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अब इंतजार खत्म: जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के ठिकाने उड़ाने की तैयारी

जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने का फैसला किया है। अब तक सुरक्षाबल अक्सर आतंकियों के बाहर निकलने या मुठभेड़ की स्थिति बनने का इंतजार करते थे, लेकिन नई नीति के तहत अब उन्हें उनके ठिकानों पर ही खत्म करने की तैयारी की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में फिलहाल करीब 80 से अधिक विदेशी आतंकियों के छिपे होने का अनुमान है, जिनमें अधिकांश पाकिस्तान से जुड़े माने जा रहे हैं

इन आतंकियों के पास आधुनिक हथियार मौजूद हैं, जिनमें अत्याधुनिक राइफलें और स्टील कोर वाली गोलियां शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ये गोलियां साधारण बुलेटप्रूफ जैकेट या वाहन सुरक्षा को भी भेद सकती हैं, जिससे जवानों के लिए खतरा कई गुना बढ़ जाता है। पिछले कुछ वर्षों में कई मुठभेड़ों में इस तरह की गोलियों के इस्तेमाल की पुष्टि हुई है। इसी अनुभव के आधार पर अब सुरक्षाबल नई कार्ययोजना पर काम कर रहे हैं, जिसमें पहाड़ी इलाकों में छिपे आतंकियों को बाहर आने का मौका देने के बजाय उनके ठिकानों पर सीधी कार्रवाई की जाएगी।

सूत्र बताते हैं कि जम्मू क्षेत्र में करीब 30 से 40 आतंकियों के सक्रिय होने की आशंका है, जबकि कश्मीर घाटी में उनकी संख्या 40 से 50 के बीच बताई जा रही है। इसके अलावा कुछ स्थानीय भर्ती हुए आतंकी भी सक्रिय हैं, जिनकी संख्या सीमित है। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि इन आतंकियों की लोकेशन अक्सर ऊंचे पहाड़ी इलाकों, घने जंगलों और प्राकृतिक गुफाओं में होती है। ऐसे स्थानों तक सीधे पहुंचना कठिन होता है और घेराबंदी के दौरान जवानों पर घात लगाकर हमला करने का खतरा रहता है।

इसी खतरे को कम करने के लिए अब मोर्टार और अन्य भारी हथियारों के इस्तेमाल पर जोर दिया जा रहा है। योजना के अनुसार, जिन ठिकानों की सटीक जानकारी मिल जाएगी, वहां सुरक्षाबल दूर से ही हमला कर ठिकानों को ध्वस्त करने की कोशिश करेंगे। इससे मुठभेड़ लंबी नहीं खिंचेगी और जवानों के हताहत होने का जोखिम भी घटेगा। सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि पहाड़ी गुफाओं या चट्टानों के पीछे छिपे आतंकियों को बाहर निकालना मुश्किल होता है, इसलिए उनके ठिकानों को निशाना बनाना ज्यादा प्रभावी होगा।

हाल ही में किश्तवाड़ इलाके में हुई एक मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने तीन आतंकियों को मार गिराया था, जिनके बारे में बताया गया कि वे जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े थे। मौके से बरामद हथियारों में स्वचालित राइफलें और विशेष प्रकार की गोलियां मिली थीं। सुरक्षा एजेंसियों ने माना कि इस तरह के हथियार सीमा पार से सप्लाई किए जा रहे हैं और आतंकियों को बेहतर युद्धक क्षमता देने की कोशिश की जा रही है।

दरअसल, स्टील कोर वाली गोलियां पहली बार 2017 में पुलवामा के लेथपोरा स्थित कैंप पर हुए हमले में चर्चा में आई थीं, जब आतंकियों ने केंद्रीय बलों पर इस प्रकार के गोला-बारूद का इस्तेमाल किया था। उस हमले में सीआरपीएफ के कई जवान शहीद हुए थे। जांच में सामने आया कि इस्तेमाल की गई गोलियां सामान्य बुलेटप्रूफ सुरक्षा को भी भेदने में सक्षम थीं, जिससे सुरक्षा तंत्र को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी गोलियां आम तौर पर विशेष सैन्य उपयोग के लिए बनाई जाती हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन पर कई तरह की पाबंदियां भी हैं। जानकारी के मुताबिक, इन गोलियों के निर्माण में कुछ विदेशी तकनीक का इस्तेमाल होता है और कई रिपोर्टों में इनके चीन में बने होने की बात सामने आई है। इसी संदर्भ में चीन का नाम भी चर्चा में रहा है, हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि करना कठिन होता है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसे गोला-बारूद के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई जाती रही है। उदाहरण के तौर पर नाटो ने भी कुछ प्रकार की बुलेट तकनीकों के उपयोग पर सीमाएं तय की हैं, ताकि युद्ध में अत्यधिक विनाशकारी हथियारों का अनियंत्रित इस्तेमाल न हो। भारत में भी सुरक्षा बलों के लिए कुछ तरह के गोला-बारूद पर कानूनी प्रतिबंध लागू हैं, जिससे आतंकियों और सुरक्षा बलों के हथियारों में अंतर बना रहता है।

इसी असमानता को देखते हुए अब सुरक्षाबलों ने तय किया है कि वे अपनी रणनीति को अधिक तकनीकी और दूरस्थ हमलों पर आधारित करेंगे। मोर्टार, ड्रोन निगरानी, थर्मल इमेजिंग और सैटेलाइट इनपुट के जरिए आतंकियों के ठिकानों का पता लगाया जाएगा। इसके बाद जरूरत पड़ने पर सीधे हमले किए जाएंगे, ताकि आतंकियों को भागने या जवाबी घात लगाने का मौका न मिले।

सुरक्षा अधिकारियों का मानना है कि पिछले तीन-चार वर्षों में कई जवानों की शहादत ऐसे ही घातक हमलों में हुई है, जहां आतंकियों ने ऊंचाई का फायदा उठाकर हमला किया। नई रणनीति का उद्देश्य ऐसी घटनाओं को कम करना और आतंकियों के नेटवर्क को जड़ से खत्म करना है। साथ ही, स्थानीय स्तर पर खुफिया तंत्र को मजबूत करने और सीमा पार से होने वाली घुसपैठ पर भी निगरानी बढ़ाई जा रही है।

कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि सुरक्षा बल अब रक्षात्मक रणनीति से आगे बढ़कर आक्रामक और तकनीक-आधारित कार्रवाई की ओर बढ़ रहे हैं। यदि यह योजना प्रभावी साबित होती है, तो आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के सुरक्षित ठिकाने कम होते जाएंगे और सुरक्षाबलों को अभियानों में बढ़त मिल सकती है।

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