चंडीगढ़ में रबी सीजन के दौरान पराली (फाने) जलाने की समस्या एक बार फिर गंभीर रूप लेती दिखाई दे रही है। खेतों में बचे फसल अवशेषों को जलाने की पुरानी प्रथा पर रोक लगाने के लिए प्रशासन ने इस बार कड़ा रुख अपनाया है। पहली बार इस सीजन में सीधे कानूनी कार्रवाई करते हुए पांच किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है और चार किसानों पर आर्थिक जुर्माना लगाया गया है। इसके बावजूद पराली जलाने के मामलों में कमी नहीं आई है, बल्कि घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।

कृषि विभाग और निगरानी एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, यह कार्रवाई हरसेक (HARSAC) से प्राप्त सैटेलाइट डेटा के आधार पर की गई है। तकनीकी निगरानी के जरिए उन किसानों की पहचान की गई, जिन्होंने अपने खेतों में पराली जलाई थी। इसी आधार पर फरीदाबाद, पलवल और सिरसा जिलों में कार्रवाई की गई है। फरीदाबाद और पलवल में दो-दो किसानों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है, जबकि सिरसा में एक किसान पर मामला दर्ज किया गया है।
इसके साथ ही आर्थिक दंड भी लगाया गया है। फरीदाबाद में दो मामलों में कुल 10 हजार रुपये, पलवल में एक मामले में 5 हजार रुपये और सिरसा में एक मामले में 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। इस तरह कुल 25 हजार रुपये का आर्थिक दंड वसूला गया है। प्रशासन का कहना है कि यह कदम चेतावनी के तौर पर उठाया गया है ताकि अन्य किसान पराली जलाने से बचें और वैकल्पिक तरीकों को अपनाएं।
हालांकि, इन सख्त कदमों का असर जमीनी स्तर पर अभी तक दिखाई नहीं दे रहा है। बुधवार को ही पूरे राज्य में 376 नए मामले दर्ज किए गए, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि जागरूकता और कार्रवाई के बावजूद पराली जलाने की प्रवृत्ति अभी भी बड़ी संख्या में किसानों के बीच बनी हुई है।
अगर पूरे सीजन के आंकड़ों पर नजर डालें तो अब तक कुल 1327 मामले दर्ज किए जा चुके हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है और प्रशासन के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। पराली जलाने से निकलने वाला धुआं न केवल स्थानीय वातावरण को प्रभावित करता है, बल्कि आसपास के राज्यों तक वायु प्रदूषण फैलाता है, जिससे स्मॉग और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ जाती हैं।
जिलावार स्थिति को देखें तो बुधवार को सबसे ज्यादा मामले जींद जिले में सामने आए, जहां 121 घटनाएं दर्ज की गईं। इसके बाद कैथल में 55, करनाल में 47 और रोहतक में 29 मामले सामने आए। पानीपत और हिसार में 26-26 घटनाएं दर्ज की गईं, जबकि फरीदाबाद में 25 और अंबाला व सिरसा में 11-11 मामले सामने आए। ये आंकड़े दिखाते हैं कि यह समस्या राज्य के लगभग सभी प्रमुख कृषि जिलों में फैली हुई है।
अगर 1 अप्रैल से 29 अप्रैल तक के कुल आंकड़ों को देखा जाए तो जींद जिला सबसे आगे है, जहां 207 मामले दर्ज किए गए हैं। इसके बाद रोहतक में 196, झज्जर में 156, करनाल में 111 और सोनीपत में 109 मामले सामने आए हैं। कैथल में 107, पानीपत में 85, हिसार में 68 और फतेहाबाद में 54 मामले दर्ज किए गए हैं। यह साफ संकेत है कि कुछ जिले लगातार इस समस्या में अधिक योगदान दे रहे हैं।
पराली जलाने की मुख्य वजह किसानों द्वारा इसे जल्दी और कम खर्च में निपटाने की कोशिश मानी जाती है। फसल कटाई के बाद खेतों में बची पराली को हटाने के लिए मशीनरी, मजदूरी और समय की जरूरत होती है, जो कई किसानों के लिए अतिरिक्त बोझ बन जाता है। ऐसे में वे इसे जलाना आसान विकल्प मानते हैं, हालांकि इसका असर पर्यावरण पर गंभीर रूप से पड़ता है।
सरकार और कृषि विभाग लगातार किसानों को जागरूक करने और वैकल्पिक उपाय अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। पराली प्रबंधन के लिए सुपर सीडर, हैप्पी सीडर जैसी मशीनों पर सब्सिडी भी दी जा रही है। इसके अलावा जागरूकता अभियान चलाकर किसानों को बताया जा रहा है कि पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित होती है।
इसके बावजूद जमीनी स्तर पर बदलाव की गति धीमी दिखाई दे रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि केवल जुर्माना और एफआईआर जैसे कदम पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि किसानों को आर्थिक और तकनीकी सहायता और अधिक मजबूत तरीके से उपलब्ध करानी होगी, तभी इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।
प्रशासन ने साफ किया है कि आगे भी पराली जलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जारी रहेगी। जिन किसानों को चेतावनी के बावजूद पराली जलाते पाया जाएगा, उनके खिलाफ जुर्माना और कानूनी कार्रवाई दोनों की जाएगी। निगरानी को और मजबूत करने के लिए सैटेलाइट और फील्ड स्तर पर टीमें सक्रिय की गई हैं।
कुल मिलाकर, पराली जलाने की यह समस्या अब केवल कृषि से जुड़ा मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह पर्यावरण, स्वास्थ्य और प्रशासनिक व्यवस्था के लिए भी बड़ी चुनौती बन चुकी है। एक ओर सरकार सख्ती बढ़ा रही है, वहीं दूसरी ओर किसानों की मजबूरी और संसाधनों की कमी भी इस समस्या को जटिल बना रही है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले समय में क्या नए और प्रभावी कदम उठाए जाते हैं, जिससे इस बढ़ती समस्या पर नियंत्रण पाया जा सके।
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