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जब चांदनी रातों में ताजमहल गुनगुनाता था सूफी सुर

पांच दशक पहले मीनारों की परछाइयों में सजती थीं कव्वालियों की महफिलें

आज दुनिया ताजमहल को दिन की रोशनी या चुनिंदा चांदनी रातों में देखती है, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब यह मोहब्बत की निशानी पूरी रात इबादत और सुरों से जगमगाया करती थी। बात करीब पचास साल पुरानी है, जब ताजमहल के संगमरमरी चबूतरे पर उर्स के मौके पर कव्वाली, मुशायरा और सूफी कलाम की महफिलें सजती थीं।

मुगल बादशाह शाहजहां और मुमताज महल की कब्रों के सामने रातभर सुरों की गूंज रहती थी। मीनारों के साए में बैठकर फनकार अपनी आवाज़ से मोहब्बत और इबादत का पैगाम देते थे। यह सिर्फ संगीत नहीं, बल्कि शाहजहां के लिए अकीदत का इज़हार होता था।

अब शाहजहां के 371वें उर्स की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं, जो 15 से 17 जनवरी तक आयोजित होगा। वक्त के साथ उर्स का स्वरूप बदल गया है, लेकिन उसकी रूहानी यादें आज भी लोगों के ज़ेहन में जिंदा हैं।

सुरक्षा के कारण बदली रातों की तस्वीर

1984 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सुरक्षा कारणों से ताजमहल को रात में आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया था। यह प्रतिबंध करीब दो दशकों तक जारी रहा। बाद में 2004 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पूर्णिमा की रातों में सीमित संख्या में पर्यटकों को रात 12 बजे तक ताजमहल देखने की अनुमति मिली।

उर्स की परंपरा सदियों पुरानी

उर्स कमेटी के अध्यक्ष इब्राहिम हुसैन जैदी बताते हैं कि उर्स की परंपरा शाहजहां के समय से चली आ रही है। पहले ताजमहल पूरी रात खुला रहता था। मेहमानखाने की ओर मीनार के पास मंच लगता था, जहां कव्वाली और मुशायरे होते थे।

उर्स कमेटी के आरिफ तैमूरी कहते हैं कि जब संगमरमर के ताजमहल के सामने सूफी कलाम गूंजता था, तो माहौल बेहद रूहानी हो जाता था। यह संगीत नहीं, एक इबादत होती थी।

फिर उठी रात में खोलने की मांग

ताजमहल को रात में पर्यटकों के लिए खोलने की मांग एक बार फिर तेज़ हो गई है। केंद्रीय राज्यमंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल और उत्तर प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह इस संबंध में केंद्र सरकार को पत्र लिख चुके हैं। अंतिम फैसला केंद्र सरकार को लेना है।

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