दिल्ली स्थित Jawaharlal Nehru University में छात्र राजनीति फिर से उफान पर है। लाइब्रेरी में कथित तोड़फोड़ प्रकरण के बाद छात्र संघ पदाधिकारियों के निष्कासन के खिलाफ रविवार रात परिसर में बड़ा विरोध मार्च निकाला गया। गंगा ढाबा से शुरू हुआ यह जुलूस एसएल-एसआईएस लॉन तक पहुंचा, जहां छात्रों ने प्रशासनिक फैसले को “कठोर और एकतरफा” बताते हुए उसे वापस लेने की मांग की।

विश्वविद्यालय प्रशासन ने दूसरी ओर सख्त रुख अपनाते हुए आदेश जारी किया है कि छात्र संघ अध्यक्ष Aditi Mishra, महासचिव Sunil Yadav और संयुक्त सचिव Danish Ali 16 फरवरी तक अपने हॉस्टल कमरे खाली कर दें। यह समयसीमा अब समाप्त हो रही है, जिससे परिसर में हलचल और बढ़ गई है।
विरोध की आवाज तेज
रविवार रात आयोजित मार्च में बड़ी संख्या में छात्र शामिल हुए। हाथों में तख्तियां और पोस्टर लिए छात्रों ने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखी। मार्च के दौरान छात्रों ने विश्वविद्यालय की “लोकतांत्रिक परंपरा” का हवाला देते हुए कहा कि बिना निष्पक्ष जांच और ठोस प्रमाण के इतनी कड़ी कार्रवाई उचित नहीं है।
सभा को संबोधित करते हुए वक्ताओं ने कहा कि यह केवल तीन पदाधिकारियों का मुद्दा नहीं, बल्कि छात्र अधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है। यदि प्रशासन ने आदेश वापस नहीं लिया, तो व्यापक आंदोलन की चेतावनी भी दी गई।
विवाद की पृष्ठभूमि
लाइब्रेरी परिसर में हुई कथित तोड़फोड़ के बाद प्रशासन ने जांच कर कार्रवाई की थी। प्रशासन का दावा है कि घटना में छात्र संघ के कुछ पदाधिकारी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जिम्मेदार पाए गए। इसी आधार पर निष्कासन का निर्णय लिया गया।
हालांकि संबंधित छात्र नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि वे किसी भी तरह की हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं थे और उन्हें बिना पर्याप्त सुनवाई के दंडित किया गया है। उन्होंने निष्पक्ष जांच समिति गठित करने और अपना पक्ष रखने का अवसर देने की मांग की है।
प्रशासन की तैयारी
विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि आदेशों का पालन हर हाल में सुनिश्चित किया जाएगा। हॉस्टल वार्डनों को निर्देश दे दिए गए हैं और परिसर में सुरक्षा व्यवस्था भी बढ़ा दी गई है। सूत्रों के मुताबिक, यदि निर्धारित समय तक कमरे खाली नहीं किए गए तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जा सकती है।
प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने या अनुशासन भंग करने के मामलों में सख्ती जरूरी है। साथ ही यह भी कहा गया कि छात्रों को अपनी बात रखने के लिए संस्थागत प्रक्रिया अपनानी चाहिए, न कि दबाव की राजनीति।
छात्र संगठनों की आगे की रणनीति
छात्र संगठनों ने इस मुद्दे पर आमसभा बुलाने और आंदोलन को आगे बढ़ाने की घोषणा की है। कुछ संगठनों ने देश के अन्य विश्वविद्यालयों से भी समर्थन मांगना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बना हुआ है।
कई अध्यापक भी इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। कुछ शिक्षकों ने सुझाव दिया है कि दोनों पक्ष संवाद की राह अपनाएं ताकि टकराव की स्थिति न बने। उनका मानना है कि विश्वविद्यालय का माहौल शांतिपूर्ण और शैक्षणिक गतिविधियों के अनुकूल रहना चाहिए।
बढ़ती संवेदनशीलता
हॉस्टल खाली करने की अंतिम तिथि समाप्त होने के साथ ही परिसर में स्थिति संवेदनशील बनी हुई है। छात्र इसे “लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई” बता रहे हैं, जबकि प्रशासन अनुशासन और नियमों के पालन पर जोर दे रहा है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या अंतिम समय में कोई समझौता होता है या मामला और गहराता है। फिलहाल, जेएनयू में माहौल तनावपूर्ण जरूर है, लेकिन हालात नियंत्रण में बताए जा रहे हैं। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह टकराव संवाद में बदलेगा या आंदोलन और तेज होगा।
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