हरियाणा में सामने आए 590 करोड़ रुपये के बैंक घोटाले ने पूरे प्रशासनिक और बैंकिंग सिस्टम को झकझोर दिया है। शुरुआती जांच में ही कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो इस मामले को एक संगठित और सुनियोजित आर्थिक अपराध की ओर इशारा करते हैं। अब इस मामले में Central Bureau of Investigation (CBI) की जांच शुरू होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे कई बड़े अधिकारियों और प्रभावशाली लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

एंटी करप्शन ब्रांच की बड़ी कार्रवाई
घोटाले का खुलासा होते ही एंटी करप्शन ब्रांच (ACB) ने तुरंत केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू की। इस दौरान बैंक मैनेजर रिभव ऋषि को गिरफ्तार किया गया, जिसे इस पूरे मामले का मुख्य आरोपी माना जा रहा है। जांच में पता चला कि रिभव ऋषि ने सरकारी अधिकारियों और अन्य साथियों के साथ मिलकर करोड़ों रुपये के फंड को फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में जमा करने के बजाय निजी फायदे के लिए डायवर्ट कर दिया।
यह रकम सरकारी संस्थानों की बताई जा रही है, जिसे सुरक्षित निवेश के तौर पर बैंक में रखा जाना था। लेकिन आरोपियों ने इस भरोसे का गलत फायदा उठाते हुए फंड को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर कर दिया।
नौकरी छोड़ने के बाद भी जारी रही साजिश
इस घोटाले का सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि मुख्य आरोपी रिभव ऋषि छह महीने पहले ही बैंक की नौकरी छोड़ चुका था। इसके बावजूद वह इस पूरे नेटवर्क को संचालित करता रहा। इससे यह साफ होता है कि उसके पास बैंकिंग सिस्टम के अंदर मजबूत पकड़ थी और उसे कुछ अंदरूनी लोगों का सहयोग भी मिल रहा था।
जांच एजेंसियां अब यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि आखिर नौकरी छोड़ने के बाद भी वह कैसे इतने बड़े स्तर पर वित्तीय लेनदेन को प्रभावित कर पा रहा था।
रिलेशनशिप मैनेजर ने निभाई अहम भूमिका
इस पूरे घोटाले में रिलेशनशिप मैनेजर अभय की भूमिका भी काफी महत्वपूर्ण रही है। जांच में सामने आया कि अभय ने रिभव ऋषि की योजना को लागू करने में मदद की और सरकारी अधिकारियों से संपर्क बनाकर उन्हें अपनी शाखा में एफडी कराने के लिए राजी किया।
अभय ने इस खेल को और मजबूत बनाने के लिए अपने परिवार को भी इसमें शामिल कर लिया। उसने अपनी पत्नी स्वाति सिंगला और साले अभिषेक को इस नेटवर्क का हिस्सा बनाया, जिससे पैसों के लेनदेन को छिपाना आसान हो गया।
फर्जी कंपनी बनाकर किया फंड का खेल
जांच में यह भी सामने आया कि स्वाति सिंगला ने ‘स्वास्तिक देश प्रोजेक्ट’ नाम की एक कंपनी बनाई थी, जिसमें उसकी 75 प्रतिशत हिस्सेदारी थी। इसी कंपनी के जरिए घोटाले की रकम को अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया गया।
इसके बाद इस पैसे को प्रॉपर्टी खरीदने और शेयर बाजार में निवेश करने में लगाया गया, ताकि उसे वैध आय की तरह दिखाया जा सके। इस तरह आरोपियों ने मनी ट्रेल को छिपाने की कोशिश की।
अधिकारियों की भूमिका भी जांच के घेरे में
इस घोटाले ने कई अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। इतनी बड़ी रकम का गलत इस्तेमाल बिना किसी अंदरूनी मिलीभगत के संभव नहीं माना जा रहा। ऐसे में अब जांच का दायरा बढ़ाकर यह पता लगाया जा रहा है कि किन-किन अधिकारियों ने इसमें सहयोग किया या लापरवाही बरती।
कैसे हुआ इतना बड़ा घोटाला?
प्रारंभिक जांच के अनुसार, सरकारी फंड को एफडी के रूप में जमा करने की प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई। आरोपियों ने इस पैसे को सीधे एफडी में डालने के बजाय अलग-अलग खातों में ट्रांसफर किया और फिर उसे निजी निवेश में लगा दिया।
यह पूरा खेल लंबे समय तक चलता रहा और किसी को इसकी भनक तक नहीं लगी, जिससे बैंक की आंतरिक निगरानी प्रणाली पर भी सवाल उठने लगे हैं।
CBI जांच से खुलेंगे राज
अब इस मामले में Central Bureau of Investigation की संभावित एंट्री से जांच और तेज होने की उम्मीद है। CBI इस पूरे मामले की गहराई से जांच करेगी और पैसों के पूरे ट्रेल को खंगालेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस जांच से कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं और सिस्टम में मौजूद खामियों का भी खुलासा होगा।
निष्कर्ष
हरियाणा का यह 590 करोड़ का बैंक घोटाला सिर्फ एक वित्तीय अपराध नहीं, बल्कि सिस्टम की कमजोरियों का बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है। जिस तरह से बैंक कर्मचारियों, निजी लोगों और फर्जी कंपनियों के जरिए इस पूरे खेल को अंजाम दिया गया, वह चिंताजनक है।
अब सभी की नजर CBI जांच पर टिकी है, जिससे यह उम्मीद की जा रही है कि सच्चाई सामने आएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि इस घोटाले में कितने बड़े चेहरे उजागर होते हैं।
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