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कच्चे तेल में नरमी के बावजूद आम आदमी को राहत क्यों नहीं? पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर बना सस्पेंस

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा बाजार का गहरा संबंध होता है, और जब भी दुनिया के किसी हिस्से में तनाव बढ़ता है, उसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ता है। हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़े तनाव के बाद जब सीजफायर की घोषणा हुई, तो उम्मीद जगी कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आएगी और इसका फायदा पेट्रोल-डीजल के दामों में कमी के रूप में दिखाई देगा। लेकिन हकीकत कुछ अलग नजर आ रही है।

सीजफायर के ऐलान के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हल्की गिरावट जरूर देखने को मिली। अमेरिकी क्रूड ऑयल लगभग 96 डॉलर प्रति बैरल और खाड़ी क्षेत्र का तेल करीब 95 डॉलर प्रति बैरल तक आ गया। हालांकि यह गिरावट राहत देने वाली है, लेकिन यह स्तर अभी भी युद्ध से पहले के मुकाबले काफी ज्यादा है। ऐसे में भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए स्थिति पूरी तरह से अनुकूल नहीं कही जा सकती।

भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें रोजाना सुबह 6 बजे अपडेट होती हैं। तेल कंपनियां इन कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम, डॉलर-रुपया विनिमय दर और केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए टैक्स के आधार पर तय करती हैं। बावजूद इसके, 12 अप्रैल को जारी ताजा आंकड़ों के मुताबिक देश के प्रमुख शहरों में ईंधन की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है।

राजधानी दिल्ली में पेट्रोल करीब 94.77 रुपये प्रति लीटर और डीजल 87.67 रुपये प्रति लीटर के आसपास बना हुआ है। वहीं मुंबई में पेट्रोल 103 रुपये से अधिक और डीजल 90 रुपये के आसपास बिक रहा है। कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों में भी कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। इसका मतलब साफ है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कीमतों में हलचल के बावजूद घरेलू स्तर पर फिलहाल कोई राहत नहीं दी गई है।

इसका एक बड़ा कारण भारत की टैक्स संरचना भी है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क और राज्य सरकारों का वैट (VAT) शामिल होता है। अलग-अलग राज्यों में टैक्स दरें अलग होने के कारण ही हर शहर में ईंधन की कीमतें अलग-अलग दिखाई देती हैं। इसके अलावा ट्रांसपोर्टेशन लागत और डीलर कमीशन भी अंतिम कीमत को प्रभावित करते हैं।

मिडिल ईस्ट में चल रहा तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच संबंधों में अस्थिरता बनी हुई है। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर खतरा बना हुआ है, जहां से दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल आपूर्ति गुजरती है। अगर इस मार्ग में किसी प्रकार की बाधा आती है, तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं।

हालांकि, भारत सरकार और तेल कंपनियां इस स्थिति को संभालने की कोशिश कर रही हैं। संकेत दिए गए हैं कि फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों को स्थिर रखा जाएगा, ताकि आम जनता पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ न पड़े। इसके लिए ऑयल मार्केटिंग कंपनियां अपने मुनाफे में कटौती कर सकती हैं।

इसी बीच सरकार ने डीजल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) पर विंडफॉल टैक्स बढ़ा दिया है। इसका मकसद यह है कि तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों का अनुचित लाभ न उठा सकें और घरेलू बाजार में ईंधन की उपलब्धता बनी रहे। साथ ही इससे सरकार को अतिरिक्त राजस्व भी प्राप्त होता है।

प्रीमियम ईंधन की बात करें, तो 100-ऑक्टेन पेट्रोल की कीमत में हाल ही में बढ़ोतरी की गई है। यह ईंधन मुख्य रूप से हाई-एंड कारों और सुपरबाइक्स में इस्तेमाल होता है। इसकी कीमत बढ़ाकर करीब 160 रुपये प्रति लीटर कर दी गई है। इससे साफ है कि जहां एक ओर आम ईंधन की कीमतों को स्थिर रखने की कोशिश हो रही है, वहीं प्रीमियम सेगमेंट में कंपनियां अपने मार्जिन को बनाए रखने में लगी हैं।

निजी कंपनियां भी धीरे-धीरे अपने दाम बढ़ा रही हैं। कुछ शहरों में प्राइवेट रिटेलर्स ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि की है, जिससे यह संकेत मिलता है कि बाजार में दबाव बना हुआ है। अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो यह दबाव और बढ़ सकता है।

अब सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में पेट्रोल और डीजल सस्ते होंगे या महंगे? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार गिरावट आती है और रुपया मजबूत होता है, तो कीमतों में कमी संभव है। लेकिन अगर वैश्विक तनाव फिर बढ़ता है या तेल की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कीमतों में बढ़ोतरी भी हो सकती है।

ईंधन की कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों में कच्चे तेल की कीमत, डॉलर-रुपया विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत और मांग-आपूर्ति का संतुलन शामिल है। इन सभी कारकों में बदलाव का सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

आम लोगों के लिए फिलहाल राहत की बात यही है कि कीमतें स्थिर हैं और अचानक कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। लेकिन यह स्थिरता कितने समय तक बनी रहेगी, यह कहना मुश्किल है। वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए भविष्य में कीमतों में बदलाव की संभावना बनी हुई है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि सीजफायर के बावजूद पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल राहत नहीं मिली है। बाजार अभी भी अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। आने वाले समय में ही यह साफ होगा कि अंतरराष्ट्रीय हालात किस दिशा में जाते हैं और उसका असर भारतीय बाजार पर किस तरह पड़ता है।

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