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अमेरिकी टैरिफ के जवाब में भारत की नई आर्थिक रणनीति

केंद्रीय बजट 2026-27 के जरिए भारत सरकार ने वैश्विक व्यापार में बदलते समीकरणों के बीच अपनी आर्थिक रणनीति के स्पष्ट संकेत दे दिए हैं। अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए 50 फीसदी तक के टैरिफ ने भारत के श्रम-प्रधान निर्यात क्षेत्रों पर गहरा असर डाला है। ऐसे में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बजट को सिर्फ आय–व्यय का दस्तावेज न बनाकर, वैश्विक व्यापार दबावों के खिलाफ एक रणनीतिक जवाब के रूप में पेश किया है। सरकार का रुख साफ है—टैरिफ की मार से घबराने के बजाय घरेलू क्षमता को मजबूत कर और निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाकर जवाब दिया जाएगा।

बजट भाषण में वित्त मंत्री ने सीधे तौर पर अमेरिका का नाम भले न लिया हो, लेकिन घोषित नीतियों और रियायतों से यह स्पष्ट है कि सरकार अमेरिकी टैरिफ से प्रभावित क्षेत्रों को राहत देने और नए अवसर तलाशने की दिशा में काम कर रही है। खासतौर पर विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड), कपड़ा उद्योग, समुद्री खाद्य प्रसंस्करण, चमड़ा उद्योग और कंटेनर निर्माण जैसे सेक्टर इस रणनीति के केंद्र में हैं।

एसईजेड को संजीवनी देने की कोशिश

अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भर कई एसईजेड इकाइयां टैरिफ बढ़ने के बाद गंभीर संकट में आ गई थीं। निर्यात घटने से इन इकाइयों के सामने उत्पादन कम करने या बंद होने का खतरा पैदा हो गया था, जिसका सीधा असर रोजगार पर पड़ सकता था। इस स्थिति को देखते हुए सरकार ने एक विशेष एकमुश्त उपाय की घोषणा की है। इसके तहत पात्र विनिर्माण इकाइयों को घरेलू टैरिफ क्षेत्र (डीटीए) में रियायती शुल्क दरों पर बिक्री की अनुमति दी जाएगी। हालांकि, यह बिक्री उनकी निर्यात क्षमता के एक निर्धारित अनुपात तक सीमित रहेगी।

भारत में जून 2025 तक 370 एसईजेड सक्रिय हैं, जो 31 लाख से अधिक लोगों को रोजगार देते हैं। इनमें से बड़ी संख्या श्रम-प्रधान क्षेत्रों से जुड़ी है। निर्यात में गिरावट के कारण सितंबर और अक्तूबर में कई एसईजेड से जुड़े उद्योगों को नुकसान उठाना पड़ा। ऐसे में बजट में दी गई यह छूट न केवल इन इकाइयों को राहत देगी, बल्कि रोजगार बचाने में भी मददगार साबित हो सकती है।

कपड़ा उद्योग पर विशेष फोकस

कपड़ा और परिधान उद्योग भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ में से एक है। यह उद्योग औद्योगिक उत्पादन में 13 फीसदी, निर्यात में 12 फीसदी और जीडीपी में लगभग 2 फीसदी का योगदान देता है। अमेरिका इस क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। टैरिफ बढ़ने के कारण गर्मियों के कई ऑर्डर रद्द हो गए, जिससे उत्पादन और नौकरियों पर संकट गहरा गया।

इस चुनौती से निपटने के लिए वित्त मंत्री ने टेक्सटाइल क्लस्टरों के आधुनिकीकरण के लिए एक व्यापक और एकीकृत कार्यक्रम की घोषणा की है। इसके तहत हथकरघा और हस्तशिल्प से जुड़ी मौजूदा योजनाओं को मिलाकर राष्ट्रीय हथकरघा एवं हस्तशिल्प कार्यक्रम शुरू किया जाएगा। साथ ही, वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और टिकाऊ वस्त्रों को बढ़ावा देने के लिए ‘टेक्स-इको’ पहल लाई जाएगी।

इसके अलावा, रेशम, ऊन, जूट, मानव निर्मित रेशों और नए जमाने के तकनीकी रेशों में आत्मनिर्भरता के लिए राष्ट्रीय रेशा योजना की घोषणा की गई है। पारंपरिक टेक्सटाइल क्लस्टरों को आधुनिक मशीनरी, प्रौद्योगिकी उन्नयन और साझा परीक्षण एवं प्रमाणन केंद्रों के जरिए मजबूत करने के लिए वस्त्र विस्तार एवं रोजगार योजना भी पेश की गई है। सरकार का मानना है कि इससे लागत घटेगी, गुणवत्ता सुधरेगी और भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में ज्यादा प्रतिस्पर्धी बनेंगे।

श्रम-प्रधान निर्यातकों को शुल्क राहत

बजट 2026-27 में शुल्क संरचना को सरल और लचीला बनाने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं। खासतौर पर श्रम-प्रधान क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए कुछ अहम रियायतें दी गई हैं। समुद्री खाद्य उत्पादों के प्रसंस्करण में इस्तेमाल होने वाली विशिष्ट सामग्रियों की शुल्क-मुक्त आयात सीमा को पिछले वर्ष के निर्यात के एफओबी मूल्य के 1 फीसदी से बढ़ाकर 3 फीसदी कर दिया गया है।

इसका उद्देश्य निर्यातकों की लागत कम करना और उन्हें नए बाजारों में प्रतिस्पर्धी बनाना है। हाल के महीनों में भारतीय निर्यातकों ने अमेरिका पर निर्भरता कम कर दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बाजारों की ओर रुख किया है। उदाहरण के तौर पर, अप्रैल से अक्तूबर 2025 के दौरान वियतनाम ने भारत से समुद्री उत्पादों का आयात 110 फीसदी तक बढ़ाया है। इसी तरह, चमड़ा और फुटवियर निर्यातकों के लिए अंतिम उत्पाद के निर्यात की समय सीमा छह महीने से बढ़ाकर एक वर्ष कर दी गई है, जिससे उन्हें बेहतर योजना बनाने का मौका मिलेगा।

कंटेनर निर्माण में आत्मनिर्भरता की पहल

वैश्विक व्यापार में कंटेनरों की कमी और चीन पर अत्यधिक निर्भरता ने हाल के वर्षों में भारत के निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी की है। कोविड-19 महामारी और लाल सागर संकट के दौरान यह समस्या और गंभीर हो गई थी। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर निर्माण योजना की घोषणा की है।

पांच साल की इस योजना का लक्ष्य भारत में एक वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी कंटेनर निर्माण प्रणाली विकसित करना है। अभी चीन दुनिया के लगभग 95 फीसदी बड़े कंटेनरों का निर्माण करता है, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में सुरक्षा और निर्भरता से जुड़े सवाल खड़े होते हैं। भारत इस योजना के जरिए न केवल अपनी जरूरतें पूरी करना चाहता है, बल्कि भविष्य में कंटेनर निर्यातक के रूप में भी उभरने की तैयारी कर रहा है।

युवाओं के लिए नए अवसर

बजट में युवाओं को कौशल-आधारित कार्यबल के रूप में तैयार करने पर भी खास जोर दिया गया है। शिक्षा से रोजगार एवं उद्यम स्थायी समिति, विश्वविद्यालय टाउनशिप, एवीजीसी कंटेंट क्रिएटर लैब और सेवा क्षेत्र पर बढ़ता फोकस इस दिशा में उठाए गए कदम हैं। नीति आयोग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यह रणनीति युवाओं को केवल पारंपरिक सरकारी या कॉरपोरेट नौकरियों तक सीमित न रखकर, हेल्थकेयर, रचनात्मक अर्थव्यवस्था और सेवा क्षेत्र में नए अवसर उपलब्ध कराएगी।

कुल मिलाकर, बजट 2026-27 यह संकेत देता है कि भारत वैश्विक व्यापार के दबावों के सामने रक्षात्मक रुख अपनाने के बजाय, रणनीतिक और दीर्घकालिक सोच के साथ आगे बढ़ रहा है। अमेरिकी टैरिफ की चुनौती को अवसर में बदलने की यह कोशिश आने वाले वर्षों में भारत की निर्यात क्षमता और आर्थिक मजबूती की दिशा तय कर सकती है।

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