पंजाब का प्रमुख लोकपर्व लोहड़ी केवल मौसमी उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों, किसान संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। घर-आंगन में जलती लोहड़ी की आग में जहां किसान अपनी फसल की उम्मीदें अर्पित करता है, वहीं बुजुर्गों के प्रति सम्मान और सामूहिकता की भावना भी प्रकट होती है।

लोहड़ी के अवसर पर पुत्रवधुओं द्वारा सास-ससुर और परिवार के बुजुर्गों को लोई या शॉल भेंट करने की परंपरा आज भी निभाई जाती है। यह रस्म पीढ़ियों के बीच सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक मानी जाती है।
लोकगीत ‘सुंदर-मुंदरिए’ के बिना लोहड़ी अधूरी मानी जाती है। यह गीत मुगलकाल में अन्याय के खिलाफ संघर्ष करने वाले जननायक दुल्ला भट्टी की वीरता और नारी सम्मान की कथा को जीवित रखता है। दुल्ला भट्टी ने गरीब परिवारों की बेटियों को मुगल अधिकारियों से मुक्त कर उनका कन्यादान किया था।
समय के साथ लोहड़ी से जुड़ी सोच में बदलाव भी देखने को मिल रहा है। पहले जहां यह पर्व केवल पुत्र-प्राप्ति से जुड़ा था, वहीं अब कई परिवारों में बेटियों की पहली लोहड़ी भी पूरे उत्साह के साथ मनाई जा रही है। समाजशास्त्रियों के अनुसार यह बदलाव जेंडर समानता की दिशा में सकारात्मक संकेत है।
आर्थिक दृष्टि से भी लोहड़ी महत्वपूर्ण है। पर्व के आसपास एक सप्ताह में मूंगफली, रेवड़ी, गजक, लकड़ी, ढोल और टेंट से जुड़े कारोबार में कई गुना बढ़ोतरी होती है। यह पर्व हजारों छोटे व्यापारियों और कारीगरों की आय का अहम जरिया बनता है।
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