प्रयागराज के संगम तट पर 15 जनवरी को मकर संक्रांति के अवसर पर आस्था और श्रद्धा का विराट दृश्य देखने को मिलेगा। मेला प्रशासन के अनुमान के अनुसार इस पावन पर्व पर दो करोड़ से अधिक श्रद्धालु संगम में आस्था की डुबकी लगाएंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए अरैल, झूंसी और संगम क्षेत्र में कुल 24 स्नान घाटों पर विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं।

श्रद्धालुओं को सुविधा देने के लिए यह योजना बनाई गई है कि वे जिस दिशा से मेला क्षेत्र में प्रवेश करेंगे, उसी के पास स्थित घाट पर स्नान कर सकें। पिछले वर्ष मकर संक्रांति पर लगभग 29 लाख श्रद्धालुओं ने संगम स्नान किया था, जबकि इस बार भीड़ कहीं अधिक रहने की संभावना है। इसी कारण स्नान घाटों की कुल लंबाई बढ़ाकर 3.69 किलोमीटर कर दी गई है, जो पहले केवल दो किलोमीटर थी।
मेला क्षेत्र में आवागमन को सुगम बनाने के लिए 106 किलोमीटर से अधिक लंबाई में चेकर्ड प्लेट की सड़कें बनाई गई हैं। वहीं तीर्थ पुरोहितों, आचार्यबाड़ा, दंडीबाड़ा, खाक चौक सहित प्रमुख धार्मिक और आध्यात्मिक संस्थानों के शिविर भी पूरी तरह सजकर तैयार हो चुके हैं।
इन घाटों पर होगी स्नान व्यवस्था
अरैल क्षेत्र
पक्का घाट, अरैल घाट, सेल्फी प्वाइंट घाट, महाकाल आरती घाट, चक्रम माधव घाट, सोमेश्वर महादेव घाट
झूंसी क्षेत्र
संगम लोअर घाट, एरावत घाट, मोरी घाट, ओल्ड जीटी घाट, शिवाला घाट, दंडीबाड़ा घाट, आचार्यबाड़ा घाट, कल्पवासी घाट
परेड संगम क्षेत्र
संगम नोज, यमुनापट्टी घाट, गंगापट्टी घाट, महावीर घाट (पश्चिमी), रामघाट, काली घाट, मोरी घाट, शिवाला घाट (पश्चिमी), दशाश्वमेध घाट, नागवासुकी घाट
अब 55 वर्षों तक 15 जनवरी को ही मनेगी मकर संक्रांति
ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य 15 जनवरी को धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करेंगे। इसके चलते वर्ष 2080 तक मकर संक्रांति हर साल 15 जनवरी को ही मनाई जाएगी। इसके बाद सूर्य का राशि परिवर्तन 16 जनवरी को होने लगेगा। इस वर्ष सूर्य का प्रवेश रात्रि 9:38 बजे होगा, जिसके साथ ही खरमास समाप्त हो जाएगा और मांगलिक कार्यों की शुरुआत हो सकेगी।
इस बार मकर संक्रांति शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि, ज्येष्ठा नक्षत्र और गुरुवार के संयोग में मनाई जा रही है। ज्योतिषाचार्य दैवज्ञ कृष्ण शास्त्री के अनुसार उत्तरायण को देवताओं का दिन माना गया है, और इस दिन साधारण नदी भी गंगा के समान पुण्यदायी मानी जाती है।
72 वर्षों में बदलती है मकर संक्रांति की तिथि
ज्योतिषविदों के मुताबिक सूर्य के राशि परिवर्तन में हर वर्ष लगभग 20 मिनट की देरी होती है। इसी कारण 72 वर्षों में यह अंतर एक पूरे दिन का हो जाता है। इतिहास पर नजर डालें तो 1936 से पहले मकर संक्रांति 14, 13 और यहां तक कि 12 जनवरी को भी मनाई जाती रही है। समय के साथ सूर्य की गति में होने वाले इस खगोलीय परिवर्तन के कारण तिथि में बदलाव होता रहता है।
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