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दिल्ली में फर्जी पीसीसी का बड़ा खुलासा: तस्कर की गिरफ्तारी के बाद सामने आया पुलिसकर्मी का काला कारनामा

दिल्ली में पुलिस की एक कार्रवाई के दौरान ऐसा खुलासा हुआ जिसने पूरे विभाग को हैरान कर दिया। मादक पदार्थों की तस्करी के मामले में एक आरोपी को पकड़ने गई पुलिस टीम को वहां ऐसा राज मिला, जिसने पुलिस महकमे की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए। जांच में सामने आया कि दिल्ली पुलिस का एक सिपाही अपने साथी के साथ मिलकर फर्जी पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट (पीसीसी) बनाने का धंधा चला रहा था। पुलिस ने मामले में दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है

तस्कर की गिरफ्तारी से खुली परतें

पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब दक्षिण-पूर्व जिले की नारकोटिक्स यूनिट ने मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप में आशीष नामक व्यक्ति को गिरफ्तार किया। पुलिस को उसके पास से करीब 18 ग्राम एमडीएमए (मादक पदार्थ) बरामद हुआ। गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने जब आशीष से पूछताछ की तो कई अहम जानकारी सामने आई।

पूछताछ के आधार पर पुलिस ने सनलाइट कॉलोनी थाना क्षेत्र में स्थित एक किराए के मकान पर छापा मारा। जब पुलिस वहां पहुंची तो मकान के अंदर दिल्ली पुलिस का सिपाही अरुण और उसका साथी तुषार मौजूद मिला। दोनों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो मामला पूरी तरह से खुलकर सामने आ गया।

छह महीने से किराए के मकान में चल रहा था खेल

पुलिस जांच में पता चला कि दोनों आरोपी पिछले करीब छह महीने से उस मकान में किराए पर रह रहे थे। बताया जा रहा है कि वे हर महीने लगभग 35 हजार रुपये किराया देते थे। शुरू में यह मकान सामान्य रूप से किराए पर लिया गया था, लेकिन धीरे-धीरे इसे फर्जी दस्तावेज बनाने के अड्डे के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा।

जांच के दौरान पुलिस को मकान से कई आपत्तिजनक चीजें बरामद हुईं। इनमें दिल्ली पुलिस के विभिन्न थानों के अधिकारियों की मुहरें, कई सरकारी स्टाम्प, फर्जी पहचान पत्र और बड़ी संख्या में तैयार किए गए फर्जी पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट शामिल थे।

दिल्ली पुलिस का सिपाही निकला मास्टरमाइंड

पुलिस अधिकारियों के अनुसार मुख्य आरोपी अरुण दिल्ली पुलिस में सिपाही है और वर्तमान में शाहीन बाग थाने में तैनात है। अरुण मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के मंडी का रहने वाला है। उसे अपने पिता की जगह अनुकंपा के आधार पर दिल्ली पुलिस में नौकरी मिली थी और वह वर्ष 2017 बैच का सिपाही है।

बताया जा रहा है कि अरुण ने अपने पद का फायदा उठाकर इस पूरे फर्जीवाड़े को अंजाम दिया। वह लोगों को भरोसा दिलाता था कि वह दिल्ली पुलिस से जुड़े होने के कारण जल्दी और आसानी से पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट बनवा सकता है।

साथी तुषार निभा रहा था अहम भूमिका

इस पूरे रैकेट में अरुण का साथी तुषार भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था। तुषार उत्तर प्रदेश के पिलखुआ का रहने वाला है और पहले कई थानों में पुलिस मित्र के रूप में काम कर चुका है। पुलिस सूत्रों का कहना है कि पुलिस सिस्टम की जानकारी होने के कारण तुषार इस फर्जी नेटवर्क को चलाने में अरुण की मदद करता था।

दोनों मिलकर लोगों से संपर्क करते और उन्हें जल्दी पीसीसी बनवाने का लालच देते थे। सामान्य तौर पर दिल्ली पुलिस के माध्यम से पीसीसी बनने में 10 से 15 दिन का समय लगता है, लेकिन आरोपी दावा करते थे कि वे कुछ ही घंटों में पीसीसी बनाकर दे सकते हैं।

हजारों रुपये वसूलते थे आरोपी

जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपी हर पीसीसी के बदले लोगों से 1000 से 2000 रुपये या उससे अधिक रकम वसूलते थे। जबकि दिल्ली पुलिस की आधिकारिक प्रक्रिया में पीसीसी बनवाने के लिए मात्र 10 रुपये का शुल्क लिया जाता है।

सूत्रों का कहना है कि अब तक आरोपी सैकड़ों फर्जी पीसीसी बना चुके हैं। पुलिस को आरोपियों के मोबाइल फोन से भी कई लोगों के नाम पर बनाए गए फर्जी पीसीसी मिले हैं।

एचएचओ की मुहर लगाकर बनाए जाते थे दस्तावेज

पुलिस के अनुसार असली पीसीसी दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच द्वारा जारी किया जाता है। लेकिन आरोपी एचएचओ (हाउस ऑफिसर) की नकली मुहर लगाकर फर्जी पीसीसी तैयार कर रहे थे। इस तरह वे लोगों को यह विश्वास दिलाते थे कि दस्तावेज पूरी तरह से असली है।

मकान से बरामद मुहरों और दस्तावेजों की संख्या देखकर पुलिस भी हैरान रह गई। माना जा रहा है कि इस रैकेट के जरिए बड़ी संख्या में लोगों को फर्जी दस्तावेज दिए गए होंगे।

मादक पदार्थों की तस्करी से भी जुड़ाव

जांच के दौरान पुलिस को यह भी जानकारी मिली है कि आरोपी मादक पदार्थों की तस्करी में भी शामिल थे। पुलिस सूत्रों के मुताबिक बरामद एमडीएमए खरीदने के लिए सिपाही अरुण ने अपने मोबाइल फोन से भुगतान किया था।

इससे यह शक और गहरा हो गया है कि आरोपी केवल फर्जी पीसीसी बनाने तक ही सीमित नहीं थे, बल्कि उनका संबंध नशे के कारोबार से भी हो सकता है।

मकान से मिली विदेशी युवती

छापेमारी के दौरान पुलिस को मकान से एक विदेशी युवती भी मिली। बताया जा रहा है कि वह उज्बेकिस्तान की रहने वाली है और काफी समय से आरोपियों के साथ रह रही थी।

पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि क्या इस युवती का संबंध मादक पदार्थों की तस्करी या किसी अन्य गैरकानूनी गतिविधि से है। फिलहाल उससे भी पूछताछ की जा रही है।

दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज

मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने दो अलग-अलग एफआईआर दर्ज की हैं। पहली एफआईआर मादक पदार्थों की बरामदगी को लेकर दर्ज की गई है, जबकि दूसरी एफआईआर फर्जी पहचान पत्र बनाने और पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट तैयार करने के मामले में दर्ज की गई है।

दक्षिण-पूर्व जिले के पुलिस उपायुक्त डॉ. हेमंत तिवारी ने भी इस मामले की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि पहचान बदलकर फर्जी पीसीसी बनाने का मामला सामने आया है और इसकी जांच की जा रही है।

क्या होता है पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट

पुलिस क्लीयरेंस सर्टिफिकेट एक महत्वपूर्ण सरकारी दस्तावेज होता है। इसे दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच जारी करती है और इसमें यह प्रमाणित किया जाता है कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है।

इस दस्तावेज की जरूरत आमतौर पर विदेश में नौकरी, वीजा आवेदन, किराएदार सत्यापन या किसी निजी संस्था में नौकरी के दौरान पड़ती है।

फरार सब-इंस्पेक्टर का भी आया नाम

जांच के दौरान यह भी पता चला कि दिल्ली पुलिस की अपराध शाखा में तैनात एक सब-इंस्पेक्टर राकेश कुमार भी पहले इसी इलाके में रहकर मादक पदार्थों की तस्करी में शामिल था। वह कई सालों से फरार है। हालांकि मार्च 2025 में दिल्ली पुलिस ने उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया था।

जांच जारी

फिलहाल पुलिस इस पूरे मामले की गहराई से जांच कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि आरोपियों से पूछताछ के आधार पर और भी कई खुलासे हो सकते हैं। यह भी पता लगाया जा रहा है कि इस फर्जी रैकेट में और कौन-कौन लोग शामिल हैं।

पुलिस का मानना है कि आने वाले दिनों में इस मामले में और गिरफ्तारियां भी हो सकती हैं। फिलहाल इस खुलासे ने पुलिस विभाग के भीतर ही चल रहे भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों को उजागर कर दिया है।

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