खरीफ सीजन से पहले उर्वरकों की उपलब्धता को लेकर किसानों के मन में उठ रही चिंताओं के बीच केंद्र सरकार ने बड़ी राहत दी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में यूरिया और डीएपी (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) की कोई कमी नहीं है और किसानों को यह खाद निर्धारित कीमतों पर ही उपलब्ध कराई जाएगी। मौजूदा हालात में, 45 किलो यूरिया की बोरी 266 रुपये और 50 किलो डीएपी की बोरी 1,350 रुपये में मिल रही है, जो किसानों के लिए एक स्थिर और भरोसेमंद व्यवस्था को दर्शाता है।

दरअसल, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर वैश्विक उर्वरक बाजार पर भी पड़ा है। कच्चे माल की कीमतों में अचानक आई तेजी और सप्लाई चेन में आई बाधाओं के कारण दुनिया भर में उर्वरकों की लागत बढ़ गई है। इसका असर भारत जैसे बड़े कृषि देश पर भी देखने को मिला, जहां उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी अमोनिया, सल्फर और सल्फ्यूरिक एसिड की कीमतों में उछाल आया। इसके साथ ही प्राकृतिक गैस की आपूर्ति भी प्रभावित हुई, जिससे घरेलू उत्पादन पर दबाव बना।
शुरुआती दौर में इस संकट का असर साफ दिखाई दिया, जब देश में यूरिया उत्पादन घटकर करीब 30,000 से 35,000 टन प्रतिदिन तक पहुंच गया। हालांकि, अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। गैस आपूर्ति में सुधार हुआ है और यह लगभग 80 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। इससे उत्पादन में भी बढ़ोतरी की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार और संबंधित एजेंसियां इस दिशा में लगातार काम कर रही हैं ताकि उत्पादन पूरी क्षमता के साथ फिर से शुरू हो सके।
सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश में इस समय उर्वरकों का कुल भंडार करीब 180 लाख मीट्रिक टन है। यह पिछले वर्ष के 147 लाख मीट्रिक टन के मुकाबले काफी अधिक है, जो इस बात का संकेत है कि मौजूदा स्टॉक मजबूत स्थिति में है। आने वाले खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की कुल मांग लगभग 390 लाख मीट्रिक टन आंकी गई है, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 361 लाख मीट्रिक टन था। इस बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार ने पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है।
आपूर्ति को स्थिर बनाए रखने के लिए भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने विकल्पों का विस्तार किया है। सरकार रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, मलेशिया, जॉर्डन, कनाडा, अल्जीरिया, मिस्र और टोगो जैसे देशों से उर्वरकों और कच्चे माल की आपूर्ति के लिए नए समझौते कर रही है। इसका मकसद आयात के लिए एक ही स्रोत पर निर्भरता को कम करना और किसी भी वैश्विक संकट की स्थिति में सप्लाई को बाधित होने से बचाना है।
रसायन और उर्वरक मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि सरकार का प्राथमिक लक्ष्य किसानों तक समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक पहुंचाना है। इसके लिए न केवल स्टॉक को मजबूत किया जा रहा है, बल्कि वितरण प्रणाली को भी अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है। राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाकर यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि खाद की उपलब्धता हर क्षेत्र में संतुलित रहे और किसी भी इलाके में कमी की स्थिति न बने।
विशेषज्ञों का मानना है कि उर्वरकों की समय पर उपलब्धता कृषि उत्पादन के लिए बेहद जरूरी है। यदि किसानों को सही समय पर खाद नहीं मिलती, तो इसका सीधा असर फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर पड़ता है। ऐसे में सरकार द्वारा उठाए गए कदम किसानों के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। यह न केवल उनकी लागत को नियंत्रित रखने में मदद करेगा, बल्कि उत्पादन को भी स्थिर बनाए रखेगा।
इसके अलावा, सरकार भविष्य की चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक रणनीति पर भी काम कर रही है। घरेलू उत्पादन क्षमता को बढ़ाने, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करने और उर्वरकों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देने जैसे कदमों पर जोर दिया जा रहा है। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद भारत ने उर्वरक आपूर्ति के मोर्चे पर संतुलन बनाए रखने में सफलता हासिल की है। सरकार का दावा है कि किसानों को किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं होने दी जाएगी और उन्हें समय पर उचित दाम पर खाद उपलब्ध कराई जाएगी। यह भरोसा ऐसे समय में आया है, जब खेती-किसानी के लिए अनिश्चितताओं का दौर बना हुआ है।
आने वाले दिनों में खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ उर्वरकों की मांग और बढ़ेगी, लेकिन मौजूदा तैयारियों को देखते हुए यह उम्मीद की जा रही है कि देश इस चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करेगा। किसानों के लिए यह एक सकारात्मक संकेत है, जो उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र की गति को भी बनाए रखने में मदद करेगा।
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