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मियादी बुखार का बढ़ता संकट: इलाज का भारी खर्च, हजारों परिवार कर्ज में डूबे

भारत में मियादी बुखार अब केवल एक आम संक्रामक बीमारी नहीं रह गया है, बल्कि यह धीरे-धीरे एक बड़े आर्थिक संकट का रूप लेता जा रहा है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन ने इस समस्या की गंभीरता को उजागर करते हुए बताया है कि इस बीमारी के कारण देश को हर साल हजारों करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस बोझ का बड़ा हिस्सा सीधे मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ रहा है।

इलाज का खर्च बना बड़ी परेशानी

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मियादी बुखार के इलाज पर होने वाले कुल खर्च का लगभग 91 प्रतिशत मरीजों को अपनी जेब से देना पड़ता है। यह स्थिति उन परिवारों के लिए बेहद कठिन हो जाती है, जिनकी आय सीमित होती है। इलाज, दवाइयों, अस्पताल में भर्ती और जांचों पर होने वाला खर्च इतना अधिक है कि हजारों परिवार आर्थिक संकट में फंस जाते हैं।

अध्ययन में यह भी सामने आया है कि करीब 70 हजार से अधिक परिवार ऐसे हैं, जो इलाज के चलते “कैटास्ट्रॉफिक हेल्थ कॉस्ट” की स्थिति में पहुंच चुके हैं। इसका अर्थ है कि उन्हें अपनी कुल आय का 40 प्रतिशत या उससे अधिक हिस्सा केवल इलाज पर खर्च करना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में उनके लिए रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना भी मुश्किल हो जाता है।

देश की अर्थव्यवस्था पर असर

मियादी बुखार का असर केवल व्यक्तिगत या पारिवारिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी साफ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इस बीमारी के कारण हर साल लगभग 12,300 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हो रहा है। इसमें इलाज का खर्च, कामकाजी दिनों का नुकसान और उत्पादकता में कमी जैसे कई पहलू शामिल हैं।

जब बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़ते हैं, तो वे काम पर नहीं जा पाते, जिससे उनकी आय प्रभावित होती है और देश की कुल उत्पादकता पर भी असर पड़ता है। इस प्रकार, यह बीमारी स्वास्थ्य के साथ-साथ आर्थिक विकास के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन चुकी है।

बच्चों पर सबसे ज्यादा प्रभाव

इस बीमारी का सबसे ज्यादा असर छोटे बच्चों पर देखा जा रहा है। विशेष रूप से 10 साल से कम उम्र के बच्चे इसके प्रति अधिक संवेदनशील हैं। अध्ययन के अनुसार, पांच से नौ साल के बच्चों में संक्रमण के मामले सबसे ज्यादा पाए गए हैं, जबकि छह महीने से चार साल तक के बच्चों में अस्पताल में भर्ती होने और मृत्यु का खतरा अधिक है।

2023 के आंकड़ों के अनुसार, देश में मियादी बुखार के लगभग 49 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए, जिनमें करीब 7,850 लोगों की मौत हुई। इनमें बड़ी संख्या बच्चों की थी। पांच साल से कम उम्र के लगभग 3.21 लाख बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।

राज्यों में बढ़ता बोझ

देश के कुछ राज्यों में इस बीमारी का प्रभाव अधिक देखने को मिला है। महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में इसके आधे से ज्यादा मामले सामने आए हैं। इसके अलावा दिल्ली, महाराष्ट्र और कर्नाटक पर कुल मामलों का लगभग 29 प्रतिशत बोझ पड़ा है।

शहरी क्षेत्रों में यह समस्या ज्यादा गंभीर है, जहां जनसंख्या घनत्व अधिक होने के कारण संक्रमण तेजी से फैलता है। खराब स्वच्छता, दूषित पानी और भीड़भाड़ वाली जीवनशैली इस बीमारी के प्रसार को बढ़ावा देती है।

एंटीबायोटिक दवाओं की घटती प्रभावशीलता

इस समस्या को और गंभीर बना रही है एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR), यानी दवाओं के प्रति बैक्टीरिया की बढ़ती प्रतिरोधक क्षमता। मियादी बुखार के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एंटीबायोटिक दवाएं अब पहले जितनी प्रभावी नहीं रह गई हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, दवाओं के इस प्रतिरोध के कारण इलाज का खर्च तेजी से बढ़ रहा है और कुल खर्च का लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा इसी कारण प्रभावित हो रहा है। मरीजों को लंबे समय तक इलाज कराना पड़ता है और कई बार महंगी दवाइयों का सहारा लेना पड़ता है।

समाधान की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या से निपटने के लिए केवल इलाज पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोकथाम के उपायों को भी मजबूत करना जरूरी है। स्वच्छ पेयजल, बेहतर साफ-सफाई और टीकाकरण जैसी सुविधाओं को बढ़ावा देकर इस बीमारी के मामलों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

इसके अलावा, स्वास्थ्य सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाना भी जरूरी है, ताकि गरीब और मध्यम वर्ग के लोग इलाज का खर्च आसानी से उठा सकें। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जिससे लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं पर कम खर्च करना पड़े और उन्हें आर्थिक संकट का सामना न करना पड़े।

निष्कर्ष

मियादी बुखार आज भारत के सामने एक दोहरी चुनौती बनकर उभर रहा है—एक तरफ यह स्वास्थ्य के लिए खतरा है, तो दूसरी तरफ यह आर्थिक रूप से भी लोगों को कमजोर कर रहा है। हजारों परिवार इलाज के खर्च के कारण कर्ज में डूब रहे हैं और देश को भी भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।

यदि समय रहते इस पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि सरकार, स्वास्थ्य संस्थाएं और समाज मिलकर इस दिशा में प्रभावी कदम उठाएं, ताकि इस बीमारी के बढ़ते खतरे को रोका जा सके और लोगों को आर्थिक राहत मिल सके।

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