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सत्र शुरू, पर किताबें गायब—यूपी के प्राइमरी स्कूलों में 15 दिन बाद भी अधूरी तैयारी, 25 जिलों में धीमी रफ्तार

उत्तर प्रदेश में नया शैक्षणिक सत्र 2026-27 पहली अप्रैल से शुरू हो चुका है। सरकार की ओर से “स्कूल चलो अभियान” भी पूरे जोश के साथ चलाया जा रहा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चों को विद्यालयों से जोड़ा जा सके। लेकिन जमीनी हकीकत इस उत्साह से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। सत्र शुरू हुए पंद्रह दिन बीत चुके हैं, फिर भी प्रदेश के कई जिलों में बच्चों को अब तक नई किताबें नहीं मिल पाई हैं। इससे न केवल पढ़ाई प्रभावित हो रही है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की तैयारियों पर भी सवाल उठने लगे हैं।

 

शिक्षा विभाग का लक्ष्य था कि नए सत्र के पहले दिन से ही सभी बच्चों को उनकी कक्षाओं की पूरी किताबें उपलब्ध करा दी जाएं। इसके लिए पहले से योजनाएं बनाई गई थीं और वितरण की प्रक्रिया भी समय से शुरू करने के निर्देश दिए गए थे। बावजूद इसके, कई जिलों में किताबों का वितरण बेहद धीमी गति से हो रहा है। विभागीय समीक्षा में यह बात सामने आई है कि करीब 25 जिलों में किताबें पहुंचाने और बांटने की प्रक्रिया काफी सुस्त है।

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ जिलों ने तो वितरण को लेकर कोई रिपोर्ट ही नहीं दी है। इटावा और हाथरस जैसे जिलों से अब तक कोई आधिकारिक जानकारी विभाग को नहीं मिली है, जिससे प्रशासनिक लापरवाही की आशंका और गहरी हो जाती है। वहीं, जिन जिलों ने रिपोर्ट दी है, वहां के आंकड़े भी संतोषजनक नहीं हैं।

बहराइच की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक बताई जा रही है। यहां कुल 2834 प्राथमिक विद्यालयों में से 2002 स्कूलों में अभी तक किताबें नहीं पहुंची हैं। यानी बड़ी संख्या में बच्चे बिना किताबों के ही पढ़ाई करने को मजबूर हैं। खास बात यह है कि इसी जिले में कुछ समय पहले किताबों को कबाड़ में बेचने का मामला भी सामने आया था, जिससे व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठे थे।

आजमगढ़ में भी हालात कुछ बेहतर नहीं हैं। यहां 2955 विद्यालयों में से 1921 स्कूलों में किताबें नहीं पहुंच सकी हैं। संभल में 1289 में से 803 विद्यालयों में, बांदा में 1797 में से 630 विद्यालयों में और चित्रकूट में 1262 में से 377 विद्यालयों में अभी तक पुस्तकें वितरित नहीं हो पाई हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि वितरण व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर खामियां हैं।

अन्य जिलों की बात करें तो अयोध्या के 335, गोरखपुर के 247, सीतापुर के 52, अमेठी के 50 और राजधानी लखनऊ के 33 विद्यालयों में भी अभी तक सभी किताबें उपलब्ध नहीं कराई जा सकी हैं। यह स्थिति उस समय और चिंताजनक हो जाती है जब सरकार शिक्षा को प्राथमिकता देने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की बात कर रही है।

किताबों की कमी का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। छोटे बच्चों के लिए शुरुआती दिनों में किताबें बेहद महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि यही समय उनकी बुनियादी शिक्षा की नींव मजबूत करने का होता है। जब बच्चे बिना किताबों के स्कूल जाते हैं, तो उनका सीखने का उत्साह भी कम हो जाता है और शिक्षकों के लिए भी पढ़ाना मुश्किल हो जाता है।

शिक्षकों का कहना है कि बिना किताबों के पढ़ाई कराना काफी चुनौतीपूर्ण होता है। उन्हें खुद से सामग्री तैयार करनी पड़ती है या पुराने तरीकों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे पढ़ाई की गुणवत्ता प्रभावित होती है। वहीं, अभिभावक भी इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं और चाहते हैं कि जल्द से जल्द बच्चों को किताबें उपलब्ध कराई जाएं।

इस मामले को गंभीरता से लेते हुए शिक्षा विभाग ने संबंधित अधिकारियों को फटकार लगाई है और तुरंत सुधार के निर्देश दिए हैं। विभाग का कहना है कि किताबों का वितरण प्राथमिकता के आधार पर पूरा किया जाए, ताकि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। साथ ही, जिन जिलों ने रिपोर्ट नहीं दी है, उनसे भी जल्द से जल्द जानकारी देने को कहा गया है।

दूसरी ओर, “स्कूल चलो अभियान” के तहत नामांकन बढ़ाने की दिशा में कुछ सकारात्मक संकेत भी मिले हैं। कक्षा एक में पिछले साल की तुलना में दो लाख से ज्यादा नए बच्चों का नामांकन हुआ है। कक्षा पांच से छह में 6.66 लाख और कक्षा आठ से नौ में करीब 18,912 नए नामांकन दर्ज किए गए हैं। यह दर्शाता है कि लोगों में शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ रही है।

हालांकि, नामांकन के आंकड़ों में भी जिलों के बीच काफी अंतर देखने को मिल रहा है। कक्षा एक में अलीगढ़ 41.77 प्रतिशत नामांकन के साथ पहले स्थान पर है, जबकि श्रावस्ती की स्थिति सबसे कमजोर बताई जा रही है। कक्षा पांच से छह में कौशांबी 47.74 प्रतिशत के साथ आगे है, जबकि हरदोई 20.53 प्रतिशत के साथ पीछे है। कक्षा आठ से नौ में अमेठी सबसे आगे है, जबकि औरैया और कानपुर नगर की स्थिति संतोषजनक नहीं है।

शिक्षा विभाग ने इन आंकड़ों को देखते हुए सभी जिलों को निर्देश दिए हैं कि नामांकन प्रक्रिया में तेजी लाई जाए और पिछड़े जिलों पर विशेष ध्यान दिया जाए। साथ ही, किताबों के वितरण में हो रही देरी को तुरंत दूर करने के लिए भी सख्त कदम उठाने को कहा गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल योजनाएं बनाने से नहीं, बल्कि उनके सही क्रियान्वयन से संभव है। यदि समय पर किताबें, शिक्षक और अन्य संसाधन उपलब्ध नहीं होंगे, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होना तय है। ऐसे में जरूरी है कि प्रशासनिक स्तर पर जिम्मेदारी तय की जाए और लापरवाही बरतने वालों के खिलाफ कार्रवाई हो।

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में प्रयास तो किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी कई चुनौतियां मौजूद हैं। किताबों का समय पर वितरण न होना एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है, जिसे जल्द से जल्द सुलझाने की जरूरत है। तभी “स्कूल चलो अभियान” का उद्देश्य पूरी तरह सफल हो सकेगा और बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल पाएगी।

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