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पश्चिम एशिया तनाव का बढ़ता प्रभाव: भारत की विकास दर पर खतरा, महंगाई और दबाव बढ़ने के संकेत

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर अब धीरे-धीरे वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ भारत पर भी दिखाई देने लगा है। भले ही भारत और अन्य एशियाई देशों का पश्चिमी देशों के साथ सीधा व्यापार सीमित हो, लेकिन ऊर्जा आयात और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं पर उनकी निर्भरता उन्हें इस संकट के प्रति संवेदनशील बनाती है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति गुजरती है, इस समय वैश्विक चिंता का केंद्र बना हुआ है।

विशेषज्ञों और रेटिंग एजेंसियों का मानना है कि यदि यह संघर्ष लंबे समय तक जारी रहता है, तो भारत की आर्थिक वृद्धि दर पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। अनुमान है कि आगामी वित्त वर्ष में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर में करीब 1 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है। वहीं खुदरा महंगाई में लगभग 1.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होने की संभावना जताई जा रही है।

ईवाई इकोनॉमी वॉच रिपोर्ट के अनुसार, इस संकट का असर कई प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों पर पड़ सकता है। कपड़ा, पेंट, रसायन, उर्वरक, सीमेंट और टायर जैसे सेक्टर ऊर्जा पर अत्यधिक निर्भर हैं, और कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि से इनकी लागत बढ़ना तय है। यदि इन क्षेत्रों में उत्पादन घटता है या लागत बढ़ती है, तो इसका असर रोजगार और आय पर भी पड़ेगा, जिससे बाजार में मांग कमजोर हो सकती है।

भारत की स्थिति इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि वह अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में थोड़ी सी भी बढ़ोतरी सीधे देश की अर्थव्यवस्था पर असर डालती है। यही कारण है कि पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

आर्थिक अनुमानों की बात करें तो ईवाई ने पहले वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की विकास दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान जताया था। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए इसमें गिरावट की आशंका बढ़ गई है। इससे पहले आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) ने भी भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर 6.1 प्रतिशत तक रहने की संभावना जताई थी।

महंगाई के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक हो सकती है। रिपोर्ट के अनुसार, खुदरा महंगाई दर में लगभग 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है, जिससे यह अपने मूल अनुमान 7 प्रतिशत से ऊपर पहुंच सकती है। इसका मुख्य कारण कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आपूर्ति में बाधा है। ऊर्जा की लागत बढ़ने से परिवहन, उत्पादन और अन्य आवश्यक सेवाओं की लागत भी बढ़ जाती है, जिसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है।

हालांकि, भारतीय मुद्रा रुपये में हाल ही में जो गिरावट देखी गई है, उसे लेकर विशेषज्ञों का नजरिया संतुलित है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की रिपोर्ट के अनुसार, रुपये में आई कमजोरी वैश्विक रुझानों के अनुरूप है और यह अन्य प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले असामान्य नहीं है। 27 फरवरी के बाद से वैश्विक स्तर पर कई मुद्राओं में गिरावट देखी गई है, और रुपया भी उसी प्रवृत्ति का हिस्सा है।

एसबीआई का कहना है कि रुपये पर दबाव जरूर है, लेकिन यह नियंत्रित सीमा में है। कुछ मुद्राएं जो पहले काफी मजबूत हो चुकी थीं, उनमें अब ज्यादा गिरावट देखने को मिल रही है, जबकि रुपया अपेक्षाकृत संतुलित बना हुआ है। इसका एक बड़ा कारण भारत की मजबूत आर्थिक स्थिति और पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार है।

विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि मौजूदा हालात 2013 जैसे नहीं हैं, जब रुपये में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला था और भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार को स्थिर करने के लिए विशेष कदम उठाने पड़े थे। इस बार स्थिति अपेक्षाकृत नियंत्रित है और भारत के पास बेहतर आर्थिक साधन उपलब्ध हैं।

भारत के पास वर्तमान में 700 अरब डॉलर से अधिक का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो 10 महीने से अधिक के आयात को कवर करने में सक्षम है। इसके अलावा, देश का अल्पकालिक विदेशी कर्ज भी कुल भंडार का 20 प्रतिशत से कम है। ये सभी कारक मिलकर भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से बचाने में मदद कर रहे हैं और रुपये पर सट्टेबाजी के दबाव को कम कर रहे हैं।

फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। सरकार और नीति-निर्माताओं को इस स्थिति पर लगातार नजर रखनी होगी और समय-समय पर आवश्यक कदम उठाने होंगे।

कुल मिलाकर, वैश्विक संकट का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर धीरे-धीरे दिखने लगा है। जहां एक ओर विकास दर पर दबाव बढ़ सकता है, वहीं दूसरी ओर महंगाई भी आम जनता के लिए चिंता का कारण बन सकती है। आने वाले समय में स्थिति किस दिशा में जाती है, यह काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम पर निर्भर करेगा।

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