कानपुर से सामने आई एक हृदयविदारक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। यहां एक युवा प्रशिक्षु अधिवक्ता ने कचहरी की इमारत से कूदकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। 24 वर्षीय प्रियांशु श्रीवास्तव की मौत सिर्फ एक आत्महत्या नहीं, बल्कि उन मानसिक संघर्षों की कहानी है, जिन्हें वह लंबे समय से झेल रहा था। अपने पीछे छोड़े गए दो पन्नों के सुसाइड नोट में उसने अपने जीवन की पीड़ा, अपमान और पारिवारिक तनाव को विस्तार से बयान किया है।

प्रियांशु ने अपनी आखिरी इच्छा में लिखा कि जो भी उसका सुसाइड नोट पढ़े, उसे अंत तक जरूर पढ़े, ताकि उसके दर्द को समझा जा सके। इस पत्र में उसने अपने पिता के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट और बचपन से झेले गए मानसिक दबाव को अपनी इस चरम कदम की मुख्य वजह बताया है।
घटना गुरुवार दोपहर की है, जब प्रियांशु ने कानपुर कचहरी की पांचवीं मंजिल से छलांग लगा दी। मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस और सुरक्षा बलों को सूचना दी। उसे तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। इस दर्दनाक घटना से पहले उसने अपना सुसाइड नोट व्हाट्सएप स्टेटस पर साझा कर दिया था, जिससे उसके मन की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सुसाइड नोट में प्रियांशु ने अपने बचपन की कई ऐसी घटनाओं का जिक्र किया है, जिन्होंने उसके मन पर गहरा असर डाला। उसने लिखा कि जब वह मात्र छह साल का था, तब एक बार उसने फ्रिज में रखा मैंगोशेक पी लिया था। इस छोटी सी गलती पर उसके पिता ने उसे निर्वस्त्र कर घर से बाहर निकाल दिया था। यह घटना उसके मन में इतनी गहराई से बैठ गई कि वह कभी इसे भूल नहीं सका।
इसके अलावा, उसने यह भी लिखा कि पढ़ाई को लेकर उस पर हमेशा दबाव बनाया जाता था। अधूरी तैयारी होने पर डांटना या मारना उसे उतना नहीं खलता था, लेकिन हर समय उस पर शक करना, हर गतिविधि पर नजर रखना और हर मिनट का हिसाब मांगना उसे मानसिक रूप से तोड़ता चला गया। उसे महसूस होता था कि उसकी स्वतंत्रता छीन ली गई है और वह एक ऐसे माहौल में जी रहा है, जहां उसे खुद को साबित करने का मौका ही नहीं मिल रहा।
प्रियांशु ने अपने सुसाइड नोट में यह भी बताया कि उसके पिता अक्सर उसे सबके सामने अपमानित करते थे। बचपन की छोटी-छोटी गलतियों को भी बार-बार याद दिलाकर उसे शर्मिंदा किया जाता था। कक्षा नौ में विषय चयन के दौरान भी उसे अपनी पसंद के खिलाफ निर्णय लेना पड़ा, क्योंकि उसे पिता के गुस्से और अपमान का डर था।
उसने लिखा कि हाईस्कूल में कम अंक आने के बाद वह घर छोड़कर मथुरा तक चला गया था। यह कदम उसके भीतर के तनाव और दबाव का परिणाम था। इसके बावजूद, उसने अपने परिवार के लिए जिम्मेदारियों को निभाने की कोशिश की। उसने ट्यूशन पढ़ाकर घर खर्च में मदद की, ऑनलाइन काम करके पिता के लिए मोबाइल और बहन के लिए फोन व स्कूटी तक खरीदी। लेकिन इसके बावजूद उसे कभी सराहना नहीं मिली, बल्कि उल्टा उसे कमजोर और अयोग्य कहा जाता रहा।
प्रियांशु के अनुसार, उसके जीवन में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप किया जाता था। उसे यह भी बर्दाश्त नहीं होता था कि उसके हर कदम पर सवाल उठाए जाएं—कौन फोन कर रहा है, कहां जा रहे हो, किससे मिल रहे हो। उसे लगता था कि उसकी निजी जिंदगी पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
घटना के दिन भी, उसने अपने सुसाइड नोट में लिखा है कि उसके पिता ने मोहल्ले में सबके सामने उसे अपमानित किया। यह घटना उसके लिए अंतिम झटका साबित हुई। उसने लिखा कि वह अब इस तरह की जिंदगी नहीं जी सकता और इसी कारण उसने यह कठोर कदम उठाने का निर्णय लिया।
अपने नोट में उसने लिखा—“पापा जीत गए, उन्हें जीत मुबारक हो।” यह वाक्य उसके अंदर के दर्द और हार की भावना को दर्शाता है। उसने यह भी लिखा कि वह नहीं चाहता कि उसके पिता उसके शव को छुएं। यह दर्शाता है कि उसके मन में कितनी गहरी पीड़ा और आक्रोश भरा हुआ था।
हालांकि, उसने अपने सुसाइड नोट में यह भी लिखा कि उसके पिता के खिलाफ कोई कार्रवाई न की जाए। साथ ही, उसने अपनी मां और बहन के लिए ढेर सारा प्यार व्यक्त किया। यह दिखाता है कि अपने परिवार के प्रति उसके मन में मिश्रित भावनाएं थीं—एक ओर दर्द और आक्रोश, तो दूसरी ओर प्रेम और जिम्मेदारी।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि समाज में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता कितनी जरूरी है। कई बार लोग बाहरी तौर पर सामान्य दिखाई देते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर गहरे तनाव और अवसाद से जूझ रहे होते हैं। यदि समय रहते उनकी बात सुनी जाए और उन्हें सहारा दिया जाए, तो ऐसी दुखद घटनाओं को रोका जा सकता है।
परिवारों की भूमिका भी इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। बच्चों पर अनुशासन और मार्गदर्शन जरूरी है, लेकिन यह संतुलन के साथ होना चाहिए। अत्यधिक दबाव, अपमान और नियंत्रण किसी भी व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है।
कानपुर कचहरी में यह पिछले एक साल में दूसरी आत्महत्या की घटना है। इससे पहले भी एक महिला कर्मचारी ने इसी तरह अपनी जान दे दी थी। यह घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि कार्यस्थल और व्यक्तिगत जीवन में तनाव का स्तर बढ़ रहा है, जिसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।
अंततः, प्रियांशु की मौत एक ऐसी त्रासदी है, जिसे टाला जा सकता था यदि समय रहते उसके दर्द को समझा जाता। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमें अपने आसपास के लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और सजग होना चाहिए। क्योंकि कभी-कभी एक छोटा सा सहारा, एक समझदारी भरी बातचीत, किसी की जिंदगी बचा सकती है।
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