हरियाणा में सामने आए 748 करोड़ रुपये के कथित बैंक घोटाले ने प्रशासनिक व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार ने अब इसकी जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने का निर्णय लिया है। सरकार का यह कदम इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष और विस्तृत जांच सुनिश्चित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

इस घोटाले में सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के फंड्स के साथ कथित तौर पर हेराफेरी की गई। शुरुआती जानकारी के अनुसार, यह पूरा खेल तीन निजी बैंकों—आईडीएफसी फर्स्ट बैंक, एयू स्मॉल फाइनेंस बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक—से जुड़ा हुआ है। इन बैंकों के कुछ पूर्व और वर्तमान कर्मचारियों पर आरोप है कि उन्होंने मिलकर सरकारी धन का गलत तरीके से उपयोग किया और बड़े स्तर पर गबन को अंजाम दिया।
सरकार ने इस मामले की जांच चरणों में कराने की योजना बनाई है। पहले चरण में आईडीएफसी फर्स्ट बैंक से जुड़े मामलों की जांच होगी, जिसमें लगभग 590 करोड़ रुपये की अनियमितता सामने आई है। यह राशि हरियाणा के करीब 18 सरकारी विभागों से संबंधित बताई जा रही है, जिससे इस पूरे मामले की गंभीरता और बढ़ जाती है।
हालांकि इस मामले में एक राहत की बात यह है कि आईडीएफसी फर्स्ट बैंक से जुड़े पूरे 590 करोड़ रुपये सरकार के खाते में वापस आ चुके हैं। लेकिन इसके बावजूद सरकार जांच को जरूरी मान रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इतनी बड़ी राशि की हेराफेरी आखिर कैसे हुई और इसके पीछे कौन-कौन लोग जिम्मेदार हैं।
इस घोटाले की शुरुआती जांच हरियाणा भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा की गई थी। एसीबी ने इस मामले में पहली एफआईआर दर्ज करते हुए आईडीएफसी फर्स्ट बैंक के पूर्व कर्मचारियों को आरोपी बनाया था। इसके बाद जांच के दौरान कई अन्य नाम भी सामने आए, जिनमें बैंक कर्मचारी, ज्वेलरी कारोबारी और हरियाणा सरकार के दो वित्त अधिकारी शामिल हैं।
एसीबी अब तक कई आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है, जिससे यह साफ होता है कि मामला केवल बैंकिंग लेनदेन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक बड़ा नेटवर्क सक्रिय हो सकता है। जांच के दौरान कुछ आईएएस अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं, हालांकि इस संबंध में अभी आधिकारिक तौर पर कोई पुष्टि नहीं हुई है।
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, घोटाले का दायरा और जटिलता इतनी ज्यादा है कि इसकी जांच के लिए एक केंद्रीय एजेंसी की जरूरत महसूस हुई। इसी के तहत दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (DSPE) अधिनियम की धारा 6 के तहत केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया, जिससे CBI को इस मामले की जांच का अधिकार मिल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के घोटाले सरकारी वित्तीय प्रणाली में मौजूद कमजोरियों को उजागर करते हैं। यदि समय रहते निगरानी तंत्र मजबूत होता, तो इतनी बड़ी राशि की गड़बड़ी रोकी जा सकती थी।
अब CBI की एंट्री के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि मामले की हर परत को उजागर किया जाएगा। जांच के दौरान यह सामने आ सकता है कि किस स्तर पर चूक हुई और किन लोगों ने मिलकर इस घोटाले को अंजाम दिया।
सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी भी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकारी फंड्स की सुरक्षा और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए सिस्टम में और सुधार की जरूरत है। अब सभी की नजर CBI जांच पर टिकी है, जिससे इस बड़े घोटाले का पूरा सच सामने आने की उम्मीद है।
स्वर्णिम टाईम्स : Swarnim Times आपका अपना इंटरनेट अख़बार !