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दिल्ली में एलपीजी संकट की मार: धुएं में घुटती जिंदगी, छोटे कारोबारियों और झुग्गीवासियों पर सबसे ज्यादा असर; सरकार ने हालात सामान्य बताए

राष्ट्रीय राजधानी New Delhi में इन दिनों एलपीजी गैस की उपलब्धता को लेकर जमीनी हालात और सरकारी दावों के बीच बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। एक तरफ सरकार यह दावा कर रही है कि राजधानी में गैस की सप्लाई पूरी तरह सामान्य है, वहीं दूसरी ओर सड़कों पर काम करने वाले छोटे दुकानदार, ढाबा संचालक और झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग इस संकट से बुरी तरह जूझ रहे हैं।

गैस की कमी का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा है जिनकी रोजी-रोटी पूरी तरह एलपीजी पर निर्भर है। पहले जहां ढाबों और रेहड़ी-पटरी पर नीली गैस की लौ पर खाना पकता था, अब वहां लकड़ी और कोयले के चूल्हों से उठता धुआं नजर आ रहा है। यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं, बल्कि मजबूरी और संकट का संकेत है।

छोटे कारोबारियों पर सीधा असर

Seemapuri में सड़क किनारे ढाबा चलाने वाले बृजेश बताते हैं कि पिछले कई दिनों से उन्हें समय पर गैस सिलेंडर नहीं मिल पा रहा है। जब भी वे गैस एजेंसी पहुंचते हैं, उन्हें स्टॉक खत्म होने का हवाला देकर लौटा दिया जाता है। ऐसे में उन्होंने मजबूरी में लकड़ी के चूल्हे का सहारा लेना शुरू कर दिया है।

उनका कहना है कि पहले एक एलपीजी सिलेंडर कई दिनों तक चलता था, जिससे लागत नियंत्रित रहती थी। लेकिन अब रोज लकड़ी खरीदनी पड़ती है, जिससे खर्च बढ़ गया है और मुनाफा घट गया है। इसके अलावा लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने में ज्यादा समय लगता है, जिससे ग्राहकों की संख्या भी प्रभावित हो रही है।

ब्लैक में गैस, बढ़ती परेशानी

Bhajanpura में ठेला लगाकर खाना बेचने वाले सोनू का कहना है कि बाजार में गैस सिलेंडर ब्लैक में 3000 रुपये से ज्यादा में मिल रहा है। यह कीमत छोटे कारोबारियों के लिए बेहद ज्यादा है।

सोनू बताते हैं कि अगर वे इतनी महंगी गैस खरीदते हैं, तो उन्हें खाने के दाम बढ़ाने पड़ेंगे, जो उनके ग्राहक देने को तैयार नहीं होंगे। ऐसे में उनके पास लकड़ी और कोयले के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हालांकि, इससे उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी हो रही हैं, जैसे आंखों में जलन और सांस लेने में दिक्कत।

ग्राहकों की संख्या में गिरावट

Seelampur के ढाबा संचालक मो. रसीद का कहना है कि गैस संकट का असर केवल लागत तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ग्राहकों की संख्या भी घट रही है। लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनने में अधिक समय लगता है, जिससे ग्राहक इंतजार नहीं करते और दूसरी जगह चले जाते हैं।

इस स्थिति में उनकी आय आधी से भी कम रह गई है। उनका कहना है कि अगर यही हाल रहा तो छोटे ढाबों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

झुग्गियों में और भी गंभीर हालात

RK Puram स्थित एकता विहार की झुग्गियों में रहने वाले लोगों के लिए यह संकट और भी गंभीर है। यहां रहने वाले अधिकांश लोग दिहाड़ी मजदूर हैं, जिनकी आय सीमित और अनिश्चित होती है।

इन लोगों के लिए छोटे एलपीजी सिलेंडर ही सबसे सस्ता और सुविधाजनक विकल्प होते हैं। लेकिन अब छोटे सिलेंडरों की भी भारी कमी हो गई है। गैस एजेंसियों पर लंबी कतारें लगी रहती हैं, और कई बार घंटों इंतजार करने के बाद भी सिलेंडर नहीं मिल पाता।

परिवारों के सामने भोजन का संकट

Munirka की झुग्गी में रहने वाली ओमवती बताती हैं कि पहले वे हफ्ते में एक बार गैस भरवाकर काम चला लेती थीं। लेकिन अब कई दिनों से गैस नहीं मिल रही है, जिससे खाना बनाना मुश्किल हो गया है।

उनके घर में छोटे बच्चे हैं, और सीमित आय के कारण बाहर का खाना खरीदना संभव नहीं है। ऐसे में कभी-कभी उन्हें दिन में केवल एक बार ही खाना बनाना पड़ता है।

महंगाई ने बढ़ाई मुश्किल

गैस की कमी के साथ-साथ बढ़ती कीमतों ने भी गरीब परिवारों की परेशानी बढ़ा दी है। पहले जितने पैसे में कई दिनों तक गैस चल जाती थी, अब उतने में मुश्किल से कुछ दिन ही काम चल पाता है।

Sadik Nagar की झुग्गियों में रहने वाले लोगों का कहना है कि आर्थिक तंगी के कारण उन्हें गैस का इस्तेमाल कम करना पड़ रहा है। कई परिवार अब लकड़ी और कोयले पर निर्भर हो गए हैं, जिससे न केवल खर्च बढ़ रहा है बल्कि स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।

स्वास्थ्य पर पड़ रहा असर

लकड़ी और कोयले के चूल्हों से निकलने वाला धुआं स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक होता है। लगातार धुएं के संपर्क में रहने से आंखों में जलन, सांस की समस्या और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां होने का खतरा बढ़ जाता है।

छोटे दुकानदार और झुग्गी में रहने वाले लोग दिनभर इसी धुएं में काम करने को मजबूर हैं, जिससे उनकी सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है।

सरकार का पक्ष

इन सब समस्याओं के बीच दिल्ली सरकार का कहना है कि राजधानी में एलपीजी की कोई कमी नहीं है। Rekha Gupta ने साफ किया है कि गैस की सप्लाई पूरी तरह सामान्य है और लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 3 अप्रैल को दिल्ली में 1,11,504 एलपीजी बुकिंग हुईं, जबकि 1,26,379 सिलेंडरों की डिलीवरी की गई। यानी जितनी मांग थी, उससे अधिक आपूर्ति की गई।

सरकार का यह भी दावा है कि गैस सिलेंडर की औसत डिलीवरी समय घटकर 4.37 दिन रह गया है, जिससे लोगों को समय पर गैस मिल रही है।

जमाखोरी पर सख्ती

सरकार ने यह भी कहा है कि गैस की कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई की जा रही है। इसके लिए एक कंट्रोल रूम बनाया गया है, जहां लोग शिकायत दर्ज करा सकते हैं।

हाल ही में पुलिस ने कई जगह छापेमारी कर अवैध रूप से जमा किए गए सिलेंडरों को जब्त किया है। अधिकारियों का कहना है कि इस तरह की कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी, ताकि आम लोगों को किसी तरह की परेशानी न हो।

जमीनी हकीकत बनाम सरकारी दावे

हालांकि, जमीनी स्तर पर स्थिति कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। जहां एक ओर सरकार आपूर्ति को सामान्य बता रही है, वहीं दूसरी ओर आम लोग गैस के लिए भटक रहे हैं।

छोटे दुकानदारों और गरीब परिवारों का कहना है कि अगर सब कुछ सामान्य होता, तो उन्हें लकड़ी और कोयले का सहारा नहीं लेना पड़ता।

निष्कर्ष

दिल्ली में एलपीजी संकट केवल एक आपूर्ति का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह अब सामाजिक और आर्थिक समस्या बन चुका है। इसका सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ रहा है, जो पहले से ही सीमित संसाधनों में जीवन जी रहे हैं।

सरकार और प्रशासन के लिए यह जरूरी है कि वे जमीनी हकीकत को समझें और यह सुनिश्चित करें कि गैस की आपूर्ति वास्तव में हर जरूरतमंद तक पहुंचे। क्योंकि जब रसोई की आग बुझने लगती है, तो उसका असर केवल पेट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे जीवन पर पड़ता है।

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