उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गुरुवार को एक बयान ने धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी। ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने अपने खिलाफ लगाए जा रहे आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए न केवल उन्हें झूठा बताया, बल्कि अपनी जान को भी खतरा बताया। उन्होंने आशंका जताई कि यदि उन्हें गिरफ्तार किया गया तो जेल में उनके साथ गंभीर साजिश भी हो सकती है।

वाराणसी के वाराणसी स्थित श्रीविद्या मठ में पत्रकारों से बातचीत के दौरान उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना था कि उनके खिलाफ बनाई जा रही कथा पूरी तरह मनगढ़ंत है और एक आपराधिक प्रवृत्ति का व्यक्ति झूठी कहानी गढ़कर उसे सच की तरह पेश कर रहा है।
उन्होंने कहा कि इस पूरे मामले में उन्हें बदनाम करने की साजिश रची जा रही है और यह केवल व्यक्तिगत हमला नहीं, बल्कि व्यापक षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है।
गिरफ्तारी और जान के खतरे की आशंका
शंकराचार्य ने बताया कि वे व्यक्तिगत रूप से अग्रिम जमानत लेने के पक्ष में नहीं थे, लेकिन उनके अनुयायियों और पीठ से जुड़े लोगों की चिंता को देखते हुए यह कदम उठाया गया। उन्होंने कहा कि आश्रम से जुड़े लोगों को डर है कि पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर जेल ले जा सकती है और वहां उनके साथ कुछ भी हो सकता है।
उन्होंने आशंका जताई कि जेल में उन्हें “जहर की सुई” देकर खत्म करने की कोशिश भी की जा सकती है। हालांकि उन्होंने इस आशंका के पीछे किसी विशेष व्यक्ति या संस्था का नाम नहीं लिया, लेकिन यह जरूर कहा कि परिस्थितियां उन्हें ऐसा सोचने पर मजबूर कर रही हैं।
यह बयान सामने आने के बाद मामला और गंभीर हो गया है, क्योंकि किसी धार्मिक नेता द्वारा इस तरह की सार्वजनिक आशंका जताना प्रशासन और कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
जांच प्रक्रिया पर उठाए सवाल
शंकराचार्य ने कहा कि जांच एजेंसियां अपना काम कर रही हैं, लेकिन जिस तरह से मामले से जुड़े लोग मीडिया में बयान दे रहे हैं, उससे जांच की निष्पक्षता पर प्रश्न उठते हैं। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर आपत्ति जताई कि जांच से संबंधित जानकारी मीडिया में कैसे पहुंच रही है।
उनका कहना था कि यदि जांच टीम की रिपोर्ट कोई बाहरी व्यक्ति सार्वजनिक कर रहा है, तो यह पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि कानून के अनुसार पॉक्सो जैसे संवेदनशील मामलों की जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती, और यदि कोई जानकारी साझा होनी भी है तो वह पुलिस विभाग की ओर से आधिकारिक रूप से होनी चाहिए।
इस संदर्भ में उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से उत्तर प्रदेश पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए और कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि शिकायतकर्ता को ही “स्थायी प्रवक्ता” बना दिया गया है।
मठ और परिसर को लेकर उठे विवादों पर सफाई
हाल के दिनों में मठ परिसर के कमरों, निर्माण और सुविधाओं को लेकर भी कई चर्चाएं सामने आई थीं। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि किसी कमरे में शीशा लगा होना कोई अपराध नहीं है। उन्होंने इसे पारदर्शिता का प्रतीक बताते हुए कहा कि यदि कमरा खुला और पारदर्शी है तो बाहर का व्यक्ति अंदर देख सकता है, इससे किसी तरह की गोपनीयता या संदेह की बात नहीं रह जाती।
पांच मंजिला भवन के संबंध में उन्होंने कहा कि यह कोई छिपाने वाली चीज नहीं है। उन्होंने कहा कि आश्रम परिसर में कुछ भी गुप्त नहीं है और यदि कोई बिना कैमरे के परिसर देखना चाहे तो उसे अनुमति दी जा सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वहां छात्र रहते हैं और पढ़ते हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा और गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए कैमरे के साथ प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती।
एपस्टीन फाइल का जिक्र कर बढ़ाया विवाद
अपने बयान में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर के विवादित मामले का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तथाकथित “एपस्टीन फाइल” में कई बड़े लोगों के नाम शामिल हैं और उस मुद्दे से ध्यान भटकाने के लिए उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।
उन्होंने यह संकेत दिया कि उनकी बदनामी कर जनता का ध्यान अन्य मुद्दों से हटाने की कोशिश की जा रही है। यहां उन्होंने अमेरिकी कारोबारी जेफ्री एपस्टीन से जुड़े चर्चित मामले का संदर्भ दिया, जिसने दुनिया भर में कई शक्तिशाली लोगों को लेकर विवाद खड़ा किया था।
हालांकि उन्होंने अपने इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज या ठोस प्रमाण सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन उनके इस बयान ने मामले को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय संदर्भ से भी जोड़ दिया।
कानून व्यवस्था और संस्थाओं पर टिप्पणी
शंकराचार्य ने कहा कि वर्तमान घटनाक्रम से यह देखने को मिल रहा है कि कानून, न्यायपालिका और सरकारी संस्थाओं का किस तरह दुरुपयोग संभव है। उन्होंने खुद को एक “दर्शक” बताते हुए कहा कि वे पूरे घटनाक्रम को देख रहे हैं और समय आने पर सच्चाई सामने आएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी आरोप को केवल कहानी बनाकर प्रचारित किया जा सकता है और जनता उस पर विश्वास भी कर सकती है, लेकिन इससे सत्य नहीं बदलता।
सामाजिक और राजनीतिक असर
उनके बयान के बाद धार्मिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे आत्मरक्षा में दिया गया बयान मान रहे हैं, जबकि अन्य इसे जांच को प्रभावित करने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब धार्मिक नेता इस तरह के आरोप और आशंकाएं सार्वजनिक रूप से रखते हैं, तो उसका असर व्यापक होता है। इससे अनुयायियों में चिंता और अविश्वास पैदा हो सकता है और प्रशासन पर दबाव भी बढ़ता है।
आगे क्या?
फिलहाल जांच एजेंसियां अपने स्तर पर काम कर रही हैं और मामला कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ रहा है। अग्रिम जमानत याचिका पर अदालत का फैसला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उससे आगे की कानूनी दिशा तय हो सकती है।
इस बीच, शंकराचार्य के बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे खुद को आरोपों से घिरा हुआ ही नहीं, बल्कि संभावित साजिश का शिकार मानते हैं।
अब सबकी नजर जांच रिपोर्ट, अदालत के फैसले और प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित रहेगा या व्यापक राजनीतिक-सामाजिक बहस में बदलेगा, यह आने वाला समय तय करेगा।
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