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अमृतसर से गूंजा ईरान का सख्त संदेश: 10 दिन की मोहलत, वरना 100 गुना जवाबी हमला; खामेनेई की याद में भारत में सक्रिय हुआ प्रतिनिधिमंडल

पंजाब की पावन धरती से एक ऐसा बयान सामने आया है, जिसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने अमृतसर पहुंचकर न केवल धार्मिक स्थलों पर श्रद्धा व्यक्त की, बल्कि अमेरिका और इजरायल को लेकर बेहद कड़ा रुख भी जाहिर किया। यह प्रतिनिधिमंडल अली खामेनेई की मौत के बाद भारत के दौरे पर है और देश के अलग-अलग हिस्सों में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।

श्री हरिमंदिर साहिब में नतमस्तक हुआ प्रतिनिधिमंडल

अमृतसर पहुंचने पर ईरानी प्रतिनिधिमंडल ने श्री हरिमंदिर साहिब में मत्था टेककर खामेनेई को श्रद्धांजलि दी। इस दौरान उन्होंने सिख धर्म के प्रति सम्मान व्यक्त किया और कहा कि शहादत की भावना इस्लाम और सिख धर्म दोनों में समान रूप से महत्वपूर्ण है।

प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने इस मौके पर शांति और भाईचारे का संदेश भी दिया, लेकिन साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी सख्त स्थिति भी स्पष्ट की।

सिख नेतृत्व को दिया विशेष निमंत्रण

इस दौरान प्रतिनिधिमंडल ने श्री अकाल तख्त के जत्थेदार कुलदीप सिंह गड़गज्ज और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी को दिल्ली में होने वाले विशेष कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया।

यह कार्यक्रम 12 अप्रैल को ईरान कल्चर हाउस में आयोजित किया जाएगा, जिसमें खामेनेई की शहादत के 40वें दिन को याद किया जाएगा। इस आयोजन में कई धर्मगुरु और सामाजिक संगठन शामिल होने वाले हैं।

अमेरिका और इजरायल को चेतावनी

ईरान के प्रतिनिधि डॉ. मोहम्मद हुसैन जियानिया ने मीडिया से बातचीत में अमेरिका और इजरायल को लेकर सख्त बयान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान युद्धविराम केवल अस्थायी है और ईरान स्थायी शांति चाहता है, लेकिन इसके लिए उसकी शर्तों का मानना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि ईरान ने अमेरिका को 10 दिनों का समय दिया है। यदि इस अवधि में उसकी मांगें पूरी नहीं की गईं और हुए नुकसान की भरपाई नहीं की गई, तो 11वें दिन अमेरिका और इजरायल पर पहले से 100 गुना अधिक मिसाइलों से हमला किया जाएगा।

ट्रंप के बयानों पर कड़ी प्रतिक्रिया

जियानिया ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों की आलोचना करते हुए कहा कि उनकी नीति विरोधाभासी है। उन्होंने कहा कि एक ओर ट्रंप ईरान को खत्म करने की बात करते हैं, जबकि दूसरी ओर शांति की अपील भी करते हैं।

उनका कहना था कि इस तरह के बयानों से वैश्विक स्तर पर भ्रम और अस्थिरता पैदा होती है, जो किसी भी देश के लिए खतरनाक हो सकता है।

संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर उठे सवाल

ईरानी प्रतिनिधि ने संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब तक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं ठोस गारंटी नहीं देतीं, तब तक ईरान किसी भी युद्धविराम को गंभीरता से नहीं लेगा।

उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले कुछ वर्षों में ईरान के नागरिक ठिकानों जैसे स्कूल और अस्पतालों को निशाना बनाया गया, लेकिन वैश्विक समुदाय ने इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया।

भारत-ईरान रिश्तों का जिक्र

इस दौरान जियानिया ने भारत और ईरान के ऐतिहासिक संबंधों की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच करीब 5000 साल पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ते हैं, जो आज भी मजबूत बने हुए हैं।

उन्होंने पंजाब विधानसभा द्वारा ईरान के समर्थन में पारित प्रस्ताव की सराहना की और इसे दोनों देशों के बीच गहरे संबंधों का प्रमाण बताया।

लखनऊ और दिल्ली में भी श्रद्धांजलि कार्यक्रम

इससे पहले 7 अप्रैल को लखनऊ के ऐतिहासिक इमामबाड़ा में खामेनेई की याद में एक श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई थी। इस कार्यक्रम में कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।

कार्यक्रम के दौरान सामाजिक सेवा से जुड़े कार्य जैसे मेडिकल कैंप और रक्तदान शिविर भी लगाए गए। अब दिल्ली में भी इसी तरह का एक बड़ा आयोजन प्रस्तावित है।

वैश्विक तनाव के संकेत

ईरानी प्रतिनिधिमंडल के इस बयान को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। अमेरिका और इजरायल को दी गई खुली चेतावनी यह संकेत देती है कि आने वाले समय में तनाव और बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक स्तर पर बातचीत सफल नहीं होती, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

निष्कर्ष

अमृतसर से दिया गया यह बयान केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा भी माना जा रहा है। जहां एक ओर धार्मिक सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव की बात की गई, वहीं दूसरी ओर सख्त रुख भी अपनाया गया।

अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि अमेरिका और इजरायल इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं और क्या आने वाले दिनों में शांति स्थापित हो पाती है या फिर टकराव और बढ़ता है। फिलहाल, यह घटनाक्रम अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़े मोड़ का संकेत दे रहा है।

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