हरियाणा के रेल मार्गों पर स्वच्छ और आधुनिक परिवहन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। देश की पहली हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली ट्रेन का लगातार तीसरे दिन भी सफल ट्रायल किया गया। इस दौरान ट्रेन को 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से दौड़ाया गया, जिससे तकनीकी टीम को इसके प्रदर्शन और सुरक्षा मानकों को परखने का अवसर मिला। अधिकारियों का मानना है कि यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो शनिवार को इस ट्रेन का अंतिम ट्रायल भी पूरा किया जा सकता है।

यह परियोजना भारतीय रेल के लिए तकनीकी बदलाव के साथ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी अहम मानी जा रही है।
जींद से सोनीपत तक हुआ परीक्षण
शुक्रवार दोपहर लगभग दो बजे ट्रेन को Sonipat की ओर रवाना किया गया। परीक्षण के दौरान ट्रेन को पांडु-पिंडारा स्टेशन से भंभेवा स्टेशन तक चलाया गया। इसके बाद उसी रूट पर ट्रेन को वापस घुमाया गया ताकि अलग-अलग परिस्थितियों में उसकी कार्यक्षमता का मूल्यांकन किया जा सके।
शाम करीब पांच बजे ट्रेन सोनीपत पहुंची और कुछ देर बाद वापसी के लिए रवाना कर दी गई। वापसी में ट्रेन लगभग 5:35 बजे जींद के लिए चली।
इस पूरे ट्रायल के दौरान ट्रेन के हर चरण पर तकनीकी टीम की निगरानी बनी रही।
80 किमी प्रति घंटे की स्पीड पर दौड़ी ट्रेन
इस ट्रायल की खास बात यह रही कि ट्रेन को बिना अतिरिक्त वजन के चलाया गया। पहले किए गए परीक्षण में डिब्बों में पानी के कैन रखकर लोड टेस्ट किया गया था, जबकि इस बार ट्रेन को सामान्य परिस्थिति में तेज गति पर चलाया गया।
तकनीकी विशेषज्ञों ने बताया कि 80 किलोमीटर प्रति घंटे की गति पर ट्रेन ने स्थिरता और संतुलन दोनों बनाए रखा। इससे संकेत मिलता है कि हाइड्रोजन आधारित इंजन भविष्य में नियमित परिचालन के लिए उपयुक्त साबित हो सकता है।
मल्टीलेवल तकनीकी टीम की निगरानी
इस परियोजना की जांच में Research Designs and Standards Organisation (आरडीएसओ) की विशेषज्ञ टीम शामिल है। यह टीम इंजन की कार्यक्षमता, ईंधन खपत, सिग्नलिंग सिस्टम, ब्रेकिंग सिस्टम और आपातकालीन प्रतिक्रिया की बारीकी से जांच कर रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हाइड्रोजन ट्रेन का परीक्षण केवल गति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि यह ट्रेन अलग-अलग परिस्थितियों में कितनी सुरक्षित और विश्वसनीय है।
पहले दिन डीजल, अब पूरी तरह हाइड्रोजन
ट्रायल के शुरुआती चरण में ट्रेन को डीजल इंजन के साथ चलाया गया था ताकि ट्रैक और कोच की स्थिति का परीक्षण किया जा सके। लेकिन अब ट्रेन पूरी तरह हाइड्रोजन ईंधन से चल रही है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हाइड्रोजन ट्रेन पारंपरिक डीजल इंजनों की तुलना में अधिक पर्यावरण अनुकूल मानी जाती है। इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है और भविष्य में रेलवे के ग्रीन ट्रांजिशन को गति मिल सकती है।
सेंसर से लैस कोच, कंट्रोल रूम से निगरानी
पिछले परीक्षण के दौरान एक डिब्बे में पानी के 35 कैन रखे गए थे, जिनकी क्षमता 10 से 15 लीटर तक थी। इन कैनों के माध्यम से ट्रेन की संतुलन क्षमता और वजन सहने की क्षमता की जांच की गई।
हर डिब्बे में सेंसर लगाए गए थे, जिनसे डेटा कंट्रोल रूम तक पहुंच रहा था। इससे विशेषज्ञों को ट्रेन की रफ्तार, कंपन, ब्रेकिंग और ईंधन खपत की वास्तविक समय में जानकारी मिलती रही।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
शुक्रवार शाम जब ट्रेन प्लेटफॉर्म पर पहुंची, तो कुछ युवाओं ने उत्सुकता में ट्रेन के पास जाने और उसमें चढ़ने की कोशिश की। हालांकि, सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत उन्हें रोक दिया और किसी को ट्रेन के पास भी नहीं आने दिया।
अधिकारियों का कहना है कि ट्रायल के दौरान सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है। जब तक ट्रेन का औपचारिक संचालन शुरू नहीं होता, तब तक आम लोगों को उससे दूरी बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।
स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि हाइड्रोजन ट्रेन भविष्य में रेलवे के लिए बड़ा परिवर्तन ला सकती है। इससे न केवल प्रदूषण कम होगा बल्कि डीजल पर निर्भरता भी घटेगी।
यदि यह परियोजना सफल रहती है, तो भविष्य में अन्य रेल मार्गों पर भी हाइड्रोजन ट्रेनें चलाई जा सकती हैं।
भारतीय रेल के लिए तकनीकी क्रांति
Indian Railways लगातार नई तकनीकों को अपनाने की दिशा में काम कर रही है। वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों के बाद अब हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना को भी रेलवे के आधुनिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
रेलवे अधिकारियों का मानना है कि यह तकनीक आने वाले समय में दूरदराज के क्षेत्रों में भी स्वच्छ परिवहन उपलब्ध कराने में मदद करेगी।
अंतिम ट्रायल पर सबकी नजर
अब सबकी नजर संभावित अंतिम ट्रायल पर टिकी है। यदि यह परीक्षण सफल रहता है, तो जल्द ही इस ट्रेन के नियमित परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है।
स्थानीय लोगों और रेल प्रेमियों में भी इस ट्रेन को लेकर काफी उत्साह देखा जा रहा है। यह केवल एक नई ट्रेन नहीं, बल्कि देश में हरित परिवहन की दिशा में नई शुरुआत मानी जा रही है।
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