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दिल्ली में बच्चों का अपहरण और मजदूरी के लिए ट्रैफिकिंग: चौंकाने वाले तथ्य

देश की राजधानी दिल्ली में बच्चों की सुरक्षा को लेकर हाल ही में एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (JRC) ने यह रिपोर्ट साझा की है, जिसमें खुलासा हुआ है कि केवल दिल्ली के ही नहीं बल्कि बाहर के कई राज्यों के बच्चे भी मानव तस्करी के जाल में फंसकर राजधानी लाए जाते हैं। इन बच्चों का इस्तेमाल अक्सर मजदूरी करवाने, शोषण और अन्य अवैध गतिविधियों के लिए किया जाता है।

बाहरी राज्यों से लाए जाते हैं नाबालिग

रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में हर साल बड़ी संख्या में बच्चे मानव तस्करी के शिकार होते हैं। JRC के राष्ट्रीय संयोजक रवि कांत के मुताबिक, 1 अप्रैल 2023 से 29 जनवरी 2026 तक दिल्ली में ट्रैफिकिंग के शिकार 6,759 नाबालिगों को मुक्त कराया गया। इसमें 2,134 लड़कियां और 3,281 लड़के शामिल थे। इस अवधि में कुल 2,407 मानव तस्करी के केस दर्ज किए गए।

विशेष रूप से ये बच्चे उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल से दिल्ली लाए गए। इनमें से अधिकांश नाबालिग न तो अपने परिवार से अलग हुए थे, और न ही किसी की मर्जी से भागे थे। ये बच्चे अक्सर लालच, धोखे और धमकियों के माध्यम से गैंगों के जाल में फंसे।

मानव तस्करी के गैंग सक्रिय

देशभर में मानव तस्करी के नेटवर्क का आंकड़ा और भी चिंताजनक है। JRC के नेटवर्क से जुड़े 250 से ज्यादा सहयोगी संगठन ने इसी अवधि में 1,25,408 बच्चों को गिरोहों के चंगुल से छुड़वाया। इसके साथ ही 86,459 ट्रैफिकिंग के केस दर्ज कराए गए।

मुक्त कराए गए बच्चों में 28,797 लड़कियां और 67,387 लड़के शामिल थे। ये बच्चे मानव तस्करी की भयावहता को दिखाते हैं, जहां गैंगों के सदस्य उन्हें धोखे, धमकी और लालच के जाल में फंसाकर शहरों में लाते हैं।

चोरी हुए नवजात का मामला

दिल्ली में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता का विषय है जीटीबी अस्पताल का एक मामला, जिसमें दिसंबर 2024 में एक नवजात जन्म के केवल एक घंटे बाद चोरी हो गया। तीन साल बीत जाने के बाद भी यह बच्चा लापता है।

सीमापुरी निवासी कार्तिक शर्मा ने बताया कि उनकी पत्नी पूजा ने लेबर रूम में बेटे को जन्म दिया। बच्चे को नर्सरी में भर्ती कराया गया, लेकिन 15 मिनट के भीतर एक महिला बच्चे को लेकर चली गई। यह घटना मानव तस्करी और सुरक्षा व्यवस्था की गंभीर खामियों को उजागर करती है।

दिल्ली पुलिस का SOP और व्यवस्था

गुमशुदा बच्चों और बड़ों की तलाश को आसान बनाने के लिए दिल्ली पुलिस ने स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार किया है। यह SOP 12 अप्रैल 2022 को लागू की गई थी। इसके तहत पुलिसकर्मियों के लिए कई कदम तय किए गए हैं:

हर थाना में फैसिलिटेशन डेस्क होना चाहिए, जहां बच्चों और बड़ों के गायब होने की शिकायतें ली जाएं।

प्रत्येक थाना में अलग मिसिंग रजिस्टर रखना अनिवार्य है। इसमें सभी गायब लोगों का विवरण दर्ज होना चाहिए।

जब कोई मिसिंग शिकायत आती है, तो इन्वेस्टिगेशन इंस्पेक्टर और जुवेनाइल वेलफेयर ऑफिसर तुरंत सक्रिय होते हैं।

गायब बच्चे की पूरी जानकारी और हाल की फोटो जुटाकर ASIs स्तर के जांच अधिकारी को तुरंत नियुक्त किया जाता है।

पुलिसकर्मियों को प्रोत्साहन

SOP में यह भी बताया गया है कि बच्चों को खोजने में पुलिसकर्मियों को प्रेरित करने के लिए इनाम और प्रमोशन की व्यवस्था है। नियम के अनुसार, अगर कोई सिपाही, हवलदार या ASI 12 महीने में 18 साल से कम उम्र के 80 या ज्यादा बच्चों को ढूंढता है, जिनमें 25 बच्चे 14 साल से कम उम्र के हों, तो उन्हें आउट ऑफ टर्न प्रमोशन दिया जाएगा। यह कदम पुलिसकर्मियों को बच्चों की तलाश में तेजी और जिम्मेदारी सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

निष्कर्ष

दिल्ली और अन्य राज्यों से लाए जाने वाले बच्चों के साथ मानव तस्करी की घटनाएं न केवल बच्चों के जीवन को खतरे में डालती हैं, बल्कि समाज और कानून के लिए भी बड़ी चुनौती हैं। JRC की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि इसके पीछे संगठित गैंगों की गतिविधियां हैं। SOP और पुलिस के प्रयास सही दिशा में हैं, लेकिन इसके लिए पूरे नेटवर्क की निगरानी, समय पर कार्रवाई और सामाजिक जागरूकता अत्यंत जरूरी है।

देशभर में बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना केवल प्रशासन का ही काम नहीं है, बल्कि समाज की जिम्मेदारी भी है। हर माता-पिता, शिक्षक, पड़ोसी और नागरिक को सतर्क रहना होगा और यदि कोई बच्चा लापता हो, तो तुरंत पुलिस और बाल सुरक्षा संगठन से संपर्क करना होगा।

दिल्ली में मानव तस्करी के जाल में फंसे बच्चों की संख्या भले ही alarming है, लेकिन सक्रिय निगरानी, जागरूकता और सही दिशा में कदम उठाने से इस अपराध को कम किया जा सकता है।

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