नई दिल्ली। देशभर में बढ़ती आवारा कुत्तों की समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। इस दौरान कोर्ट में न सिर्फ कानूनी बहस हुई, बल्कि व्यावहारिक और सामाजिक पहलुओं पर भी तीखी टिप्पणियां देखने को मिलीं।

सुनवाई के दौरान न्यायाधीश ने कहा कि “कुत्ते इंसान के डर को पहचान लेते हैं और कई बार उसी प्रतिक्रिया में हमला कर बैठते हैं। यह बात मैं अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूं।” कोर्ट की यह टिप्पणी चर्चा का विषय बन गई।
एनिमल वेलफेयर की दलील
एनिमल वेलफेयर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने अदालत को बताया कि यदि गलियों से आवारा कुत्तों को पूरी तरह हटा दिया गया, तो चूहों की संख्या तेजी से बढ़ सकती है, जिससे नई समस्याएं खड़ी होंगी। इस पर कोर्ट ने हल्के अंदाज़ में सवाल किया—
“तो क्या चूहों को कंट्रोल करने के लिए बिल्लियां लानी पड़ेंगी?”
शेल्टर और नसबंदी पर जोर
एडवोकेट सीयू सिंह ने कहा कि बड़ी संख्या में कुत्तों को एक ही शेल्टर में रखने से बीमारियों के फैलने का खतरा रहता है। उनका सुझाव था कि देशभर में करीब 91,800 नए डॉग शेल्टर बनाए जाने चाहिए, ताकि समस्या का संतुलित समाधान निकाला जा सके।
कुत्तों की गिनती और मॉनिटरिंग जरूरी
सीनियर एडवोकेट ध्रुव मेहता ने कोर्ट को बताया कि आखिरी बार आवारा कुत्तों की मॉनिटरिंग वर्ष 2009 में हुई थी, जब दिल्ली में करीब 5.6 लाख कुत्ते दर्ज किए गए थे। इसके बाद कोई आधिकारिक सर्वे नहीं हुआ, जबकि संख्या लगातार बढ़ी है। उन्होंने नियमित मॉनिटरिंग को बेहद जरूरी बताया।
एनजीओ का योगदान भी रखा गया रिकॉर्ड पर
एक अन्य याचिकाकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट नकुल दीवान ने कहा कि उनके मुवक्किल की एनजीओ अब तक 66 हजार से ज्यादा कुत्तों को बचा चुकी है और 15 हजार कुत्तों की नसबंदी करवाई जा चुकी है।
कोर्ट की सख्त लेकिन संतुलित राय
सभी दलीलों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि समस्या का हल एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों के सख्त और सही क्रियान्वयन में है। कोर्ट ने यह भी कहा कि कुत्तों, बंदरों और अन्य जानवरों की आबादी को लेकर संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि किसी एक फैसले से नई परेशानी न खड़ी हो।
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