उत्तर प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए विजिलेंस विभाग ने एक बड़े मामले में कार्रवाई की है। वाणिज्य कर विभाग के सेवानिवृत्त अपर आयुक्त केशवलाल के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के आरोप में केस दर्ज किया गया है। शुरुआती जांच में सामने आया है कि उन्होंने अपनी सेवा अवधि के दौरान अपनी वैध आय से कई गुना अधिक संपत्ति अर्जित की, जिससे पूरे प्रशासनिक तंत्र में हलचल मच गई है।

विजिलेंस विभाग द्वारा की गई जांच के अनुसार, केशवलाल की कुल वैध आय लगभग एक करोड़ रुपये आंकी गई है, जबकि उनके द्वारा अर्जित संपत्तियों और खर्चों का कुल आंकड़ा करीब 18.27 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। इस तरह उनकी आय और संपत्ति के बीच भारी अंतर पाया गया है, जो स्पष्ट रूप से आय से अधिक संपत्ति के दायरे में आता है। अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में उपलब्ध साक्ष्य इतने मजबूत हैं कि उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करना जरूरी हो गया।
इस पूरे मामले की शुरुआत सितंबर 2023 में हुई थी, जब शासन स्तर पर केशवलाल के खिलाफ शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए विजिलेंस जांच के आदेश दिए गए। इसके बाद विजिलेंस टीम ने उनकी आय, बैंक खातों, निवेश और संपत्तियों की गहन जांच शुरू की। जांच के दौरान कई ऐसे दस्तावेज सामने आए, जिन्होंने यह संकेत दिया कि संपत्ति अर्जन में नियमों का उल्लंघन किया गया है।
जांच में यह भी सामने आया है कि केशवलाल ने उत्तर प्रदेश के कई बड़े शहरों में संपत्तियां बना रखी हैं। लखनऊ, कानपुर, नोएडा, गाजियाबाद और प्रयागराज जैसे शहरों में उनके नाम पर मकान और प्लॉट होने की जानकारी मिली है। इन संपत्तियों की कीमत करोड़ों रुपये में आंकी जा रही है। इसके अलावा कुछ अन्य निवेश, जैसे बैंक डिपॉजिट और अन्य वित्तीय साधनों में भी उनकी हिस्सेदारी की जांच की जा रही है।
विजिलेंस अधिकारियों का कहना है कि जब केशवलाल से उनकी संपत्ति के स्रोत के बारे में पूछताछ की गई, तो वे संतोषजनक जवाब नहीं दे सके। इससे यह संदेह और गहरा हो गया कि संपत्ति अर्जन में अनियमितता बरती गई है। यही वजह है कि अब इस मामले में कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है और आगे की जांच जारी है।
इस मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वर्ष 2017 में आयकर विभाग ने भी केशवलाल के ठिकानों पर छापेमारी की थी। उस दौरान कानपुर और नोएडा समेत कई स्थानों पर छापे मारे गए थे, जिसमें करीब 11 करोड़ रुपये नकद और लगभग 3.5 करोड़ रुपये के आभूषण बरामद किए गए थे। इसके अलावा कई महत्वपूर्ण दस्तावेज भी हाथ लगे थे, जो उनकी संपत्तियों से जुड़े हुए थे। उस समय भी यह मामला चर्चा में आया था, लेकिन अब विजिलेंस जांच के बाद यह और गंभीर हो गया है।
वर्तमान में विजिलेंस विभाग इस पूरे मामले को हर एंगल से जांच रहा है। अधिकारी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इस मामले में कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था या फिर इसमें अन्य लोगों की भी भूमिका रही है। जरूरत पड़ने पर संबंधित लोगों से पूछताछ भी की जा सकती है।
इसी बीच विजिलेंस विभाग ने एक अन्य मामले में भी सक्रियता दिखाई है। देवरिया जिले के बरहज क्षेत्र की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष रेनू जायसवाल के खिलाफ भी आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने की शिकायतों की जांच की जा रही है। इस सिलसिले में विजिलेंस की टीम उनके आवास और संबंधित कार्यालयों तक पहुंची।
जानकारी के अनुसार, रेनू जायसवाल वर्ष 2001 से 2006 तक नगर पालिका गौरा बरहज की अध्यक्ष रही थीं। उनके कार्यकाल के दौरान संपत्ति अर्जन को लेकर शिकायतें सामने आई थीं, जिनके आधार पर अब जांच की जा रही है। विजिलेंस टीम ने रजिस्ट्री कार्यालय और नगर पालिका कार्यालय में जाकर उनके नाम से जुड़ी संपत्तियों का रिकॉर्ड खंगाला और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जुटाए।
हालांकि, जब टीम उनके आवास पर पहुंची, तब वे वहां मौजूद नहीं थीं, जिससे तत्काल पूछताछ नहीं हो सकी। लेकिन अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही उनसे पूछताछ की जाएगी और मामले की सच्चाई सामने लाई जाएगी।
विजिलेंस की इस कार्रवाई से बरहज क्षेत्र में हलचल मच गई है। स्थानीय लोग इस मामले को लेकर चर्चा कर रहे हैं और यह जानने को उत्सुक हैं कि आखिर जांच में क्या सामने आता है। वहीं प्रशासन का कहना है कि यह कार्रवाई पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से की जा रही है और किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जाएगा।
दोनों ही मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में अब भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाया जा रहा है। जांच एजेंसियां न केवल नए मामलों पर कार्रवाई कर रही हैं, बल्कि पुराने मामलों को भी फिर से खोलकर उनकी जांच कर रही हैं। इससे यह संदेश जाता है कि कानून के सामने कोई भी व्यक्ति बड़ा नहीं है।
आने वाले समय में इन मामलों में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। विजिलेंस विभाग लगातार जांच में जुटा हुआ है और यह पता लगाने की कोशिश कर रहा है कि संपत्ति अर्जन के पीछे की पूरी कहानी क्या है। अगर इसमें अन्य लोग भी शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।
कुल मिलाकर, यह मामला न केवल प्रशासनिक पारदर्शिता की जरूरत को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर काम कर रही है। इससे आम जनता में विश्वास बढ़ता है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा रहे हैं और व्यवस्था को साफ-सुथरा बनाने की दिशा में प्रयास जारी हैं।
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