दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान गुरुग्राम जिले में हुई भारी पेड़ कटाई ने पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों में चिंता की लहर पैदा कर दी है। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत सामने आए आंकड़े यह बताते हैं कि केवल गुरुग्राम में ही लगभग 16 हजार पेड़ों और पौधों को सड़क विस्तार के लिए काटा गया। इस खुलासे ने पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों के लिए चेतावनी की घंटी बजा दी है।

आरटीआई रिपोर्ट के अनुसार, एक्सप्रेसवे के निर्माण के दौरान 9,650 पूर्ण विकसित पेड़ और 6,234 छोटे पौधों को काटा गया। कुल मिलाकर 15,884 पेड़-पौधों पर सड़क निर्माण के नाम पर कुल्हाड़ी चली। इसके साथ ही, लगभग 51.12 हेक्टेयर सुरक्षित वन भूमि को गैर-वन उद्देश्यों के लिए डायवर्ट किया गया। यह भूमि पहले पर्यावरणीय दृष्टि से संरक्षित थी और अब सड़क विस्तार के लिए इसका उपयोग किया गया।
पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 9 अगस्त 2018 को इस परियोजना के लिए मंजूरी दी थी, लेकिन यह शर्त रखी थी कि काटे गए पेड़ों की भरपाई ‘क्षतिपूर्ति वनीकरण’ (Compensatory Afforestation) के माध्यम से की जाएगी। इसका मकसद यह सुनिश्चित करना था कि पर्यावरण पर निर्माण के प्रभाव को कम किया जा सके और नए पौधों के माध्यम से हरियाली और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखा जा सके।
हालांकि, इस प्रक्रिया के पालन में गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता वैशाली राणा के अनुसार, राजीव चौक से सोहना बॉर्डर तक के क्षेत्र में विकास के नाम पर हजारों पेड़ काटे गए, लेकिन उनके बदले लगाए जाने वाले पौधे धरातल पर कहीं दिखाई नहीं दे रहे। उनका आरोप है कि एनएचएआई (राष्ट्रीय उच्चमार्ग प्राधिकरण) अक्सर केवल वनीकरण के लिए पैसे जमा कर देती है और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। इस पैसे का उपयोग वन विभाग को करना चाहिए, लेकिन विभाग की ओर से नए जंगल विकसित करने में कोई ठोस पहल नहीं दिखाई देती।
वैशाली राणा और अन्य पर्यावरणविदों ने कहा कि अरावली की तलहटी में स्थित इस क्षेत्र में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई सीधे तौर पर भूजल स्तर में कमी और वायु प्रदूषण बढ़ने का कारण बन सकती है। अरावली क्षेत्र पारिस्थितिकी दृष्टि से संवेदनशील है और यहां हर पेड़ का महत्व अत्यधिक है। बड़े पैमाने पर पेड़ कटने से मिट्टी का क्षरण, मौसम में असामान्य बदलाव और स्थानीय जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ता है।
आरटीआई में सामने आए आंकड़े और नियमों के अनुसार, परियोजनाओं के लिए काटे गए प्रत्येक पेड़ के बदले कम से कम 10 नए पौधे लगाना अनिवार्य है। यदि नियम के अनुसार देखा जाए, तो सोहना रोड पर हुई कटाई की भरपाई के लिए लगभग 1.5 लाख नए पेड़-पौधे लगाने चाहिए थे। लेकिन वन विभाग इस बात को स्पष्ट करने में असमर्थ रहा कि ये पौधे कहां लगाए गए हैं और क्या यह भूमि वन विभाग के रिकॉर्ड में संरक्षित है।
वन विभाग ने आरटीआई के जवाब में यह जानकारी दी कि सोहना रोड से कटे हुए पेड़ों के बदले नूंह और पंचकूला मोरनी में कुल 40 हजार पेड़-पौधे लगाए गए। हालांकि, यह संख्या नियमों के अनुसार अपेक्षित पौधों से काफी कम है। इसके अलावा, यह भी स्पष्ट नहीं है कि ये पौधे स्थायी रूप से संरक्षण योग्य हैं या केवल कागजों में ही वनीकरण का दावा किया गया है।
एनएचएआई और वन विभाग के इस रवैये ने पर्यावरणविदों और स्थानीय लोगों में नाराजगी पैदा कर दी है। उनका मानना है कि बड़े पैमाने पर पेड़ काटने और वनीकरण के कागजी दावों से पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल पैसे जमा करने और पौधे लगाने की कागजी प्रक्रिया पर्यावरण की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है। धरातल पर पौधों की निगरानी, उनकी सुरक्षा और उनकी स्थायित्वता सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
पर्यावरणविद वैशाली राणा ने इस मामले में कहा, “जब तक पेड़ धरातल पर नहीं दिखाई देंगे और उनका विकास नहीं होगा, तब तक यह कहां नहीं जा सकता कि परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव की भरपाई हो रही है। यह केवल कागजी प्रक्रिया बनकर रह गई है। हमें ठोस कदम उठाने की जरूरत है, नहीं तो भविष्य में यहां के भूजल स्तर और वायु गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ेगा।”
इस पूरी घटना ने यह भी उजागर किया कि विकास के नाम पर पर्यावरणीय नियमों का पालन अक्सर अनदेखा किया जाता है। भारत में कई ऐसे उदाहरण हैं, जहां बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के दौरान पेड़ कट जाते हैं और उनका क्षतिपूर्ति वनीकरण केवल कागजों तक सीमित रह जाता है। इसके परिणामस्वरूप न केवल स्थानीय पारिस्थितिकी प्रभावित होती है, बल्कि लोगों की जीवनशैली और आसपास के प्राकृतिक संसाधनों पर भी विपरीत असर पड़ता है।
गुरुग्राम में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे के निर्माण से जुड़े इस मामले ने यह सवाल उठाया है कि क्या बड़े विकास प्रोजेक्ट्स के लिए पर्यावरण की कीमत देना सही है। इसके साथ ही, यह भी देखा जाना चाहिए कि एनएचएआई और वन विभाग जैसी संस्थाएं अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में कितनी पारदर्शिता और जवाबदेही दिखा रही हैं।
अंततः, यह मामला केवल पेड़ों की कटाई का नहीं है। यह पर्यावरण संरक्षण, सरकारी जवाबदेही और नागरिकों के अधिकारों से जुड़ा हुआ मामला है। अगर समय रहते इस तरह के मामलों पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और पर्यावरण संरक्षण के बीच टकराव और बढ़ सकता है।
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