतर इलाज और समय पर वेंटिलेटर मिल जाएगा। लेकिन जो हुआ, उसने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया।
बुधवार सुबह जब परिजन मरीज को लेकर केजीएमयू पहुंचे, तो वहां उन्हें राहत मिलने की बजाय निराशा हाथ लगी। आरोप है कि मरीज को करीब एक घंटे तक एंबुलेंस में ही रखा गया। इस दौरान उनकी हालत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन अस्पताल में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर डॉक्टरों ने उन्हें दूसरे अस्पताल जाने की सलाह दे दी। परिजनों के सामने कोई दूसरा विकल्प नहीं था, इसलिए वे तुरंत मरीज को लेकर बलरामपुर अस्पताल के लिए रवाना हो गए।
करीब दोपहर 12:30 बजे जब एंबुलेंस बलरामपुर अस्पताल पहुंची, तब तक मरीज की हालत बेहद गंभीर हो चुकी थी। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने के बाद भी तत्काल इलाज शुरू नहीं किया गया। सबसे पहले कागजी प्रक्रिया पूरी करने को कहा गया, जिसमें करीब आधा घंटा लग गया। इस दौरान मरीज एंबुलेंस में ही जिंदगी और मौत के बीच जूझता रहा।
परिजनों के मुताबिक, अगर उस समय तुरंत वेंटिलेटर सपोर्ट मिल जाता, तो शायद उनकी जान बचाई जा सकती थी। लेकिन जब तक उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया और वेंटिलेटर लगाया गया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आखिरकार पारसनाथ पांडेय ने दम तोड़ दिया।
इस पूरी घटना की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जिस समय यह सब हो रहा था, उस वक्त स्वास्थ्य विभाग के कई वरिष्ठ अधिकारी उसी अस्पताल में मौजूद थे। बताया जा रहा है कि प्रमुख सचिव स्वास्थ्य, डीजी हेल्थ और सीएमओ जैसे अधिकारी अस्पताल में ही थे। इतना ही नहीं, कुछ ही देर पहले डिप्टी सीएम भी वहां से होकर गए थे। इसके बावजूद किसी की नजर एंबुलेंस में तड़पते मरीज पर नहीं पड़ी।
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है। पहला सवाल यह है कि आखिर राजधानी के बड़े अस्पतालों में भी वेंटिलेटर की इतनी कमी क्यों है? दूसरा, आपातकालीन स्थिति में मरीज को तुरंत इलाज देने के बजाय कागजी प्रक्रियाओं में क्यों उलझाया जाता है? और तीसरा, जब उच्च अधिकारी अस्पताल में मौजूद थे, तब भी ऐसी लापरवाही कैसे हो गई?
इस मामले में अस्पताल प्रशासन की ओर से सफाई भी सामने आई है। केजीएमयू के ट्रॉमा सेंटर के सीएमएस डॉ. प्रेमराज सिंह का कहना है कि अस्पताल में हर मरीज को बेहतर इलाज देने की कोशिश की जाती है। उनका कहना है कि मरीज की स्थिति का आकलन करने में थोड़ा समय लगता है और अगर वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं होता, तो परिजनों को इसकी जानकारी दे दी जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार परिजन वेंटिलेटर मिलने की उम्मीद में इंतजार करते रहते हैं, जिससे मरीज की हालत और बिगड़ जाती है।
वहीं, बलरामपुर अस्पताल प्रशासन का कहना है कि मरीज को आईसीयू में शिफ्ट कर दिया गया था और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि मरीज को ज्यादा देर तक इंतजार करना पड़ा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि परिजनों की ओर से कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है।
हालांकि, इन सफाइयों से कई सवालों के जवाब अब भी अधूरे हैं। अगर वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं था, तो क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की जा सकती थी? क्या मरीज को तुरंत प्राथमिक उपचार नहीं दिया जा सकता था? और सबसे अहम सवाल—क्या एक मरीज की जान इतनी सस्ती हो गई है कि वह सिस्टम की खामियों के बीच यूं ही दम तोड़ दे?
यह पहली बार नहीं है जब वेंटिलेटर की कमी को लेकर सवाल उठे हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ भी इस मुद्दे पर चिंता जता चुकी है। कोर्ट ने राज्य के सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर की उपलब्धता और उनकी स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत ने यह भी कहा है कि यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उपलब्ध संसाधन मरीजों की जान बचाने के लिए पर्याप्त हैं या नहीं।
अक्टूबर 2025 में हुई सुनवाई के दौरान भी कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया था और राज्य सरकार से विस्तृत जानकारी मांगी थी। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि वह यह जानना चाहता है कि अस्पतालों में कितने वेंटिलेटर हैं, उनमें से कितने काम कर रहे हैं और वास्तविक जरूरत क्या है।
इसके बावजूद अगर ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, तो यह साफ है कि स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ उपकरण बढ़ाने से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि उनके सही उपयोग और प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा।
इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी तैयार है। जब राजधानी जैसे शहर में यह हाल है, तो छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों की स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
पारसनाथ पांडेय की मौत सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है, बल्कि यह उस सिस्टम की असफलता का प्रतीक है, जो समय पर एक जरूरतमंद को जीवन नहीं दे सका। अब जरूरत है कि इस घटना से सबक लिया जाए और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं, ताकि भविष्य में किसी और को इस तरह अपनी जान न गंवानी पड़े।
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