कानपुर: उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर कानपुर एक बार फिर मलेरिया के बढ़ते मामलों को लेकर चिंता में है। कोरोना काल में जहां साफ-सफाई और सतर्कता के चलते मलेरिया के मामलों में भारी गिरावट दर्ज की गई थी, वहीं अब लापरवाही और बदलती रिपोर्टिंग व्यवस्था के कारण यह बीमारी तेजी से पैर पसारती नजर आ रही है। पिछले छह वर्षों के आंकड़े इस बदलाव की पूरी कहानी बयां करते हैं—जहां कभी मरीजों की संख्या दो अंकों में सिमट गई थी, वहीं अब यह सैकड़ों के पार पहुंच चुकी है।

आंकड़ों में छिपी बढ़ती चिंता
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 में कानपुर में मलेरिया के केवल 17 मामले सामने आए थे। 2021 में यह संख्या घटकर 15 और 2022 में महज 8 रह गई थी। यह वह दौर था जब कोरोना महामारी के कारण लोग व्यक्तिगत स्वच्छता, मास्क और साफ-सफाई को लेकर बेहद सतर्क थे।
लेकिन जैसे-जैसे कोरोना का असर कम हुआ, लोगों की सावधानी भी ढीली पड़ने लगी। इसका असर सीधे तौर पर मलेरिया के मामलों में दिखा। 2023 में मरीजों की संख्या बढ़कर 43 हो गई, 2024 में यह आंकड़ा 128 तक पहुंच गया, और 2025 में अब तक 222 से अधिक केस दर्ज किए जा चुके हैं।
रिकॉर्डिंग सिस्टम भी बना वजह
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मामलों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण नया डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम भी है। अब जिन लोगों का आधार कार्ड पता कानपुर का है, उनके केस भले ही किसी अन्य राज्य में दर्ज हुए हों, लेकिन उन्हें पोर्टल पर कानपुर के खाते में जोड़ा जा रहा है।
उदाहरण के तौर पर, वर्ष 2024 में दर्ज 128 मामलों में से लगभग 78 मरीज ऐसे थे, जो काम के सिलसिले में दूसरे राज्यों में रह रहे थे और वहीं मलेरिया से संक्रमित हुए। लेकिन उनकी पहचान कानपुर की होने के कारण ये सभी केस शहर के आंकड़ों में शामिल कर लिए गए।
कोरोना से पहले भी थे ज्यादा केस
यह स्थिति पूरी तरह नई नहीं है। कोरोना महामारी से पहले भी कानपुर में मलेरिया के मामलों की संख्या काफी अधिक थी। वर्ष 2018 में 403 और 2019 में 426 मरीज सामने आए थे। यानी कोरोना काल के दौरान आई गिरावट अस्थायी थी, जो अब खत्म हो चुकी है।
लापरवाही बन रही बड़ी वजह
विशेषज्ञों का मानना है कि कोरोना के दौरान अपनाई गई स्वच्छता की आदतें अब लोगों ने छोड़ दी हैं। पहले जहां लोग नियमित रूप से हाथ धोते, घर के आसपास सफाई रखते और जलभराव नहीं होने देते थे, वहीं अब इन आदतों में कमी आ गई है।
इसके अलावा, गर्मी और बारिश के मौसम में पानी का जमा होना मच्छरों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। यही वजह है कि मलेरिया के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।
मलेरिया के लक्षण और खतरे
Malaria एक गंभीर बीमारी है, जो मच्छरों के काटने से फैलती है। डॉक्टरों के अनुसार, मच्छर के काटने के 14 से 21 दिनों के भीतर इसके लक्षण सामने आने लगते हैं।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, मलेरिया के मुख्य लक्षणों में तेज बुखार, ठंड लगना, शरीर में कंपकंपी, भूख में कमी, तेज सिरदर्द और बुखार उतरने के बाद अत्यधिक पसीना आना शामिल है। कई मामलों में बुखार एक ही दिन आता है और फिर अचानक गायब हो जाता है, जिससे मरीज इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देता है।
खतरनाक प्रकार: पीवी और पीएफ
मलेरिया मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है—पीवी (प्लाज्मोडियम विवैक्स) और पीएफ (प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम)।
पीवी में बुखार बार-बार आता है, लेकिन यह अपेक्षाकृत कम खतरनाक होता है।
वहीं पीएफ मलेरिया बेहद खतरनाक माना जाता है। इसमें बीमारी शरीर के अंदर तेजी से फैलती है और समय पर इलाज न मिलने पर यह लीवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है।
समय पर जांच और इलाज जरूरी
डॉक्टरों का कहना है कि मलेरिया के लक्षण दिखते ही तुरंत जांच करानी चाहिए। खुद से दवा लेने या लापरवाही करने से स्थिति गंभीर हो सकती है। समय पर इलाज मिलने पर यह बीमारी पूरी तरह ठीक हो सकती है।
बचाव ही सबसे बड़ा उपाय
स्वास्थ्य विभाग ने मलेरिया से बचाव के लिए कई जरूरी उपाय सुझाए हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण है साफ-सफाई और मच्छरों से बचाव।
घर और आसपास पानी जमा न होने दें
कूलर और फ्रिज का पानी हर सप्ताह बदलें
छत या आंगन में पड़े बर्तनों में पानी जमा न होने दें
रात में सोते समय मच्छरदानी का उपयोग करें
सुबह और शाम फुल आस्तीन के कपड़े पहनें
पशुबाड़ों में पानी को नियमित रूप से बदलें
स्वास्थ्य विभाग का अभियान
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. हरिदत्त नेमी के अनुसार, विभाग मलेरिया के मामलों को नियंत्रित करने के लिए लगातार अभियान चला रहा है। उन्होंने कहा कि कोरोना के दौरान जो सावधानियां बरती गई थीं, उसी तरह की सतर्कता अपनाने से मलेरिया को भी काफी हद तक रोका जा सकता है।
उन्होंने यह भी बताया कि विभाग का लक्ष्य मलेरिया के मामलों को शून्य तक लाना है, जिसके लिए जागरूकता अभियान और नियमित निरीक्षण किए जा रहे हैं।
शहर के लिए चेतावनी
कानपुर में मलेरिया के बढ़ते मामले एक स्पष्ट संकेत हैं कि यदि समय रहते सतर्कता नहीं बरती गई, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। यह सिर्फ स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि हर नागरिक की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने आसपास साफ-सफाई बनाए रखे और मच्छरों को पनपने का मौका न दे।
निष्कर्ष
कानपुर में मलेरिया के बढ़ते आंकड़े यह दर्शाते हैं कि बीमारी पर नियंत्रण केवल अस्थायी उपायों से संभव नहीं है। इसके लिए लगातार जागरूकता, स्वच्छता और सतर्कता जरूरी है।
कोरोना काल ने यह साबित कर दिया था कि यदि लोग मिलकर प्रयास करें तो संक्रामक बीमारियों को काफी हद तक रोका जा सकता है। अब जरूरत है उसी अनुशासन और जिम्मेदारी को फिर से अपनाने की, ताकि मलेरिया जैसी बीमारी को दोबारा काबू में लाया जा सके।
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