मथुरा क्षेत्र। ब्रज की होली अपने रंग, उत्साह और अनूठी परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है, लेकिन ब्रज के एक छोटे से गांव में निभाई जाने वाली परंपरा लोगों को भावुक भी कर देती है और समाज की एकता का संदेश भी देती है। यहां होली से पहले उन परिवारों के घरों के बाहर नगाड़ा बजाया जाता है, जिनके घर में पिछले वर्ष किसी सदस्य का निधन हुआ हो। इस परंपरा का उद्देश्य शोकग्रस्त परिवार को सामाजिक सहारा देना और उन्हें फिर से त्योहारों की खुशियों में शामिल करना है।

नगाड़े की थाप से दिया जाता है संदेश
मांट क्षेत्र के गांव जाबरा में यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। यहां महाशिवरात्रि के बाद से ही होली के गीतों और रसिया की शुरुआत हो जाती है। जिन घरों में बीते साल शोक रहा होता है, वहां ग्रामीण एकत्र होकर नगाड़ा बजाते हैं और होली के पारंपरिक गीत गाते हैं।
ग्रामीणों का मानना है कि नगाड़े की थाप यह संदेश देती है कि जो ईश्वर को स्वीकार था, वह हो चुका। अब पूरे गांव को मिलकर प्रेम और भाईचारे के साथ होली मनानी चाहिए। स्थानीय भाषा में इस रस्म को “त्योहार उठाना” कहा जाता है, यानी शोक से बाहर निकालकर परिवार को फिर से सामाजिक जीवन में जोड़ना।
समाज की सहभागिता से खत्म होता है शोक
गांव के बुजुर्गों के अनुसार, जब तक यह सामूहिक रस्म नहीं होती, तब तक शोकग्रस्त परिवार त्योहार नहीं मनाता। इस परंपरा के माध्यम से समाज स्वयं उस परिवार के पास जाता है, उन्हें सांत्वना देता है और कहता है कि वे अकेले नहीं हैं।
गांव के वरिष्ठ लोगों का कहना है कि यह परंपरा केवल रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी है। इससे परिवार को मानसिक सहारा मिलता है और उन्हें यह एहसास होता है कि पूरा गांव उनके साथ खड़ा है।
इस साल कई घरों में निभाई गई परंपरा
ग्रामीणों के मुताबिक, इस वर्ष गांव में कई लोगों का निधन हुआ और सभी शोकग्रस्त परिवारों के घरों के बाहर नगाड़ा बजाकर यह रस्म निभाई गई। गांव के लोग एक साथ इकट्ठा होकर होली के रसिया गाते हैं और परिवार को त्योहार मनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
इस दौरान गांव के अनेक लोग उपस्थित रहते हैं और सामूहिक रूप से परिवार को सांत्वना देते हैं। लोगों का मानना है कि यह परंपरा सामाजिक एकता, संवेदना और सांस्कृतिक विरासत का अनूठा उदाहरण है।
ब्रज की परंपराओं में अलग पहचान
ब्रज क्षेत्र में होली का उत्सव कई दिनों तक चलता है और हर जगह इसकी अपनी खास परंपराएं हैं — कहीं फूलों की होली, कहीं लठमार, तो कहीं हुरंगा। लेकिन जाबरा गांव की यह परंपरा अलग इसलिए है क्योंकि यहां त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने का माध्यम भी बनता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब नगाड़ा बजता है, तो केवल आवाज नहीं गूंजती, बल्कि उसमें संवेदना, साथ और अपनापन भी सुनाई देता है।
यह परंपरा बताती है कि भारतीय गांवों में त्योहार केवल रंग और उल्लास का नाम नहीं, बल्कि दुख में साथ खड़े रहने की संस्कृति भी हैं। जाबरा गांव की यह अनूठी परंपरा सामाजिक एकता और मानवीय संवेदना की मिसाल बनकर आज भी जीवित है।
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