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दिल्ली में एलपीजी संकट गहराया: गैस की कमी से बंद हो रहे ढाबे, दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे प्रवासी मजदूर

राजधानी दिल्ली में रसोई गैस की कमी का असर अब आम लोगों के साथ-साथ प्रवासी मजदूरों की जिंदगी पर भी साफ दिखाई देने लगा है। एलपीजी सिलिंडर की आपूर्ति प्रभावित होने के कारण शहर के कई छोटे ढाबे, होटल और स्ट्रीट फूड स्टॉल बंद होने लगे हैं। इन छोटे होटलों पर निर्भर रहने वाले हजारों मजदूरों के सामने अब दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

दिल्ली के औद्योगिक इलाकों, लेबर चौक और निर्माण स्थलों के आसपास रहने वाले अधिकतर मजदूर सस्ते ढाबों और होटलों में ही खाना खाते हैं। यहां उन्हें 40 से 60 रुपये में भरपेट भोजन मिल जाता था, लेकिन गैस सिलिंडर की कमी के कारण अब कई जगहों की रसोई ठंडी पड़ गई है। इस स्थिति ने मजदूरों की परेशानी और बढ़ा दी है।

ढाबे और छोटे होटल होने लगे बंद

राजधानी के कई इलाकों में छोटे ढाबे और होटल गैस की कमी से जूझ रहे हैं। मुनिरका, पहाड़गंज, सदर बाजार, करोल बाग, बवाना और नरेला जैसे क्षेत्रों में कई ढाबों ने अस्थायी रूप से अपनी दुकानें बंद कर दी हैं। जहां दुकानें खुली भी हैं, वहां सीमित मात्रा में ही खाना बनाया जा रहा है।

पहाड़गंज इलाके में ढाबा चलाने वाले रमेश कुमार बताते हैं कि सामान्य दिनों में उनकी दुकान पर रोजाना दो से तीन गैस सिलिंडर की जरूरत पड़ती है। लेकिन पिछले कुछ दिनों से उन्हें मुश्किल से एक सिलिंडर मिल पा रहा है। ऐसे में पूरे दिन ग्राहकों के लिए खाना बनाना संभव नहीं हो पा रहा है।

उनका कहना है कि सिलिंडर की कमी के कारण उन्हें कई बार ग्राहकों को बिना खाना खिलाए वापस भेजना पड़ता है, जिससे उनका कारोबार भी प्रभावित हो रहा है।

मजदूरों के सामने भोजन का संकट

दिल्ली में बड़ी संख्या में ऐसे मजदूर हैं जो रोजाना दिहाड़ी पर काम करते हैं और होटल या ढाबों में सस्ता खाना खाकर अपना गुजारा करते हैं। अब जब ये ढाबे बंद हो रहे हैं तो उनके सामने खाने की समस्या खड़ी हो गई है।

बिहार के सीतामढ़ी जिले से दिल्ली आए मजदूर मुकेश कुमार बताते हैं कि पहले आसपास के ढाबों पर आसानी से सस्ता खाना मिल जाता था। लेकिन अब गैस की कमी के कारण कई ढाबे बंद हो गए हैं, जिससे मजदूरों को काफी परेशानी हो रही है।

उनका कहना है कि काम भी नियमित नहीं मिल रहा और ऊपर से खाना भी महंगा हो गया है। ऐसे में दिल्ली में रहकर गुजारा करना मुश्किल होता जा रहा है।

खाने की कीमतों में भी बढ़ोतरी

गैस की कमी का असर सिर्फ ढाबों के बंद होने तक सीमित नहीं है। जहां ढाबे खुले हैं, वहां खाने की कीमतों में भी बढ़ोतरी हो गई है।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले से आए मजदूर राजेश यादव बताते हैं कि पहले उन्हें ढाबे पर 50 रुपये में भरपेट खाना मिल जाता था। लेकिन अब वही खाना 80 से 100 रुपये में मिल रहा है। दिहाड़ी मजदूरों के लिए इतना महंगा खाना रोज खरीदना मुश्किल हो रहा है।

राजेश का कहना है कि अगर यही स्थिति कुछ दिनों तक और बनी रही तो उन्हें मजबूर होकर अपने गांव वापस लौटना पड़ सकता है।

स्ट्रीट फूड कारोबार भी प्रभावित

दिल्ली के कई इलाकों में छोटे फास्ट फूड स्टॉल और रेहड़ी-पटरी वाले दुकानदार भी गैस सिलिंडर की कमी से परेशान हैं। लक्ष्मी नगर, करोल बाग, आरके पुरम, द्वारका और शाहदरा जैसे क्षेत्रों में कई स्ट्रीट फूड विक्रेताओं को अपनी दुकानें बंद करनी पड़ी हैं।

आरके पुरम में फास्ट फूड का स्टॉल लगाने वाले अंकित बताते हैं कि गैस सिलिंडर न मिलने के कारण उन्हें मजबूरी में दुकान बंद करनी पड़ी है। उनका कहना है कि रोजाना गैस के लिए लाइन में लगना पड़ता है, लेकिन कई बार खाली हाथ ही लौटना पड़ता है।

इसी तरह गोल डाक खाना इलाके में चाउमीन की दुकान चलाने वाले सोनू बताते हैं कि सिलिंडर की कमी के कारण उनका काम पूरी तरह प्रभावित हो गया है। उनका कहना है कि जब गैस ही नहीं मिलेगी तो दुकान कैसे चलेगी।

कालाबाजारी की भी शिकायत

कुछ मजदूरों का कहना है कि गैस सिलिंडर की कालाबाजारी भी हो रही है। उनका आरोप है कि कुछ लोग गैस को ऊंचे दामों पर बेच रहे हैं।

एक मजदूर ने बताया कि एक किलो गैस 400 से 500 रुपये तक में मिल रही है, जो उनके लिए बेहद महंगी है। दिहाड़ी मजदूरों की इतनी आमदनी भी नहीं होती कि वे इतने महंगे दामों पर गैस खरीद सकें।

लॉकडाउन जैसे हालात की याद

दिल्ली में काम करने वाली दिहाड़ी मजदूर अनारकली का कहना है कि गैस की कमी के कारण उन्हें वर्ष 2020 के लॉकडाउन के दिन याद आ रहे हैं। उस समय भी काम बंद हो गया था और खाने की समस्या के कारण लाखों मजदूरों को अपने गांव लौटना पड़ा था।

अनारकली का कहना है कि अगर जल्दी हालात नहीं सुधरे तो मजदूरों को फिर से वही मुश्किलें झेलनी पड़ सकती हैं।

मजदूरों का गांव लौटने का मन

बढ़ते खर्च और घटते काम के कारण कई मजदूर अब दिल्ली छोड़ने की सोच रहे हैं। उनका कहना है कि जब शहर में काम और खाना दोनों ही मुश्किल हो जाएं तो यहां रहना संभव नहीं रह जाता।

बिहार से आए एक मजदूर ने कहा कि अगर दो से तीन दिनों में स्थिति नहीं सुधरी तो वह अपने गांव वापस लौट जाएगा। उनका कहना है कि दिल्ली में रहकर भूखे रहने से बेहतर है कि गांव जाकर किसी तरह गुजारा किया जाए।

सरकार से उम्मीद

प्रवासी मजदूरों और छोटे कारोबारियों का कहना है कि सरकार को इस समस्या पर जल्द ध्यान देना चाहिए। गैस की आपूर्ति सामान्य होने से ही ढाबे और होटल फिर से खुल पाएंगे और मजदूरों को सस्ता भोजन मिल सकेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में एलपीजी की आपूर्ति में बाधा आने से लाखों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है। इसलिए जरूरी है कि जल्द से जल्द गैस की आपूर्ति सुचारु की जाए।

फिलहाल राजधानी में एलपीजी की कमी से पैदा हुई यह स्थिति प्रवासी मजदूरों और छोटे कारोबारियों दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। अगर जल्द समाधान नहीं हुआ तो इसका असर और भी व्यापक हो सकता है।

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