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दिल्ली में गुमशुदा महिलाओं का बढ़ता आंकड़ा: पुरुषों से ज्यादा महिलाएं लापता, बरामदगी दर भी चिंता का विषय

देश की राजधानी दिल्ली एक बार फिर गुमशुदा लोगों के बढ़ते मामलों को लेकर चर्चा में है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में लापता होने वाली महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है और सबसे चिंताजनक बात यह है कि महिलाओं के मिलने की दर भी अपेक्षाकृत कम बनी हुई है। जनवरी 2026 के आंकड़े इस गंभीर सामाजिक और सुरक्षा चुनौती की ओर साफ इशारा करते हैं।

दिल्ली पुलिस के रिकॉर्ड के अनुसार, जनवरी 2026 में कुल 1777 लोग लापता हुए। इनमें 1116 महिलाएं और 661 पुरुष शामिल हैं। यानी हर तीन लापता लोगों में लगभग दो महिलाएं हैं। यह अंतर न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि महिलाओं की सुरक्षा और सामाजिक हालात पर भी सवाल खड़े करता है।

बरामदगी के आंकड़े और भी ज्यादा चिंता बढ़ाते हैं। जनवरी में लापता हुए 1777 लोगों में से केवल 625 लोगों का ही पता चल सका, जो कुल मामलों का करीब 35.39 प्रतिशत है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं की बरामदगी दर काफी कम रही। लापता 661 पुरुषों में से 275 यानी करीब 41.60 फीसदी को खोज लिया गया, जबकि 1116 महिलाओं में से सिर्फ 354 यानी 31.72 फीसदी ही अपने घर वापस लौट सकीं। इसका मतलब यह है कि अब भी 1148 लोग लापता हैं, जिनमें महिलाओं का प्रतिशत ज्यादा है।

दिल्ली पुलिस का कहना है कि राजधानी में लापता मामलों की संख्या ज्यादा दिखने की एक बड़ी वजह “फ्री रजिस्ट्रेशन सिस्टम” भी है। पुलिस के मुताबिक, जैसे ही किसी व्यक्ति या बच्चे के लापता होने की सूचना मिलती है, तुरंत मामला दर्ज कर लिया जाता है, भले ही वह कुछ ही घंटों या दिनों में घर लौट आए। कई बार लोग अपने स्तर पर लौट आने के बाद पुलिस को सूचना नहीं देते, जिससे रिकॉर्ड में मामला लंबित बना रहता है और आंकड़े बढ़े हुए नजर आते हैं।

हालांकि राहत की बात यह है कि सालाना आधार पर लापता होने वाले लोगों की कुल संख्या में धीरे-धीरे गिरावट दर्ज की जा रही है। वर्ष 2024 में जहां 10,141 लोग लापता हुए थे, वहीं 2025 में यह संख्या घटकर 9,638 रह गई। इसी तरह कुल मामलों में भी मामूली कमी देखने को मिली है।

आंकड़ों के अनुसार—

• 2023 में 24,481 लोग लापता हुए, जिनमें से 17,599 का पता चला।

• 2024 में 24,893 लोग लापता हुए और 16,416 को खोज लिया गया।

• 2025 में 24,508 मामलों में 15,421 लोग मिले।

इसके बावजूद महिलाओं की बरामदगी दर में अपेक्षित सुधार न होना चिंता का विषय बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे सामाजिक, आर्थिक और मानसिक कारण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। कई महिलाएं घरेलू विवाद, पारिवारिक दबाव, आर्थिक मजबूरी या सामाजिक डर के कारण घर छोड़ देती हैं और फिर लौट नहीं पातीं। पहचान का संकट और आजीविका की समस्या उनके लिए रास्ता और मुश्किल बना देती है।

किशोरियों के मामलों में स्थिति और जटिल हो जाती है। कानून के तहत नाबालिग लड़कियों के लापता होने को अपहरण की श्रेणी में रखा जाता है। कई मामलों में ये लड़कियां जान-पहचान वालों या दोस्तों के साथ चली जाती हैं, लेकिन कानूनी प्रक्रिया लंबी होने के कारण परिवार और पुलिस दोनों असमंजस में फंस जाते हैं।

दिल्ली पुलिस ने हाल ही में पुराने मामलों की समीक्षा भी शुरू की है। विशेष पुलिस आयुक्त (अपराध शाखा) के निर्देश पर थाना पुलिस और एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट ने 2024, 2025 और 2026 के मामलों में गहन संपर्क अभियान चलाया। इस दौरान 341 लोगों से फोन पर संपर्क किया गया, जिनमें से 45 लोग पहले ही अपने घर लौट चुके थे, लेकिन इसकी सूचना रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हो पाई थी।

राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने दिल्ली की कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों का लापता होना बेहद गंभीर स्थिति है। वहीं, पुलिस का दावा है कि किसी संगठित गिरोह की सक्रियता के संकेत नहीं मिले हैं और ज्यादातर मामले व्यक्तिगत या पारिवारिक कारणों से जुड़े हैं।

कुल मिलाकर, आंकड़े भले ही धीरे-धीरे घट रहे हों, लेकिन महिलाओं के लापता होने और उनके वापस न लौट पाने की दर अब भी एक बड़ा सवाल बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पुलिस कार्रवाई से ही नहीं, बल्कि सामाजिक जागरूकता, पारिवारिक संवाद और महिलाओं को सुरक्षित व आत्मनिर्भर बनाने से ही इस समस्या का स्थायी समाधान संभव है।

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