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सर्वाइकल कैंसर उन्मूलन की वैश्विक दौड़—अमीर देशों से आगे बढ़ती उम्मीद, भारत के लिए निर्णायक दशक

महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियों में गिने जाने वाले सर्वाइकल कैंसर को खत्म करने की दिशा में दुनिया अब पहले से कहीं ज्यादा संगठित और आशावादी नजर आ रही है। चिकित्सा विज्ञान, टीकाकरण अभियानों और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में सुधार ने इस बीमारी को नियंत्रित करना संभव बना दिया है। यही कारण है कि उच्च आय वाले देश 2048 तक इसे लगभग समाप्त करने के लक्ष्य के करीब पहुंच रहे हैं, जबकि भारत जैसे मध्यम आय वाले देशों के सामने भी अब यह लक्ष्य असंभव नहीं रह गया है।

सर्वाइकल कैंसर मुख्य रूप से ह्यूमन पैपिलोमावायरस यानी एचपीवी संक्रमण के कारण होता है। यह वायरस बेहद आम है और असुरक्षित संपर्क के जरिए फैलता है। हालांकि, इसकी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इसे टीकाकरण के माध्यम से रोका जा सकता है। यही कारण है कि आज दुनिया भर में इस बीमारी के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार एचपीवी वैक्सीन को माना जा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सर्वाइकल कैंसर को खत्म करने के लिए एक स्पष्ट और मापनीय रणनीति तैयार की है, जिसे 90-70-90 लक्ष्य के नाम से जाना जाता है। इसके तहत 90 प्रतिशत लड़कियों को 15 वर्ष की उम्र तक टीका लगाना, 70 प्रतिशत महिलाओं की नियमित स्क्रीनिंग और 90 प्रतिशत रोगियों का समय पर इलाज सुनिश्चित करना शामिल है। इस रणनीति को अपनाने वाले देश तेजी से सकारात्मक परिणाम देख रहे हैं।

अमीर देशों ने इस दिशा में सबसे तेज़ प्रगति की है। बेहतर स्वास्थ्य ढांचा, व्यापक बीमा प्रणाली और जागरूक नागरिकों के कारण वहां टीकाकरण और स्क्रीनिंग का स्तर बहुत ऊंचा है। परिणामस्वरूप, वहां सर्वाइकल कैंसर के मामले लगातार घट रहे हैं और 2048 तक इसके उन्मूलन का लक्ष्य वास्तविकता के करीब दिख रहा है।

इसके विपरीत, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति जटिल बनी हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच, जागरूकता की कमी और वित्तीय बाधाएं इस लड़ाई को कठिन बनाती हैं। कई क्षेत्रों में महिलाएं नियमित जांच नहीं करातीं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है और इलाज मुश्किल हो जाता है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि मौजूदा प्रयासों में तेजी नहीं लाई गई, तो गरीब देशों में इस बीमारी का बोझ कम होने की गति बेहद धीमी रहेगी। कुछ अध्ययनों के अनुसार, वर्तमान रफ्तार जारी रहने पर इन देशों में केवल 20-25 प्रतिशत तक ही कमी आ पाएगी। यह अंतर वैश्विक स्वास्थ्य असमानता को और बढ़ा सकता है।

भारत के लिए यह स्थिति एक चुनौती भी है और अवसर भी। भारत में बड़ी आबादी और विविध सामाजिक परिस्थितियों के बावजूद स्वास्थ्य ढांचे में तेजी से सुधार हो रहा है। देश ने पोलियो उन्मूलन और कोविड-19 टीकाकरण जैसे अभियानों में अपनी क्षमता साबित की है। यही अनुभव अब सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ लड़ाई में काम आ सकता है।

The Lancet Oncology में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, यदि भारत 90 प्रतिशत एचपीवी टीकाकरण कवरेज हासिल कर लेता है और सिंगल-डोज वैक्सीन रणनीति को प्रभावी रूप से लागू करता है, तो सर्वाइकल कैंसर के मामलों में लगभग 78 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। यह आंकड़ा बताता है कि सही नीति और क्रियान्वयन से भारत इस बीमारी पर निर्णायक बढ़त हासिल कर सकता है।

भारत में इस दिशा में प्रयास तेज हो रहे हैं। सरकार किशोरियों के लिए टीकाकरण कार्यक्रमों को मजबूत कर रही है और स्कूलों तथा सामुदायिक केंद्रों के माध्यम से जागरूकता फैलाई जा रही है। इसके अलावा, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर स्क्रीनिंग सुविधाओं को बेहतर बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस अभियान को और प्रभावी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण बदलाव जरूरी हैं। इनमें सस्ती वैक्सीन की उपलब्धता, सिंगल-डोज टीकाकरण को बढ़ावा और पुरुषों को भी इस अभियान में शामिल करना शामिल है। पुरुषों को टीका लगाने से वायरस का प्रसार और तेजी से रोका जा सकता है, जिससे समग्र प्रभाव बेहतर होगा।

स्क्रीनिंग की भूमिका भी उतनी ही अहम है। कई बार सर्वाइकल कैंसर बिना किसी शुरुआती लक्षण के बढ़ता है। ऐसे में नियमित जांच ही इसे समय रहते पकड़ने का सबसे प्रभावी तरीका है। यदि शुरुआती चरण में बीमारी का पता चल जाए, तो इलाज आसान और सफल होने की संभावना बहुत अधिक होती है।

हालांकि, सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएं अभी भी एक बड़ी चुनौती हैं। कई महिलाएं झिझक या जानकारी की कमी के कारण जांच से बचती हैं। इसके अलावा, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी भी समस्या को बढ़ाती है। इन चुनौतियों को दूर करने के लिए सामुदायिक स्तर पर जागरूकता अभियान और महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

वैश्विक स्तर पर भी सहयोग की आवश्यकता है। अमीर देशों को चाहिए कि वे तकनीक, संसाधन और वित्तीय सहायता के माध्यम से गरीब देशों की मदद करें। इससे न केवल वैश्विक स्वास्थ्य असमानता कम होगी, बल्कि सर्वाइकल कैंसर के उन्मूलन का लक्ष्य भी जल्दी हासिल किया जा सकेगा।

आने वाला दशक इस लड़ाई के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। यदि इस अवधि में टीकाकरण और स्क्रीनिंग को व्यापक स्तर पर लागू कर दिया जाता है, तो 2048 तक दुनिया के अधिकांश हिस्सों में इस बीमारी को खत्म करना संभव हो जाएगा।

अंततः, सर्वाइकल कैंसर के खिलाफ यह संघर्ष केवल चिकित्सा का नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का भी है। भारत जैसे देश, जहां संसाधन सीमित हैं लेकिन संभावनाएं अपार हैं, इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

अगर सरकार, समाज और स्वास्थ्य संस्थान मिलकर काम करें, तो वह दिन दूर नहीं जब सर्वाइकल कैंसर केवल इतिहास की किताबों में दर्ज एक बीमारी बनकर रह जाएगा।

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