दुनियाभर में बदलती जीवनशैली और खान-पान की आदतों ने एक नई स्वास्थ्य चुनौती को जन्म दिया है, जो धीरे-धीरे लेकिन बेहद खतरनाक तरीके से लोगों को अपनी चपेट में ले रही है। यह समस्या है लिवर से जुड़ी एक गंभीर बीमारी, जिसे आज के समय में मेटाबॉलिक डिसफंक्शन-एसोसिएटेड स्टीयोटिक लिवर डिजीज (एमएएसएलडी) के नाम से जाना जाता है। पहले इसे नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिजीज कहा जाता था। यह बीमारी बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर में पनपती रहती है और जब तक इसका पता चलता है, तब तक यह गंभीर रूप ले सकती है।

हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एंड हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस बीमारी को लेकर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के अनुसार, अगर मौजूदा स्थिति जारी रहती है, तो साल 2050 तक दुनिया में लगभग 180 करोड़ लोग इस बीमारी से प्रभावित हो सकते हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बेहद चौंकाने वाला है और यह दर्शाता है कि आने वाले समय में यह एक बड़ी वैश्विक स्वास्थ्य समस्या बन सकती है।
अध्ययन में बताया गया है कि साल 2023 में दुनियाभर में करीब 130 करोड़ लोग इस बीमारी से पीड़ित थे। यदि हम पिछले तीन दशकों के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी चिंताजनक नजर आती है। साल 1990 में इस बीमारी से पीड़ित लोगों की संख्या लगभग 50 करोड़ थी, जो 2023 तक बढ़कर 130 करोड़ हो गई। यानी 33 वर्षों में इसमें लगभग 143 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
एमएएसएलडी एक ऐसी स्थिति है जिसमें लिवर में जरूरत से ज्यादा चर्बी जमा हो जाती है। यह चर्बी शराब के सेवन के कारण नहीं बल्कि शरीर के मेटाबॉलिज्म यानी चयापचय की गड़बड़ी के कारण जमा होती है। यह बीमारी खासतौर पर उन लोगों में अधिक देखी जाती है जो मोटापे से ग्रस्त हैं, जिन्हें डायबिटीज है या जिनकी जीवनशैली असंतुलित है।
आज के दौर में फास्ट फूड, जंक फूड, मीठे पेय पदार्थों का अत्यधिक सेवन और शारीरिक गतिविधियों की कमी ने इस बीमारी को तेजी से बढ़ावा दिया है। लोग लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं, व्यायाम के लिए समय नहीं निकालते और अनियमित दिनचर्या अपनाते हैं। ये सभी कारक मिलकर लिवर में फैट जमा होने की प्रक्रिया को तेज करते हैं।
इस बीमारी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती चरण में कोई खास लक्षण दिखाई नहीं देते। व्यक्ति को सामान्य थकान, कमजोरी या हल्की असहजता महसूस हो सकती है, लेकिन वह इसे नजरअंदाज कर देता है। धीरे-धीरे यह स्थिति गंभीर होकर लिवर सिरोसिस या यहां तक कि लिवर कैंसर का रूप ले सकती है।
अध्ययन में यह भी पाया गया है कि कुछ क्षेत्रों में इस बीमारी का असर अधिक है। खासकर उत्तरी अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों में एमएएसएलडी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इन क्षेत्रों में मोटापा और डायबिटीज के बढ़ते मामलों के कारण लिवर की बीमारियों का खतरा भी अधिक हो गया है। आने वाले वर्षों में इन देशों की स्वास्थ्य सेवाओं पर इसका भारी दबाव पड़ सकता है।
लिंग के आधार पर भी इस बीमारी में अंतर देखा गया है। पुरुषों में यह बीमारी महिलाओं की तुलना में अधिक पाई जा रही है। हालांकि, महिलाओं में भी इसका खतरा कम नहीं है, खासकर मध्यम आयु वर्ग में। उम्र के अनुसार देखें तो 80 से 84 वर्ष के लोगों में इसका जोखिम सबसे अधिक होता है, लेकिन अब यह बीमारी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही।
चिंताजनक बात यह है कि अब यह बीमारी युवा और कामकाजी वर्ग को भी तेजी से प्रभावित कर रही है। पुरुषों में 35 से 39 वर्ष और महिलाओं में 55 से 59 वर्ष की उम्र के बीच इसके मामलों में तेजी देखी जा रही है। इसका मतलब है कि यह समस्या अब समाज के उस वर्ग को प्रभावित कर रही है जो आर्थिक और सामाजिक रूप से सबसे सक्रिय होता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी से बचाव ही सबसे प्रभावी उपाय है, क्योंकि एक बार लिवर गंभीर रूप से प्रभावित हो जाए तो उसे पूरी तरह ठीक करना मुश्किल हो सकता है। इसके लिए सबसे जरूरी है स्वस्थ जीवनशैली अपनाना।
नियमित व्यायाम करना, संतुलित और पौष्टिक आहार लेना, फास्ट फूड और मीठे पेय पदार्थों से दूरी बनाना, और वजन को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी है। इसके अलावा, समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराना भी आवश्यक है ताकि किसी भी समस्या का समय रहते पता चल सके।
डॉक्टरों का कहना है कि दिन में कम से कम 30 मिनट की शारीरिक गतिविधि जैसे तेज चलना, दौड़ना या योग करना लिवर को स्वस्थ रखने में मदद कर सकता है। इसके साथ ही हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज और प्रोटीन युक्त आहार को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए।
कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि लिवर से जुड़ी यह बीमारी आने वाले समय में एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन सकती है। यदि अभी से सावधानी नहीं बरती गई, तो इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि लोग अपनी जीवनशैली में सुधार करें और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनें, ताकि इस खामोश लेकिन खतरनाक बीमारी से खुद को बचा सकें।
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