उत्तर प्रदेश में हृदय रोगों के इलाज के क्षेत्र में एक नई और अत्याधुनिक तकनीक ने उम्मीद की नई किरण जगा दी है। कानपुर स्थित एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में गर्दन की नस के जरिए दिल के वाल्व को ठीक करने की उन्नत विधि अपनाई जा रही है, जिससे मरीजों को बड़ी सर्जरी से बचाया जा रहा है। इस तकनीक का नाम ट्रांसजुगुलर बैलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी है, जिसे प्रदेश में फिलहाल केवल एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में ही सफलतापूर्वक किया जा रहा है।

क्या है यह नई तकनीक
आमतौर पर दिल के माइट्रल वाल्व में सिकुड़न या रुकावट होने पर बैलून की मदद से वाल्व को फैलाया जाता है। पारंपरिक तौर पर यह प्रक्रिया जांघ की नस (फेमोरल वेन) के रास्ते की जाती है। लेकिन कई मरीजों में जांघ की नसों में जन्मजात विकृति, पतलापन या रुकावट होती है, जिससे यह तरीका जोखिम भरा हो जाता है। ऐसे मामलों में गर्दन की नस यानी जुगुलर वेन के माध्यम से बैलून को सीधे दिल तक पहुंचाया जाता है और वाल्व को सुरक्षित तरीके से फुलाया जाता है।
इस विधि में न तो बड़े चीरे की जरूरत पड़ती है और न ही ओपन हार्ट सर्जरी की। परिणामस्वरूप मरीज को कम दर्द होता है, रक्तस्राव नहीं के बराबर होता है और रिकवरी भी काफी तेज होती है।
डॉ. एसके सिन्हा की अहम भूमिका
एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर और कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. एसके सिन्हा ने इस तकनीक को कानपुर में सफलतापूर्वक लागू किया है। उन्होंने बताया कि बीते दो वर्षों में करीब 50 मरीजों का इस विधि से इलाज किया जा चुका है। इनमें से 18 मरीजों के मामलों पर आधारित शोध को वर्ष 2025 में प्रतिष्ठित जर्नल ऑफ अमेरिकन कॉलेज ऑफ कार्डियोलॉजी में प्रकाशित किया गया है, जो इस तकनीक की विश्वसनीयता और सफलता को दर्शाता है।
डॉ. सिन्हा के अनुसार, देश में फिलहाल केवल चार-पांच बड़े शहरों में ही यह तकनीक अपनाई जा रही है, जबकि उत्तर प्रदेश में यह सुविधा केवल एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में उपलब्ध है।
किन मरीजों के लिए है सबसे ज्यादा फायदेमंद
यह नई विधि खासतौर पर उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो रही है, जिनमें पारंपरिक तरीके से वाल्व का इलाज करना मुश्किल या खतरनाक होता है।
जांघ की नसों में विकृति या रुकावट वाले मरीज
जन्मजात हृदय या नसों की समस्या से जूझ रहे रोगी
स्पाइनल कॉर्ड डिजीज वाले मरीज
गंभीर काइफोस्कोलियोसिस (रीढ़ की हड्डी का अधिक टेढ़ापन) से पीड़ित लोग
गर्भवती महिलाएं, जिनमें सर्जरी या जांघ की नस से प्रक्रिया करने पर जटिलताओं का खतरा अधिक होता है
ऐसे मरीजों में पारंपरिक बैलून माइट्रल वाल्वुलोटोमी से जान को खतरा हो सकता है, जबकि ट्रांसजुगुलर तरीका अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।
प्रक्रिया के प्रमुख फायदे
इस तकनीक के कई चिकित्सकीय और व्यावहारिक लाभ सामने आए हैं।
गर्दन की नस से दिल तक पहुंचने का रास्ता अधिक सीधा होता है, जिससे प्रक्रिया आसान और कम समय में पूरी हो जाती है।
मरीज को प्रक्रिया के बाद लंबे समय तक बिस्तर पर नहीं रहना पड़ता, वह जल्दी चलने-फिरने लगता है।
दर्द और रक्तस्राव न्यूनतम होता है।
जांघ की नस से होने वाली जटिलताओं से पूरी तरह बचाव होता है।
एक ही प्रक्रिया में माइट्रल और ट्राइकसपिड वाल्व दोनों की मरम्मत संभव होती है।
मरीजों के लिए राहत भरी खबर
इस तकनीक के आने से हृदय रोगियों को न केवल सुरक्षित इलाज मिल रहा है, बल्कि इलाज के खर्च और समय में भी कमी आई है। ओपन हार्ट सर्जरी की तुलना में यह तरीका कम जोखिम वाला है और मरीज की सामान्य दिनचर्या जल्दी बहाल हो जाती है।
भविष्य की संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में यह तकनीक अन्य सरकारी और निजी मेडिकल संस्थानों में भी अपनाई जा सकती है। इससे उत्तर प्रदेश समेत पूरे देश में जटिल हृदय रोगों के इलाज को नई दिशा मिलेगी।
कुल मिलाकर, गर्दन की नस के जरिए दिल के वाल्व का इलाज करने की यह उन्नत तकनीक हृदय चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है, जो हजारों मरीजों के लिए जीवनरक्षक साबित हो सकती है।
स्वर्णिम टाईम्स : Swarnim Times आपका अपना इंटरनेट अख़बार !