पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक व्यक्ति, जिसे हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा मिली थी, वह करीब 32 साल तक जेल में बंद रहा, लेकिन इस दौरान उसकी ओर से सजा के खिलाफ कोई अपील दाखिल नहीं की गई। अब जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने इसे न्यायिक प्रणाली की बड़ी चूक बताते हुए कड़ी नाराजगी जताई।

यह मामला करनाल के रहने वाले रमेश से जुड़ा है। उसे 19 नवंबर 1993 को सत्र न्यायालय ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। आरोप था कि उसने अपने पिता फूल सिंह के साथ मिलकर पुरानी रंजिश के चलते प्रीतम सिंह नामक व्यक्ति पर चाकू से हमला किया था, जिससे उसकी मौत हो गई थी।
सजा के बाद रमेश को जेल भेज दिया गया, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह बेहद हैरान करने वाला है। आमतौर पर ऐसे मामलों में दोषी उच्च अदालत में अपील करता है, लेकिन रमेश के मामले में 32 वर्षों तक कोई अपील ही दाखिल नहीं हुई। यह देरी करीब 11,740 दिनों की बताई जा रही है।
मार्च 2026 में यह मामला अचानक तब सामने आया जब करनाल जिला जेल के डिप्टी सुपरिंटेंडेंट ने रमेश की अपील से जुड़ी अर्जी हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को भेजी। इसके बाद इस केस को अधिवक्ता संजीव शर्मा को सौंपा गया।
जब वकील ने केस के दस्तावेजों की जांच की, तो पता चला कि अपील दाखिल करने में करीब 32 साल की देरी हो चुकी है। इसके बाद अदालत में देरी माफ करने की याचिका दायर की गई।
मामला जब हाईकोर्ट की खंडपीठ के सामने पहुंचा, तो जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा और जस्टिस रोहित कपूर ने इस पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी दोषी को अपील का अधिकार होता है और यदि वह खुद अपील नहीं कर पाता, तो यह जिम्मेदारी सिस्टम की होती है कि उसे कानूनी सहायता दी जाए।
कोर्ट ने कहा कि इतने लंबे समय तक अपील दाखिल न होना यह दर्शाता है कि जेल प्रशासन और कानूनी सहायता तंत्र अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं। यह केवल एक व्यक्ति की चूक नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की खामी है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इतनी लंबी देरी के बावजूद अब इस मामले में और देरी नहीं की जा सकती। न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के बराबर है। इसलिए कोर्ट ने 32 वर्षों की देरी को माफ करते हुए अपील को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया।
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से इस मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड तलब किए हैं, ताकि मामले की गहराई से सुनवाई की जा सके। अगली सुनवाई 2 मई को तय की गई है।
हाईकोर्ट ने करनाल जिला विधिक सेवा प्राधिकरण के सचिव को भी निर्देश दिए हैं कि वे यह स्पष्ट करें कि इतने वर्षों तक अपील क्यों दाखिल नहीं की गई और इस दौरान संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की।
यह मामला न केवल एक व्यक्ति के जीवन से जुड़ा है, बल्कि यह न्याय प्रणाली की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने यह साफ कर दिया है कि हर कैदी को समय पर न्याय मिलना उसका अधिकार है और इसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
फिलहाल, यह मामला पूरे न्यायिक तंत्र के लिए एक चेतावनी बनकर सामने आया है कि ऐसी लापरवाही दोबारा न हो और हर व्यक्ति को उसका कानूनी अधिकार समय पर मिल सके।
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