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आस्था का महापर्व छठ :: डूबते सूर्य व उगते सूर्य दोनों की पूजा वाला दुनिया का एकमात्र पर्व, जानिए कौन हैं छठी मैया…

डेस्क : बिहार समेत पूरा उत्तर भारत लोक आस्था के महापर्व ‘छठ’ के रंग में रंगा हुआ है, आज शाम सूर्य भगवान को पहला अर्घ्य दिया जाएगा

इसके बाद 11 नवंबर यानी की कल सुबह उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के बाद छठ पूजा का समापन होगा इस दौरान छठव्रती 36 घंटे का निर्जला व्रत रखते हैं।

बता दें कि कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर नहाय-खाय के साथ छठ महापर्व का आरंभ हो जाता है और अगले चार दिनों तक इसकी धूम रहती है। इस व्रत को संतान प्राप्ति और उनकी लंबी उम्र की कामना के लिए किया जाता है।

छठ पर्व के दूसरे दिन खरना, तीसरे दिन अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके साथ चौथे दिन के अर्घ्य के साथ व्रत का पारण किया जाता है। इस व्रत में भगवान सूर्य और छठी मैया की पूजा की जाती है और स्त्री और पुरुष दोनों ही इस व्रत कर सकते हैं।

डूबते सूरज और उगते सूरज दोनों की पूजा करने के पीछे का यह बड़ा कारण

पूरी दुनिया में छठ ही अकेली पूजा है, जिसमें डूबते यानी अस्त होते सूरज और उगते हुए सूर्य दोनों की पूजा की जाती है। दोनों ही स्थितियों में सूरज भगवान को अर्ध्य दिया जाता है। इसके पीछे बहुत बड़ा कारण है।

अस्त होता हुआ सूरज आपको विश्राम और कालचक्र के बारे में बताता है जबकि उगता सूरज नई ऊर्जा और नई सोच का प्रतीक है। अस्त होता सूरज ये बताता है कि वक्त थमता नहीं और दुनिया खत्म नहीं हुई और कल भी नए उजाले के साथ सूर्य उदय होगा इसलिए इंसान को हारना नहीं चाहिए, उसे हालात के सामने घुटने नहीं टेकने चाहिए और ना ही परिस्थितियों से घबराना चाहिए, छठ का व्रत हमें ये बताता है कि हर अंत के बाद शुरुआत होती है और अंधेरे के बाद प्रकाश आता है।

ये है अर्घ्य का मुहूर्त

छठ पूजा के लिए षष्ठी तिथि प्रारंभ 10 नवंबर

पहला अर्ध्य : सूर्य को शाम 5 बजकर 30 मिनट

दूसरा अर्घ्य ( 11 नवंबर) : सूर्य को सुबह 6 बजकर 40 मिनट

छठ पूजा सामग्री

लोग सिर पर सूप या टोकरी रखते हैं और उसमें सभी पूजा की सामग्री रखकर घाटों और तालाबों के पास जाते हैं और आधे पानी में खड़े होकर सू्र्यदेव को अर्ध्य देते हैं।

सूप में जो सामग्री रखी जाती है वो निम्निखित हैं :-

बांस की टोकरी या सूप, दूध, ठेकुआ, जल ,पत्ते लगे गन्ने, पानी वाला नारियल, चावल, सिंदूर, दीपक, धूप, अदरक का हरा पौधा,हल्दी,मूली,नींबू,शरीफा,केला,नाशपाती,शकरकंदी, सुथनी, अगरबत्ती, धूप बत्ती, कपूर, मिठाई, गुड़, चावल का आटा,गेहूंपान,सुपारी,शहद,कुमकुम,चंदन।

जानिए कौन हैं छठी मैया

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छठी मैया ब्रह्माजी की मानस पुत्री और सूर्यदेव की बहन हैं। ब्रह्माजी जब सृष्टि की रचना कर रहे थे, तब उन्होंने अपने आपको दो भागों में बांट दिया था। ब्रह्माजी का दायां भाग पुरुष और बांया भाग प्रकृति के रूप में सामने आया। प्रकृति देवी ने सृष्टि के लिए अपने आपको छह भागों में विभाजित कर दिया और छठा अंश षष्ठी देवी के नाम से जाना गया, जिसे छठी मैया के नाम से जाना जाता है।

छठी मैया बच्चों की सुरक्षा, आरोग्य और सफलता का आशीर्वाद देती हैं। जब बच्चे का जन्म होता है तब छठवें दिन इन्हीं मैया की पूजा की जाती है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में जब अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में में पल रहे बच्चे का वध कर दिया था। तब भगवान कृष्ण ने उत्तरा को षष्ठी का व्रत रखने की सलाह दी थी।

इसलिए कमर तक जल में रहते हैं व्रती

पौराणिक कथाओं के अनुसार, छठ महापर्व की शुरुआत महाभारत काल से मानी जाती है। भगवान सूर्य के आशीर्वाद से कुंती को कर्ण नाम के एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसे सूर्य पुत्र के नाम से जाना गया। भगवान सूर्य की वजह से कर्ण को कवच और कुंडल प्राप्त हुए और वह सूर्य देव के समान ही तेजस्वी, बलशाली और महान योद्धा बने।

बताया जाता है कि जल में कमर तक खड़े रहकर सूर्य देव की पूजा की परंपरा कर्ण ने शुरू की थी। कर्ण हर रोज घंटों तक कमर पानी खड़े होकर सूर्य की उपासना करते थे और उनको जल अर्पित करते थे। इसलिए आज भी छठ के तीसरे और चौथे दिन कमर तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा चल रही है।

महाभारत काल में एक और कथा छठ व्रत के नाम से मिलती है। जब कौरवों से जुए में पांडव सारा राजपाट हार गए थे तब पांडव पत्नी द्रौपदी ने छठ महाव्रत किया था। इस व्रत के प्रताप से पांडवों को उनका पूरा राजपाट वापस मिल गया था।

शाम के समय देवी प्रत्युषा के साथ रहते हैं सूर्य

मान्यता है कि सायंकाल के समय सूर्य अपने पत्नी देवी प्रत्युषा के साथ समय व्यतीत करते हैं। इसी कारण शाम के समय छठ पूजा में डूबते सूर्य को अर्घ्य देते समय देवी प्रत्युषा की उपासना की जाती है। ऐसा करने से व्रत की मनोकामना जल्द ही पूर्ण हो जाती है। यह भी माना जाता है कि सूर्य को अर्घ्य देने से कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है और जीवन की कई समस्याओं से राहत मिलती है। साथ ही रोगों से भी मुक्ति मिलती है।

सूर्य को जल देने का महत्व

सूर्य न केवल हमको बल्कि पूरे ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करता है और पृथ्वी पर जीवन का आधार भी सूर्य ही है। सूर्य को जल देने से कई फायदे होते हैं। केवल छठ ही नहीं बल्कि प्राचीन काल से ही लोग तालाबों या नदी में स्नान करते समय सूर्य देवता को अर्घ्य देते आ रहे हैं।

माना जाता है कि सूर्य को जल देने से सौभाग्य बना रहता है। सूर्य को निडर और निर्भीक ग्रह माना गया है और इसी आधार पर सूर्य को अर्घ्य देने वाले व्यक्ति को भी यह गुण प्राप्त होते हैं।

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साथ ही कुंडली में भी सूर्य की स्थिति मजबूत होती है और शनि की बुरी दृष्टि का प्रभाव भी कम होता है। सूर्यदेव को जल देने से इसका असर हमारी बुद्धि पर पड़ता है और मान-सम्मान के साथ आर्थिक वृद्धि भी होती है।

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