करीब 14 करोड़ रुपये के भूमि अधिग्रहण घोटाले में अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित विभागों से मूल दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया है। जिला एवं सत्र न्यायाधीश वाणी गोपाल शर्मा की अदालत में चल रहे इस मामले में स्टेटमेंट नंबर-19 को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं। अदालत ने इस दस्तावेज के मूल स्वरूप को पेश करने के निर्देश दिए हैं, ताकि सच्चाई सामने आ सके। अगली सुनवाई 7 अप्रैल को निर्धारित की गई है।

इस मामले की शुरुआत 22 जून 2024 को हुई थी, जब एंटी करप्शन ब्यूरो ने इस संबंध में केस दर्ज किया। जांच के दौरान पता चला कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं। इसी कड़ी में ACB ने 19 फरवरी को तत्कालीन पटवारी करतार सिंह को गिरफ्तार किया था।
जांच में सामने आया कि गांव पवाला खुसरूपुर की जमीन के अधिग्रहण के दौरान फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेकर सरकारी मुआवजा राशि का दुरुपयोग किया गया। आरोप है कि भूमि अर्जन विभाग के कुछ कर्मचारियों ने आपसी मिलीभगत से कागजात तैयार किए और सरकारी जमीन की राशि गलत तरीके से राजेश, पिंकी और आरती के खातों में ट्रांसफर कर दी।
इस अधिग्रहण में कुल 49.71 एकड़ भूमि शामिल थी, जिसमें पंचायत की भी जमीन थी। ग्राम पंचायत की 13 कनाल 15 मरला गैर-मौरूसी जमीन को भी निजी स्वामित्व दिखाकर मुआवजा दिलवाया गया। यह पूरी प्रक्रिया नियमों के खिलाफ थी और इससे सरकार को करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ।
ACB के अनुसार, इस गड़बड़ी का मुख्य आधार स्टेटमेंट नंबर-19 में की गई छेड़छाड़ है। इसी दस्तावेज के आधार पर भुगतान किया गया था। अब इस दस्तावेज की जांच के लिए हस्तलेखन विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी, जिससे यह पता लगाया जा सके कि इसमें किसने बदलाव किए।
अदालत के सख्त रुख के बाद इस मामले में और भी खुलासे होने की उम्मीद है। जांच एजेंसी अब अन्य संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच कर रही है। यह मामला सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी सवाल खड़े करता है।
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