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महिला सुरक्षा की दिशा में सख्त पहल: केरल हाईकोर्ट ने कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न रोकने के लिए बनाए नए नियम

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता देते हुए Kerala High Court ने एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम उठाया है। कोर्ट परिसर में यौन उत्पीड़न की घटनाओं को रोकने और पीड़ितों को त्वरित न्याय दिलाने के उद्देश्य से नए नियम लागू किए गए हैं। यह पहल न केवल न्यायिक संस्थानों के भीतर सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करने की दिशा में अहम है, बल्कि समाज में भी एक मजबूत संदेश देती है कि किसी भी प्रकार के उत्पीड़न को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

23 मार्च से लागू होंगे नए प्रावधान

हाईकोर्ट द्वारा बनाए गए ये नियम “महिलाओं के प्रति लैंगिक संवेदनशीलता और यौन उत्पीड़न विनियम, 2026” के तहत अधिसूचित किए गए हैं। इन नियमों को 17 मार्च को राज्य के राजपत्र में प्रकाशित किया गया और 23 मार्च से इन्हें लागू कर दिया जाएगा। इनका मुख्य उद्देश्य कोर्ट परिसर में काम करने वाली महिलाओं—चाहे वे वकील हों, कर्मचारी हों या अन्य स्टाफ—को सुरक्षित वातावरण प्रदान करना है।

GSICC: शिकायतों के समाधान के लिए विशेष समिति

नए नियमों के तहत “जेंडर सेंसिटाइजेशन एंड इंटरनल कंप्लेंट्स कमेटी” (GSICC) का गठन किया जाएगा। यह समिति यौन उत्पीड़न से जुड़ी शिकायतों की जांच और निपटारे के लिए जिम्मेदार होगी।

इस समिति में कुल 7 से 13 सदस्य शामिल होंगे। इसमें एक या दो न्यायाधीश भी होंगे, जिनमें से एक को अध्यक्ष बनाया जाएगा। इसके अलावा वरिष्ठ अधिवक्ता, महिला वकील संगठनों के प्रतिनिधि और क्लर्क्स एसोसिएशन के सदस्य भी इसमें शामिल होंगे। इससे यह सुनिश्चित किया गया है कि समिति में विविध दृष्टिकोण मौजूद रहें और मामलों का निष्पक्ष तरीके से निपटारा हो सके।

इसके अतिरिक्त, मुख्य न्यायाधीश को यह अधिकार दिया गया है कि वे महिला एवं बाल विकास विभाग या सामाजिक न्याय के क्षेत्र में काम करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) से विशेषज्ञों को भी समिति में शामिल कर सकते हैं। इससे समिति की कार्यक्षमता और विशेषज्ञता दोनों में वृद्धि होगी।

तय किया गया कार्यकाल और जिम्मेदारियां

GSICC के सदस्यों का कार्यकाल दो वर्ष का होगा और कोई भी सदस्य लगातार दो बार से अधिक इस पद पर नहीं रह सकेगा। यह प्रावधान पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए किया गया है।

समिति हर तीन महीने में कम से कम एक बैठक करेगी। हालांकि, यदि किसी मामले में तत्काल सुनवाई की आवश्यकता हो, तो अतिरिक्त बैठक भी बुलाई जा सकती है। समिति का काम केवल शिकायतों की जांच तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह कार्यस्थल पर लैंगिक संवेदनशीलता को बढ़ाने के लिए नीतियां तैयार करने और उन्हें लागू करने का भी जिम्मा निभाएगी।

यौन उत्पीड़न की स्पष्ट और व्यापक परिभाषा

नए नियमों में यौन उत्पीड़न की परिभाषा को काफी विस्तृत किया गया है, ताकि किसी भी प्रकार के अनुचित व्यवहार को नजरअंदाज न किया जा सके।

इनमें शारीरिक संपर्क और अनुचित स्पर्श, अश्लील या आपत्तिजनक टिप्पणी, यौन संबंधों की मांग, अश्लील सामग्री दिखाना या भेजना, पीछा करना (स्टॉकिंग) और निजी क्षणों में झांकना (वॉयूरिज्म) जैसे कृत्य शामिल किए गए हैं।

इसके अलावा, किसी महिला पर पद या अधिकार का दबाव डालकर उसे मानसिक या पेशेवर नुकसान पहुंचाने की धमकी देना, या उसे करियर में लाभ या हानि का डर दिखाना भी यौन उत्पीड़न की श्रेणी में रखा गया है। इस तरह की व्यापक परिभाषा यह सुनिश्चित करती है कि कोई भी पीड़ित न्याय से वंचित न रहे।

POSH कानून को दी गई प्राथमिकता

इन नए नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि Sexual Harassment of Women at Workplace Act 2013 (POSH कानून) के प्रावधान सर्वोपरि होंगे। यदि किसी मामले में यह कानून लागू होता है, तो GSICC उस मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगी और संबंधित प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जाएगी।

यह व्यवस्था इसलिए की गई है ताकि कानूनी प्रक्रिया में कोई टकराव न हो और मामलों का निपटारा तय कानूनों के अनुसार ही हो।

शिकायत से फैसले तक की प्रक्रिया

जब किसी महिला द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज की जाती है, तो GSICC उस पर जांच शुरू करती है। जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश को सौंपती है।

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश दोनों पक्षों को सुनवाई का अवसर देते हैं और सभी तथ्यों के आधार पर अंतिम निर्णय लेते हैं। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया है।

सुरक्षित कार्यस्थल की ओर बड़ा कदम

केरल हाईकोर्ट का यह कदम न्यायपालिका के भीतर महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इससे न केवल कोर्ट परिसर में काम करने वाली महिलाओं को सुरक्षा का एहसास होगा, बल्कि यह अन्य संस्थानों के लिए भी एक उदाहरण प्रस्तुत करेगा।

आज के समय में जब कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है, ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो गया है। इस पहल से यह संदेश भी जाता है कि न्यायपालिका खुद अपने भीतर अनुशासन और संवेदनशीलता को लेकर गंभीर है।

समाज पर व्यापक प्रभाव

इस तरह के सख्त नियमों का प्रभाव केवल कोर्ट परिसर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह समाज के अन्य हिस्सों को भी प्रेरित करेगा। जब उच्च न्यायालय जैसे संस्थान इस प्रकार की पहल करते हैं, तो अन्य संस्थान भी इसी दिशा में कदम उठाने के लिए प्रेरित होते हैं।

इसके अलावा, इससे महिलाओं में यह विश्वास भी बढ़ेगा कि यदि उनके साथ किसी भी प्रकार का उत्पीड़न होता है, तो उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।

निष्कर्ष

Kerala High Court द्वारा लागू किए गए ये नए नियम महिला सुरक्षा के प्रति एक मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। GSICC जैसी समिति का गठन, स्पष्ट परिभाषाएं और सख्त प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि यौन उत्पीड़न के मामलों को गंभीरता से लिया जाए और उनका त्वरित समाधान हो।

यह पहल न केवल न्यायिक व्यवस्था को और अधिक संवेदनशील बनाती है, बल्कि पूरे समाज को यह संदेश देती है कि महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा सर्वोपरि है। आने वाले समय में यह मॉडल देश के अन्य न्यायालयों और संस्थानों के लिए भी एक मार्गदर्शक साबित हो सकता है।

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