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17 फरवरी को आसमान में दिखेगा ‘रिंग ऑफ फायर’ का दुर्लभ नजारा, साल का पहला वलयाकार सूर्य ग्रहण दुनिया के कई हिस्सों में नजर आएगा

दुनियाभर के खगोल प्रेमियों और विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए 17 फरवरी का दिन खास रहने वाला है। इस दिन साल 2026 का पहला सूर्य ग्रहण लगेगा, जो वलयाकार सूर्य ग्रहण होगा। वलयाकार ग्रहण को आमतौर पर “रिंग ऑफ फायर” के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस दौरान चंद्रमा सूर्य के बीच में आकर उसके केंद्र भाग को ढक लेता है, लेकिन सूर्य का बाहरी किनारा चमकता हुआ अग्नि-वलय जैसा दिखाई देता है। यही कारण है कि यह दृश्य बेहद आकर्षक और दुर्लभ माना जाता है।

खगोल वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ग्रहण भारतीय समयानुसार दोपहर लगभग 12 बजकर 31 मिनट पर अपने चरम पर पहुंचेगा। हालांकि यह समय अलग-अलग देशों में स्थानीय समय के अनुसार थोड़ा बदल सकता है। वैश्विक समय (UTC) के अनुसार ग्रहण की शुरुआत सुबह 09:56 बजे मानी जा रही है। ग्रहण के दौरान रिंग ऑफ फायर का दृश्य लगभग 2 मिनट 20 सेकंड तक बना रह सकता है, जो खगोलीय घटनाओं के लिहाज से एक महत्वपूर्ण अवधि मानी जाती है।

यह ग्रहण मुख्य रूप से दक्षिणी गोलार्ध के कुछ हिस्सों में बेहतर तरीके से दिखाई देगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह घटना उन क्षेत्रों में अधिक स्पष्ट होगीखोगी जहां चंद्रमा की छाया पृथ्वी पर सीधे पड़ेगी। बर्फीले महाद्वीप Antarctica के कुछ हिस्सों में इस खगोलीय घटना का प्रभाव विशेष रूप से देखा जा सकेगा। इसके अलावा दक्षिणी महासागर के आसपास के क्षेत्रों में भी ग्रहण का आंशिक या वलयाकार रूप दिखाई दे सकता है।

जहां तक भारत की बात है, यहां के लोगों को इस ग्रहण का प्रत्यक्ष दृश्य देखने का मौका नहीं मिलेगा। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, ग्रहण के समय भारत के अधिकांश हिस्सों में सूर्य क्षितिज के नीचे होगा। यानी उस समय भारत में शाम या रात का समय रहेगा, जिससे सूर्य दिखाई ही नहीं देगा और ग्रहण देखना संभव नहीं होगा। यही कारण है कि देश में इस ग्रहण को लेकर धार्मिक या पारंपरिक सावधानियों की आवश्यकता भी नहीं मानी जा रही।

सूर्य ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच आ जाता है और सूर्य की रोशनी को आंशिक या पूर्ण रूप से ढक देता है। ग्रहण तीन प्रकार के होते हैं — पूर्ण सूर्य ग्रहण, आंशिक सूर्य ग्रहण और वलयाकार सूर्य ग्रहण। वलयाकार ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा पृथ्वी से अपेक्षाकृत दूर होता है और उसका आकार आकाश में छोटा दिखाई देता है। ऐसे में वह सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और सूर्य का बाहरी किनारा चमकता हुआ दिखाई देता है, जिससे “रिंग ऑफ फायर” जैसा दृश्य बनता है।

खगोल विज्ञान संस्थाओं और अंतरिक्ष एजेंसियों, जैसे NASA, का कहना है कि ऐसे ग्रहण वैज्ञानिकों को सूर्य के वातावरण, उसकी रोशनी और पृथ्वी के वायुमंडल पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन करने का अवसर देते हैं। हालांकि वलयाकार ग्रहण में सूर्य का पूरा भाग नहीं ढकता, फिर भी इससे जुड़ी कई महत्वपूर्ण खगोलीय जानकारियां हासिल की जा सकती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ग्रहण देखने के दौरान सुरक्षा का ध्यान रखना बेहद जरूरी होता है। सीधे सूर्य की ओर देखना आंखों के लिए हानिकारक हो सकता है। ग्रहण देखने के लिए विशेष सोलर फिल्टर वाले चश्मों का उपयोग करना चाहिए। बिना सुरक्षा उपकरण के सूर्य को देखने से आंखों की रोशनी को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है। हालांकि भारत में यह ग्रहण दिखाई नहीं देगा, फिर भी जिन क्षेत्रों में यह दिखेगा वहां वैज्ञानिक और पर्यटक दोनों बड़ी संख्या में इसे देखने पहुंच सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि वर्ष 2026 में सूर्य ग्रहण की दो प्रमुख घटनाएं होने वाली हैं। फरवरी का यह ग्रहण वर्ष का पहला सूर्य ग्रहण होगा। इसके बाद वर्ष के दूसरे भाग में एक और सूर्य ग्रहण देखने को मिल सकता है, जिससे खगोल विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह साल काफी खास माना जा रहा है।

ऐसी खगोलीय घटनाएं न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होती हैं, बल्कि लोगों में ब्रह्मांड को समझने की जिज्ञासा भी बढ़ाती हैं। प्राचीन काल में ग्रहण को रहस्यमय और धार्मिक दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन आज विज्ञान ने इन घटनाओं की स्पष्ट व्याख्या कर दी है। फिर भी जब भी सूर्य ग्रहण लगता है, लोगों में उत्साह और जिज्ञासा देखने को मिलती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रहण जैसे दुर्लभ खगोलीय दृश्य हमें यह समझने का अवसर देते हैं कि हमारा ब्रह्मांड कितनी सटीक गति और संतुलन से संचालित हो रहा है। सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की यह विशेष स्थिति हमें अंतरिक्ष की विशालता और प्रकृति के अद्भुत संतुलन की याद दिलाती है।
कुल मिलाकर, 17 फरवरी का यह वलयाकार सूर्य ग्रहण भले ही भारत में दिखाई न दे, लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में यह एक शानदार खगोलीय अनुभव बनने वाला है। विज्ञान प्रेमियों, फोटोग्राफरों और अंतरिक्ष अनुसंधान से जुड़े लोगों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखेगा।

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