विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर प्रदेश के कई जिलों से गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं। अलग-अलग जगहों पर मतदाता सूची में गड़बड़ियों के आरोप लग रहे हैं, जिससे आम लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। गाजियाबाद और गोरखपुर से आई शिकायतों ने प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गाजियाबाद की साहिबाबाद विधानसभा सीट के पोलिंग बूथ संख्या 126 का मामला सबसे ज्यादा चर्चा में है। यहां वर्ष 1986 से स्थायी रूप से रह रहे कई मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए। हैरानी की बात यह है कि इन सभी लोगों ने एसआईआर के तहत गणना प्रपत्र भी भरा था, इसके बावजूद उन्हें “अनुपस्थित” और “स्थानांतरित” दर्शाकर सूची से बाहर कर दिया गया।
सूची से नाम कटने वालों में राम दुलार यादव, फूलमती यादव, धीरेंद्र यादव, अंजू यादव, सरोज और सुनीता यादव शामिल हैं। ये सभी एक ही मकान में दशकों से निवास कर रहे हैं और नियमित रूप से मतदान करते आए हैं। नाम हटने की जानकारी मिलने के बाद परिवार और स्थानीय लोगों में नाराजगी है। उनका कहना है कि जब वे वर्षों से उसी पते पर रह रहे हैं और सभी औपचारिकताएं पूरी कर चुके हैं, तो फिर नाम हटाने का आधार क्या है।
इस मामले को लेकर समाजवादी पार्टी ने चुनाव प्रशासन से औपचारिक शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है, न कि वास्तविक और स्थायी मतदाताओं को सूची से बाहर करना। सपा ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए और प्रभावित मतदाताओं के नाम तत्काल बहाल किए जाएं।
उधर, गोरखपुर से भी एसआईआर से जुड़ी चौंकाने वाली शिकायत सामने आई है। यहां वार्ड नंबर 16 में एक ही मकान पते पर 233 मतदाताओं के नाम दर्ज पाए गए हैं। इस असामान्य स्थिति ने मतदाता सूची की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की गड़बड़ियां या तो लापरवाही का नतीजा हैं या फिर जानबूझकर की गई गंभीर त्रुटियां।
इसके अलावा, कन्नौज सदर विधानसभा सीट को लेकर भी आपत्ति जताई गई है। सपा की ओर से आरोप लगाया गया है कि वहां कुछ पोलिंग बूथ नियमों के विपरीत मंदिर परिसर में बनाए गए हैं, जो चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। पार्टी ने इस पर भी तत्काल सुधार की मांग की है।
एसआईआर को लेकर सामने आ रही इन शिकायतों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में पारदर्शिता और सतर्कता की बेहद जरूरत है। अगर समय रहते इन समस्याओं का समाधान नहीं किया गया, तो इससे न सिर्फ मतदाताओं का भरोसा टूटेगा, बल्कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल उठ सकते हैं।
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