देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले नौसेना के लेफ्टिनेंट विनय नरवाल की शहादत को एक साल बीत चुका है, लेकिन उनके सम्मान से जुड़े कई अहम वादे अब भी अधूरे हैं। पहलगाम में हुए आतंकी हमले में जान गंवाने वाले इस युवा अधिकारी की यादें आज भी परिवार और समाज के दिलों में जिंदा हैं, मगर वह सरकारी मान्यता, जिसकी उम्मीद थी, अब तक नहीं मिल सकी है।

अटल सेक्टर-7 निवासी विनय नरवाल के पिता राजेश नरवाल के लिए यह एक साल बेहद कठिन रहा है। बेटे को खोने का दर्द तो है ही, लेकिन उससे भी ज्यादा पीड़ा इस बात की है कि उनके बेटे को अब तक ‘शहीद’ का दर्जा नहीं मिला। उनका कहना है कि सरकार की ओर से आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को नौकरी जरूर दी गई है, लेकिन आधिकारिक तौर पर शहीद का दर्जा देने को लेकर कोई सूचना नहीं दी गई।
राजेश नरवाल ने एक मार्मिक अपील करते हुए कहा कि अगर सरकार उनके बेटे के नाम पर किसी बड़े संस्थान—जैसे मेडिकल कॉलेज, अस्पताल या किसी अन्य सार्वजनिक परियोजना—का नामकरण करती है, तो वह अपनी संपत्ति में से विनय का हिस्सा और सरकार से मिली आर्थिक सहायता उस संस्थान को देने के लिए तैयार हैं। उनका मानना है कि इससे उनके बेटे की शहादत केवल एक याद बनकर नहीं रह जाएगी, बल्कि समाज सेवा के जरिए हमेशा जीवित रहेगी।
22 अप्रैल को हुए इस आतंकी हमले के बाद जब विनय नरवाल का पार्थिव शरीर उनके घर लाया गया था, तब पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई थी। श्रद्धांजलि सभा में कई बड़े नेता और जनप्रतिनिधि पहुंचे थे, जिन्होंने विनय की वीरता को नमन करते हुए परिवार को हर संभव सहयोग का भरोसा दिलाया था।
इन नेताओं में केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल, विधानसभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण, स्थानीय विधायक और नगर निगम के अधिकारी शामिल थे। उस समय कई अहम घोषणाएं की गई थीं, जिनमें विनय के नाम पर सड़क या सार्वजनिक स्थल का नामकरण और उन्हें ‘शहीद’ का दर्जा दिलाने का प्रयास प्रमुख था।
24 अप्रैल 2025 को केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल ने परिवार से मुलाकात के दौरान कहा था कि विनय नरवाल के नाम को अमर रखने के लिए किसी मार्ग या स्थल का नाम उनके नाम पर रखा जाएगा। उन्होंने यह भी आश्वासन दिया था कि इस प्रस्ताव पर राज्य सरकार से चर्चा कर जल्द फैसला लिया जाएगा। लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी इस दिशा में कोई ठोस कदम सामने नहीं आया है।
वहीं 27 अप्रैल 2025 को विधानसभा अध्यक्ष हरविन्द्र कल्याण ने कहा था कि सरकार विनय नरवाल को ‘शहीद’ का दर्जा दिलाने का प्रयास करेगी। साथ ही 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की गई थी। इनमें से आर्थिक सहायता और नौकरी का वादा तो पूरा हो चुका है, लेकिन शहीद का दर्जा अब भी अधूरा है।
इस बीच, कुछ संस्थानों ने अपने स्तर पर विनय नरवाल को श्रद्धांजलि देने की कोशिश की है। संत कबीर स्कूल ने उनके सम्मान में स्कूल में ‘मेमोरी वॉल’ बनाने का वादा किया था, जिसे 23 सितंबर, हरियाणा शहीदी दिवस के अवसर पर पूरा किया गया। यह पहल सराहनीय है, लेकिन परिवार और समाज की अपेक्षाओं के मुकाबले यह काफी सीमित है।
विनय नरवाल की शहादत के बाद स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने भी कई मांगें रखी थीं। हिंद एंटी क्राइम आर्गेनाइजेशन ने सेक्टर-7 के एक चौक का नाम विनय के नाम पर रखने की मांग की थी। इसके अलावा क्षेत्र के लोगों ने किसी सरकारी स्कूल, पार्क या ग्रीन बेल्ट का नाम भी उनके नाम पर रखने का सुझाव दिया था। लेकिन इन मांगों पर अब तक कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया है।
नगर निगम और प्रशासन की ओर से समय-समय पर आश्वासन जरूर दिए गए हैं। मेयर रेनू बाला गुप्ता ने कहा है कि विनय नरवाल के घर तक जाने वाली सड़क का नाम उनके नाम पर रखने की योजना है और जल्द ही इसकी घोषणा की जाएगी। वहीं संबंधित विधायक का कहना है कि सड़क का नामकरण नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आता है और किसी संस्थान के नामकरण के लिए परिवार की सहमति जरूरी होती है। उन्होंने यह भी बताया कि इस विषय पर राज्य सरकार स्तर पर चर्चा की जाएगी।
इसके बावजूद, एक साल का लंबा समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है। यह न केवल परिवार के लिए निराशाजनक है, बल्कि समाज में भी यह संदेश देता है कि शहादत के बाद किए गए वादों को पूरा करने में गंभीरता की कमी है।
विनय नरवाल की शहादत हमें यह याद दिलाती है कि देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस कार्यों से होना चाहिए। उनके नाम पर संस्थान, सड़क या स्मारक बनाना केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करने का माध्यम होता है।
आज विनय नरवाल के पिता की अपील सिर्फ एक परिवार की मांग नहीं है, बल्कि उन सभी सैनिकों के परिवारों की आवाज है, जो अपने प्रियजनों को देश के लिए खो देते हैं। जरूरत इस बात की है कि ऐसे वीर सपूतों को समय रहते वह सम्मान दिया जाए, जिसके वे सच्चे हकदार हैं—ताकि उनकी शहादत हमेशा के लिए देश की स्मृति में अंकित रहे।
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