जनवरी 2026 में महंगाई से जूझ रही दुनिया को कुछ राहत के संकेत मिले हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक खाद्य कीमतों में लगातार पांचवें महीने गिरावट दर्ज की गई है। दूध, चीनी और मांस जैसी जरूरी खाद्य वस्तुओं के सस्ते होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में नरमी आई है, हालांकि चावल और वनस्पति तेल की बढ़ती कीमतें अब भी चुनौती बनी हुई हैं।

FAO के अनुसार, फूड प्राइस इंडेक्स जनवरी 2026 में औसतन 123.9 अंक पर रहा। यह दिसंबर 2025 के मुकाबले 0.4 फीसदी कम और पिछले साल की समान अवधि से 0.6 फीसदी नीचे है। रिपोर्ट बताती है कि कुल मिलाकर वैश्विक खाद्य बाजार में राहत के संकेत दिख रहे हैं, लेकिन कुछ अहम वस्तुओं की महंगाई आने वाले महीनों में दबाव बढ़ा सकती है।
डेयरी, चीनी और मांस में राहत
जनवरी में सबसे ज्यादा राहत डेयरी उत्पादों में देखने को मिली। दूध और उससे जुड़े उत्पादों की कीमतों में करीब पांच फीसदी तक गिरावट दर्ज की गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में आपूर्ति बेहतर रहने और मांग में स्थिरता के चलते यह नरमी आई है।
इसके अलावा चीनी और मांस की कीमतों में भी कमी दर्ज की गई, जिससे कई देशों को खाद्य महंगाई के मोर्चे पर थोड़ी राहत मिली है।
अनाज: कुल मिलाकर स्थिर, लेकिन चावल महंगा
FAO की रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी में अनाज मूल्य सूचकांक दिसंबर 2025 की तुलना में मामूली 0.2 फीसदी बढ़कर 107.5 अंक पर पहुंच गया।
इस दौरान गेहूं और मक्का की वैश्विक कीमतों में हल्की गिरावट देखने को मिली। संगठन का कहना है कि दुनिया में गेहूं का पर्याप्त भंडार होने के कारण रूस और अमेरिका में मौसम से जुड़ी चिंताओं का असर सीमित रहा। अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में अच्छी फसल की उम्मीद और ऊंचे वैश्विक भंडार ने भी कीमतों को काबू में रखा।
हालांकि, चावल की कीमतों में 1.8 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। खासकर खुशबूदार किस्मों की मजबूत मांग के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल महंगा हुआ है। यही वजह है कि चावल अभी भी कई देशों के लिए महंगाई की बड़ी चुनौती बना हुआ है।
चीनी में गिरावट के पीछे क्या कारण
जनवरी 2026 में चीनी मूल्य सूचकांक में करीब 1 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। दिसंबर 2025 में यह 90.7 अंक पर था, जो जनवरी में घटकर 89.8 अंक रह गया।
FAO के मुताबिक, इसके पीछे भारत और थाईलैंड में उत्पादन बढ़ने के संकेत, साथ ही ब्राजील में बेहतर उत्पादन अनुमानों से वैश्विक आपूर्ति मजबूत होने की उम्मीद प्रमुख कारण है। इससे आने वाले महीनों में चीनी बाजार में नरमी बने रहने की संभावना जताई गई है।
भारत के लिए क्या मायने रखती है यह रिपोर्ट
वैश्विक स्तर पर दूध, चीनी और मांस की कीमतों में आई गिरावट भारत के लिए दोहरी राहत साबित हो सकती है।
आयातित खाद्य वस्तुओं की लागत कम होने की संभावना है।
भारत में चीनी उत्पादन में वृद्धि से घरेलू आपूर्ति मजबूत रहने और निर्यात के नए अवसर खुलने के संकेत हैं, जिससे किसानों और चीनी मिलों को फायदा हो सकता है।
हालांकि, चावल और वनस्पति तेल की बढ़ती कीमतें भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई हैं, क्योंकि इनका सीधा असर आम लोगों के घरेलू बजट पर पड़ता है।
निष्कर्ष
FAO की जनवरी 2026 की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक खाद्य बाजार में फिलहाल राहत का दौर जारी है और महंगाई का दबाव कुछ हद तक कम हुआ है। लेकिन चावल और वनस्पति तेल जैसी जरूरी वस्तुओं की कीमतों में तेजी आने वाले महीनों में सरकारों और उपभोक्ताओं के लिए नई चुनौती बन सकती है। कुल मिलाकर, राहत और चिंता—दोनों के बीच संतुलन बना हुआ है।
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