पंजाब विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण बनने की आहट सुनाई देने लगी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए बड़े और चर्चित चेहरों को साथ लाने की रणनीति पर काम कर रही है। इसी क्रम में नवजोत सिंह सिद्धू और उनकी पत्नी नवजोत कौर की संभावित ‘घर वापसी’ को लेकर पार्टी के भीतर गंभीर मंथन चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, दोनों को भाजपा में वापस लाने के लिए एक प्रारंभिक रोडमैप तैयार किया जा चुका है और इस पर जल्द अंतिम निर्णय लिया जा सकता है।

बताया जा रहा है कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इस मसले पर राज्य के वरिष्ठ नेताओं से संवाद स्थापित करने की तैयारी में है। खासतौर पर पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और वरिष्ठ नेता मनोरंजन कालिया जैसे नेताओं से रायशुमारी की जाएगी, क्योंकि ये नेता सिद्धू की वापसी को लेकर सहज नहीं माने जाते। पार्टी नेतृत्व की कोशिश है कि कोई भी निर्णय लेने से पहले संगठनात्मक सहमति का वातावरण बनाया जाए।
नवजोत सिंह सिद्धू का राजनीतिक सफर कई उतार-चढ़ावों से भरा रहा है। वे लंबे समय तक भाजपा से जुड़े रहे, लेकिन बाद में कांग्रेस का दामन थाम लिया और पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भी बने। कांग्रेस के भीतर उनकी कई नेताओं से तनातनी रही, जिसमें कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ उनका विवाद सबसे चर्चित रहा। राजनीतिक मतभेदों और अंदरूनी संघर्षों के चलते उनका कांग्रेस में सफर भी विवादों से घिरा रहा।
हालिया घटनाक्रम में नवजोत कौर के कांग्रेस से निष्कासन के बाद स्थिति और बदल गई है। हालांकि सिद्धू अभी औपचारिक रूप से कांग्रेस में हैं, लेकिन वे लगातार पार्टी नेतृत्व और प्रदेश अध्यक्ष की आलोचना करते रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की सार्वजनिक रूप से सराहना की है। राजनीतिक विश्लेषक इसे संभावित सियासी बदलाव का संकेत मान रहे हैं।
भाजपा के अंदर इस संभावित वापसी को लेकर दो राय सामने आ रही हैं। एक वर्ग का मानना है कि सिद्धू जैसे बड़े और चर्चित नेता को साथ लाने से पार्टी को चुनाव में फायदा मिल सकता है। उनका तर्क है कि सिद्धू की जनसभाओं में पकड़ और उनकी आक्रामक शैली कुछ वर्गों में प्रभाव छोड़ सकती है। वहीं दूसरा वर्ग इस कदम को जोखिम भरा मान रहा है। उनका कहना है कि अतीत में सिद्धू के बयानों और रुख ने कई बार विवाद खड़े किए हैं, जिससे पार्टी की रणनीति प्रभावित हो सकती है।
कैप्टन अमरिंदर सिंह और सिद्धू के बीच पुरानी राजनीतिक खटास किसी से छिपी नहीं है। कांग्रेस शासनकाल में दोनों के बीच खुला टकराव देखा गया था। ऐसे में यदि सिद्धू की भाजपा में वापसी होती है, तो राज्य इकाई के भीतर संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। मनोरंजन कालिया समेत कुछ अन्य वरिष्ठ नेता भी इस संभावित कदम को लेकर उत्साहित नहीं बताए जा रहे हैं।
हालांकि पार्टी सूत्रों का कहना है कि अंतिम फैसला केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर होगा और चुनावी लाभ-हानि को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया जाएगा। उनका यह भी कहना है कि लोकसभा चुनाव से पहले रवनीत सिंह बिट्टू जैसे नेताओं को पार्टी में शामिल करने से अपेक्षित राजनीतिक फायदा नहीं हुआ था, इसलिए इस बार रणनीति अधिक सावधानी से बनाई जा रही है।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पंजाब में व्यक्तित्व आधारित राजनीति का प्रभाव अब भी मजबूत है। सिद्धू अपनी वाक्पटुता और तीखे तेवरों के लिए जाने जाते हैं। यदि वे भाजपा में वापसी करते हैं, तो यह चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। हालांकि इसके साथ यह भी जरूरी होगा कि पार्टी के भीतर असंतोष को समय रहते संभाला जाए।
सूत्रों के अनुसार, इसी महीने के अंत तक इस पूरे मामले पर स्पष्टता आ सकती है। यदि सहमति बनती है तो औपचारिक घोषणा बड़े स्तर पर की जा सकती है। फिलहाल भाजपा नेतृत्व आंतरिक चर्चाओं और रणनीतिक मूल्यांकन में जुटा है।
पंजाब की राजनीति में यह घटनाक्रम चुनावी माहौल को और रोचक बना रहा है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि भाजपा सिद्धू दंपती को लेकर क्या फैसला लेती है और यह निर्णय आगामी चुनावी समीकरणों को किस दिशा में मोड़ता है।
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